Friday, October 01, 2021

राधे-राधे


उतरी, चढ़ी 
रात की दारू
उठ बैठा
मुँह खोल रहा है।
राधे-राधे बोल रहा है।

कहता है जी 
गौ दर्शन से 
सारे काज सम्हर जाते हैं
कोष पाप का 
खाली होता
मंगल के अवसर आते हैं।
लगा ठेलने 
केवल अपनी
चिंतन सारा गोल रहा है।
राधे-राधे  बोल  रहा  है।

लूट-पाट की 
बना योजना
वंशी वाले की जय बोले।
धीरे-धीरे 
दाँव-पेंच की 
खुद ही अपनी गुत्थी खोले।
ढोंग-फरेबी, 
जीवन रस में
कालकूट ही घोल रहा है।
राधे - राधे  बोल  रहा  है।

लाज रखेगा
डमरू वाला 
अपनी नैया पार करेगा।
जो चलता है 
चले हमेशा
वह खाली भंडार भरेगा।
हर-हर गंगे 
बोल-बोल कर 
ज़बरन पानी ढोल रहा है।
राधे - राधे  बोल  रहा   है।

प्रथम लक्ष्मी 
मध्य शारदा
और मूल में है गोविंदा।
करतल दर्शन
करता उठकर 
खाने को है मुर्गा ज़िन्दा।
खुल कर पूरा
भीतर-भीतर
बाहर हमें टटोल रहा है।
राधे- राधे  बोल रहा  है।

-मनोज जैन

Monday, September 20, 2021

छितराई शाम

दोपहरी सिमट गई
छितराई शाम
           
सूरज ने पश्चिम की
फाँदी दीवार
धरती में पसर गया
साँवल अँधियार
रोशनियाँ सड़कों की
हुई टीम- टाम
दोपहरी सिमट गई
छितराई शाम
            
फूलों ने उढ़काए
द्वार के कपाट
सैलानी भौंरे तब
हुए घाट-बाट
सोच रहे कैसे अब
छलकाएँ जाम
दोपहरी सिमट गई
छितराई शाम
            
अंबर में बगुलों की
सितबरनी पाँत
संध्या रानी के ज्यों
मोती-से दाँत
नीड़ों में पक्षी गण 
करते विश्राम
दोपहरी सिमट गई
छितराई शाम
           
माधो मछुआरे ने
बाँध लिया जाल
लौट चला फिर उसको
काँधे में डाल
मंदिर के पिछवाड़े
फेंककर प्रणाम
दोपहरी सिमट गई
छितराई शाम
           
-ईश्वरी प्रसाद यादव

Thursday, August 19, 2021

सोने के हिरन नहीं होते


आधा जीवन जब बीत गया
बनवासी-सा गाते-रोते
अब पता चला इस दुनिया में
सोने के हिरन नहीं होते।

सम्बन्ध सभी ने तोड़ लिए
चिन्ता ने कभी नहीं तोड़े
सब हाथ जोड़कर चले गये
पीड़ा ने हाथ नहीं जोड़े

सूनी घाटी में अपनी ही
प्रतिध्वनियों ने यों छला हमें
हम समझ गये पाषाणों में-
वाणी, मन, नयन नहीं होते।

मन्दिर-मन्दिर भटके-लेकर,
खंडित विश्वासों के टुकड़े
उसने ही हाथ जलाये, जिस-
प्रतिमा के चरण युगल पकड़े

जग जो कहना चाहे, कह ले
अविरल दृग जल धारा बह ले
पर जले हुए इन हाथों से
हमसे अब हवन नहीं होते।

-कन्हैयालाल बाजपेयी

Friday, August 13, 2021

सब को अन्न खिलाने वाला

 सब को
अन्न खिलाने वाला
कब तक भूखा सोयेगा
सब्र 
कभी तो खोयेगा! 

खाद, बीज
आकाश छू रहे 
डीजल ने भी
पर खोले
दिल्ली 
नहीं किसी की सुनती
कोई
कितना  भी बोले
भूमि-पुत्र कब तक
अपनी
इस बदहाली पर रोयेगा
सब्र कभी तो...... 

खेती का भी
एक गणित है
लगता है सीधा सादा
सस्ती उपज, 
आय भी कम है, 
लागत इसमें है ज़्यादा
घाटे के 
इस सौदे पर वह
कब तक सपने बोयेगा.
सब्र कभी तो........

धरा पुत्र है
शूरवीर ये
चौड़ा है इसका सीना
बाधाओं से 
रहा जूझता
सीखा कष्टों में जीना
भ्रष्ट-तंत्र 
बढ़ रहा 'कूकणा'
लुटिया यही डुबोयेगा
सब्र कभी........ 

-राय कूकणा

Friday, June 11, 2021

कुछ भी बदला नहीं फलाने

 कुछ भी बदला नहीं फलाने
सब जैसा का तैसा है
सब कुछ पूछो
यह मत पूछो
आम आदमी कैसा है

क्या सचिवालय
क्या न्यायालय
सबका वही रवैय्या है
बाबू बड़ा ना
भैय्या प्यारे
सबसे बड़ा रुपैय्या है
पब्लिक जैसे
हरी फसल है
शासन भूखा भैंसा है

मंत्री के
पी.ए. का नक्शा
मंत्री से भी हाई है
बिना कमीशन
काम न होता
उसकी यही कमाई है
रुक जाता है
कहकर फौरन
देखो भाई ऐसा है

मनमाफिक
सुविधाएँ पाते
हैं अपराधी जेलों में
कागज पर
जेलों में रहते
खेल दिखाते मेलों में
जैसे रोज
चढ़ावा चढ़ता
इन पर चढ़ता पैसा है

-कैलाश गौतम

Saturday, May 08, 2021

खोजें छोर-किनारा


मज़लूमों की
छत के नीचे
मिले नौकरी-चारा 
ऐसा हो
संघर्ष हमारा।

सबको
आदर-भाव
सौंप दें
समता-बीज पड़ें 
द्वेष-घृणा
चिन्तन से
निकलें
उन्नत पाँव बढ़ें
कृषक
मजूरों के
जीवन में
लौटे हर्ष दुबारा
ऐसा हो
संघर्ष हमारा।

एक वर्ण 
मानवता पा ले
जाति भेद
से दूरी
ऊँच-नीच की
कारा टूटे
कुछ भी
हो मजबूरी 
रार बिना मिल
जाने वाला
खोजें छोर-किनारा
ऐसा हो 
संघर्ष हमारा।

आंँस चटकती
काँच सरीखी
हिम्मत मांँगे पानी
रोज़नदारी 
लिये आस्था
पूजे गाँव गिरानी
नाक सभी
चेहरों पर आये
ब्याहें सपन कुँवारा
ऐसा हो
संघर्ष हमारा।

-रामकिशोर दाहिया

Monday, April 05, 2021

सरकारी अमला

फिर किसान की
खेती उजरी
पाला मार गया
शासन का
सरकारी अमला
पल्ला झार गया 

देने लगे
दलीलें कहते-
बीमा फसल
किसानी
शर्ते नियम
कम्पनी समझे
कौन भरे नुकसानी
हाल झूल से
गाल गूल तक
टूट करार गया 

लागत लौटी
नहीं खेत से
उस पर बनी-मजूरी
रकम शेष है
खाद-बीज की
जोत-सिंचाई पूरी
सिर पर लादे
कर्ज़ रोटियाँ
बढ़ता भार गया 

फुर्सत नहीं
रोग दम तोड़े
आफत और नई
खड़ी मूड़ पर
चिन्ता बिटिया
समधी खोज गई
बिना तेल की
बाती फागुन
फिर उकसार गया 
        
 -रामकिशोर दाहिया

उल्टी धार बहें

भागदौड़ की
रोटी देखें
या फिर भूख सहें 
किसको पकड़ें
किसको छोड़ें
किसके बीच रहें ?

शक्कर, दूध,
चाय की पत्ती
सब्जी, गरम मसाला
दिन निकले से
ढले साँझ हम
लौटे लिये निवाला
रिश्ते-नाते
मीत, पड़ोसी
उल्टी धार बहें 

घिरनी जैसा
रोज़ घूमना
दम से दम को साधे
काम-काज में
कम पड़ते हैं
चौबिस घण्टे आधे
घण्टे, घड़ी,
मिनट सब तड़के
उठतै उठत दहें 

दफ्तर के
आदेश कायदे
घर को नाच नचाते
मन का चैन
खुशी के पल छिन
लम्बे पाँव लगाते
हुकुम बजाकर
बीवी- बच्चे
कितना और ढहें 
              
      -रामकिशोर दाहिया

Sunday, April 04, 2021

मैं दुःख का जश्न मनाऊँगा


तुम दरबारों के गीत लिखो
मैं जन की पीड़ा गाऊँगा.

लड़ते-लड़ते तूफानों से
मेरे तो युग के युग बीते
वीभत्स अभावों का साया
आकर हर रोज डराता है.
मैं क्या जानूँ सोने-से दिन
क्या जानूँ चाँदी-सी रातें
जो भोग रहा हूँ रात-दिवस
मेरा तो उससे नाता है.

तुम सोने-मढ़ा अतीत लिखो
मैं अपना समय सुनाऊँगा.

जो भोगा पग-पग वही लिखा
जैसा हूँ मुझमें वही दिखा
मैं कंकड़-पत्थर-काँटों पर
हर मौसम चलने का आदी.
वातानुकूल कक्षों में शिखरों-
की प्रशस्ति के तुम गायक
है मिली हुई जन्मना तुम्हें
कुछ भी करने की आजादी.

तुम सुख-सुविधा को मीत चुनो
मैं दुःख का जश्न मनाऊँगा.

आजन्म रही मेरे हिस्से
निर्मम अँधियारों की सत्ता
मुझ पर न किसी पड़ी दृष्टि
मैं अनबाँचा अनलिखा रहा.
मुस्तैद रहे हैं मेरे होंठों पर 
सदियों- सदियों ताले
स्वर अट्ठहास के गूँज उठे
जब मैंने अपना दर्द कहा.

तुम किरन-किरन को क़ैद करो
मैं सूरज नया उगाऊँगा .

-जय चक्रवर्ती
   

Thursday, March 18, 2021

इतना भी आसान कहाँ है


इतना भी 
आसान कहाँ है
पानी को पानी कह पाना! 

कुछ सनकी
बस बैठे ठाले
सच के पीछे पड़ जाते हैं
भले रहें गर्दिश में
लेकिन अपनी
ज़िद पर अड़ जाते हैं
युग की इस
उद्दण्ड नदी में
सहज नहीं उल्टा बह पाना! 
इतना भी.... !! 

यूँ तो सच के 
बहुत मुखौटे
कदम-कदम पर
दिख जाते हैं
जो कि इंच भर
सुख की ख़ातिर
फुटपाथों पर
बिक जाते हैं 
सोचो! 
इनके साथ सत्य का
कितना मुश्किल है रह पाना! 
इतना भी............. !! 

जिनके श्रम से
चहल-पहल है
फैली है
चेहरों पर लाली
वे शिव हैं
अभिशप्त समय के
लिये कुण्डली में
कंगाली
जिस पल शिव,
शंकर में बदले
मुश्किल है ताण्डव सह पाना
इतना भी........

-डा० जगदीश व्योम

बंद करो ये लिखना-विखना



सच लिखने से डर लगता है?
बंद करो, 
ये लिखना- विखना !

कब तक गाओगे -
मुखड़ा है 
चाँद का टुकड़ा'
देखा है क्या 
मुखड़े के पीछे का 
दुखड़ा 
दरबारों में 
लोट लगाते रहना है तो-
छोड़ो ये कवि जैसा दिखना !

दुःख में, पीड़ा में, 
चिन्ता में
बोलो-कब-कब मुस्काये हो
जो औरों से कहते हो,
क्या-
खुद भी वह सब कर पाये हो
पहले तो अपने को बाँचो
फिर 
दुनिया पर कविता लिखना!

पैदा करो 
एक चिनगारी प्रतिरोधों की-
संवेदन की
और दहकने दो भट्ठी
पल-प्रतिपल
अपने अंतर्मन की 
सीखो कविवर ,
इस भट्ठी में सुबह-शाम
रोटी-सा सिंकना !

-जय चक्रवर्ती

Thursday, November 19, 2020

किरन बसी फुनगी पर


किरन बसी फुनगी पर
जड़ से खानापूरी है
पूछ रही झोपड़ी
महल से
कितनी दूरी है।

कुछ सूखा अकाल को
अर्पित कुछ
भूचालों को
खोल न पाया कोई
लोकतंत्र के
तालों को
व्यर्थ कल्पना
अच्छे दिन की
आस अधूरी है।

समझ न पाये,
राजनीति में
जुमलों की भाषा
चाहत थी सोने की
हाथों में
पीतल-काँसा
चर्चायें उम्मीदों की
अब गै़र ज़रूरी हैं।

कहते हैं कुछ लोग
रोशनी
आयातित होगी
आगामी पीढ़ी
आजीवन
इन्द्रियजित होगी
मिलती है
सांत्वना रात में
सुबह सिंदूरी है।

पकती है
सदियों से
चतुर वीरबल की खिचड़ी
बाबा भूखे गये
भरोसे की
बगिया उजड़ी
ठठरी पर है चाम
ज़िन्दगी में बेनूरी है।

-मधुकर अष्ठाना

Wednesday, October 21, 2020

किन्तु इनका क्या करें ?

खिड़कियों में घन बरसते

द्वार पर पुरवा हवा..
पाँच-तारी चाशनी में पग रहे
सपने रवा !
किन्तु इनका क्या करें ?

क्या पता आये न बिजली
देखना माचिस कहाँ है
फैलता पानी सड़क का
मूसता चौखट जहाँ है
सिपसिपाती चाह ले
डूबा-मताया घुस रहा है
हक जमाता है धनी-सा
जो न सोचे.. ’क्या यहाँ है ?’

बंद दरवाजा, खुला बिस्तर,
पड़ी है कुछ दवा..
किन्तु इनका क्या करें ?

मात्र पद्धतियाँ दिखीं  
प्रेरक कहाँ सिद्धांत कोई
कुछ करें मंथन,
विचारों में उलझ उद्भ्रान्त कोई
चढ़ रहा बाज़ार
फिर भी क्यों टपकता है पसीना ?
सूचकांकों के गणित में
पिट रहा है क्लान्त कोई

एक नचिकेता नहीं 
लेकिन कई वाजश्रवा
किन्तु इनका क्या करें ?

सिमसिमी-सी मोमबत्ती
एक कोने में पड़ी है
पेट-मन के बीच, पर,
खूँटी बड़ी गहरी गड़ी है
उठ रही
जब-तब लहर-सी
तर्जनी की चेतना से,
ताड़ती है आँख जिसको
देह-बन्धन की कड़ी है

फिर दिखी है रात जागी
या बजा है फिर सवा..
किन्तु इनका क्या करें ?


-सौरभ पाण्डेय
एम-2 / ए-17, ए.डी.ए. कॉलोनी
 नैनी, इलाहाबाद - 211008
संपर्क - 9919889911

Tuesday, October 06, 2020

हवा आयी गंध आयी गीत भी आये

हवा आयी
गंध आयी
गीत भी आये
पर तुम्हारे पाँव
देहरी पर नहीं आये


अब गुलाबी होंठ से
जो प्यास उठती है
वह कंटीली डालियों पर
सांस भरती है
नील नभ पर
अश्रु–सिंचित
फूल उग आये


तितलियों की
धड़कने
चुभती लताओं पर
डोलती चिनगारियाँ
काली घटाओं पर
इन्द्रधनु–सा
झील में
कोई उतर आये

झर रहे हैं चुप्पियों की
आँख से सपने
फिर हँसी के पेड़ की
छाया लगी डसने
शब्द आँखों से
निचुड़ते
आग नहलाये

–डॉ० ओम प्रकाश सिंह

हम उदास हैं और नदी में आग लगी है

 हम उदास हैं
और नदी में आग लगी है
कैसा है दिन
 
अंधे सपनों का आश्वासन
हमें मिला है
नदी-किनारे फिर
ज़हरीला फूल खिला है
दिन-भर सोई
आँख बावरी रात जगी है
कैसा है दिन
छली हवाओं ने
जंगल में पतझर बाँटे
सीने में चुभ रहे
सैकड़ों पिछले काँटे
 बस्ती-बस्ती
शाहों की चल रही ठगी है
कैसा है दिन
आदमक़द कारों से निकले
चौपट बौने
सहमे घूम रहे हैं
जंगल में मृगछौने
धुनें पराई
हम सबको लग रहीं सगी हैं
कैसा है दिन

-कुमार रवीन्द्र

तू ने भी क्या निगाह डाली री मंगले !

तू ने भी क्या निगाह डाली
री मंगले ! 

मावस है स्वर्ण-पंख वाली
करधनियां पहन लीं मुंडेरों ने
आले ताबीज पहन आये
खड़े हैं कतार में बरामदे
सोने की कण्ठियां सजाये
मिट्टी ने आग उठाकर माथे
बिन्दिया सुहाग की बना ली
री मंगले! 

मावस है स्वर्ण-पंख वाली
सरसरा गयीं देहरी-द्वार पर
चकरी-फुलझड़ियों की पायलें
बच्चों ने छतों-छतों दाग दीं
उजले आनन्द की मिसाइलें
तानता फिरे बचपन हर तरफ़
नन्हीं सी चटचटी दुनाली
री मंगले !

मावस है स्वर्ण-पंख वाली
द्वार-द्वार डाकिये गिरा गये
अक्षत-रोली-स्वस्तिक भावना
सारी नाराज़ियां शहरबदर
फोन-फोन खनकी शुभ कामना
उत्तर से दक्षिण सोनल-सोनल
झिलमिल रामेश्वरम्-मनाली
री मंगले !
मावस है स्वर्ण-पंख वाली
   
-रमेश यादव

Thursday, April 09, 2020

जंग वायरस ने छेड़ी है

वायरस से छिड़ी वैश्विक जंग पर मेरी एक नयी रचना (नवगीत) आप सभी के लिए-
"जंग लड़ेंगे हम"

जंग वायरस ने छेड़ी है
जंग लड़ेंगे हम
और जंग में
विजयी होकर ही
निकलेंगे हम।

अजब तरह का
ये दुश्मन है
कुशल खिलाड़ी है
छोटा है पर
छिपी पेट में
इसके दाढ़ी है
छिपकर
वार कर रहा है,
लेकिन सँभलेंगे हम।
जंग वायरस ने........

घर में रहकर
वाच करेंगे
इसकी चालों को
आश्रय देंगे
भूखे, प्यासे,
बिन घरवालों को
कर इसको कमजोर
प्राण इसके
हर लेंगे हम।
जंग वायरस ने........


घुट्टी पीकर
चला चीन से
दुनिया में छाया
पूरा विश्व
अभी तक इसको
पकड़ नहीं पाया
बड़े जतन से
जाल बिछा
इसको जकड़ेंगे हम।
जंग वायरस ने........

मचा हुआ कुहराम
हर जगह
बाहर औ भीतर
कोस रही है
दुनिया इसको
पानी पी-पीकर
डरना नहीं
व्योम इससे
जल्दी उभरेंगे हम।
जंग वायरस ने........

-डा० जगदीश व्योम
09 अप्रैल 2020

Tuesday, February 25, 2020

ये जंगल एक अजूबा है

तोते से मैना
यूँ बोली
ये जंगल एक अजूबा है

टहनी
शाखाओं से लड़ती
पत्ते
आपस में जूझ रहे
बूढ़ी जड़
मिट्टी से चिपकी
अपनी पीड़ा को
मौन गहे
खो गये कहाँ
सब संस्कार
अब
आगे क्या मंसूबा है

सबके
अपने-अपने दल हैं
हर दल
दलदल में धँसा हुआ
वैसे तो
चेहरों पर लाली
पर
गला सभी का फँसा हुआ
यूँ तो है
चहल-पहल
लेकिन
मन सबका डूबा-डूबा है

भेड़ों ने
आपस में मिलकर
अपना प्रतिनिधि
इस बार चुना
रह गई
धरी की धरी चाल
स्यारों को
सबने खूब धुना
पर, खेल वही
सब ज्यों का त्यों
ये कैसा
‘व्योम’ अजूबा है

भेड़ें आपस में
भिड़ बैठीं
हो गई
खूब गुत्थमगुत्था
अब
भेड़-भेड़िये के भ्रम में
है प्रश्नचिह्न
फिर अलवत्ता
है कौन भेड़
भेड़िया कौन
अब तक न
किसी को सूझा है

-डा० जगदीश व्योम

Sunday, October 06, 2019

चक्की पर गेहूँ लिए खड़ा

चक्की पर गेंहूँ लिए खड़ा
मैं सोच रहा उखड़ा-उखड़ा
क्यों दो पाटों वाली साखी
बाबा कबीर को रुला गई

लेखनी मिली थी गीतव्रता
प्रार्थना-पत्र लिखते बीती
जर्जर उदासियों के कपड़े
थक गई हँसी सीती-सीती
हर चाह देर में सोकर भी
दिन से पहले कुलमुला गई

कन्धों पर चढ़ अगली पीढ़ी
ज़िद करती है गुब्बारों की
यत्नों से कई गुनी ऊँची
डाली है लाल अनारों की
प्रत्येक किरण पल भर उजला
काले कम्बल में सुला गई

गीतों की जन्म-कुंडली में
संभावित थी ये अनहोनी
मोमिया-मूर्ति को पैदल ही
मरुथल की दोपहरी ढोनी
खण्डित भी जाना पड़ा वहाँ
जिन्दगी जहाँ भी बुला गई।

-भारत भूषण

Tuesday, April 09, 2019

महानगर

अपने में ही उलझा-सहमा दिखता महानगर
जैसे बेतरतीब समेटा पड़ा हुआ बिस्तर

सड़कें कम पड़ गईं गाड़ियाँ इतनी बढ़ी हुईं
महाजाल बुन रही मकड़ियाँ जैसे चढ़ी हुईं
भाग्यवान ही पूरा करते जोखिम भरा सफ़र
अपने में ही उलझा-सहमा ..........

इतने कुनबे बढ़े, कि टिड्डी-दल भी हार गये
जो दबंग, परती-नजूल की धरती मार गये
कुछ गुटखों के पाउच जैसे बिखरे इधर-उधर
अपने में ही उलझा-सहमा ..........

कूड़ा-कचरा बढ़ने की अपनी मजबूरी है
श्वान, सुअर, कौवों की रहना बहुत ज़रूरी है
पैकेट, पॉलीथीन चबाकर गाय मरे अक्सर
अपने में ही उलझा-सहमा ..........

आपाधापी मची हुई, आपस में तनातनी
राहगीर की राह देखती प्रायः राहजनी
किसका, क्या लुट गया, सवेरे आती रोज़ ख़बर
अपने में ही उलझा-सहमा ..........

पारदर्शिता ख़ातिर कपड़े और महीन हुए
बूढ़ी नज़रों तक के सपने फिर रंगीन हुए
विज्ञापित दृश्यों ने भी तो बोया खूब ज़ह
अपने में ही उलझा-सहमा ..........

-शिवभजन कमलेश

Monday, January 21, 2019

नये साल में क्या बदलेगा

नये साल में क्या बदलेगा ?

तुमको क्या लगता है साधो
नये साल में क्या बदलेगा ?

उजड़े हु़ए गाँव के बाहर
झुलस रहा पीपल का बिरवा
जूठे पत्तल शहर चाटने
चले गये सब चिरई-चिरवा
लौट आये वापस फिर सुग्गा
क्या ऐसा मौसम बदलेगा ?

सहमी-सी रहती जो मैना
क्या वह खुल कर गा पाएगी
या फिर नये साल में भी वह
अपने पंख नुचा आएगी
बाजों की पंचायत में अब
खापों का, क्या सुर बदलेगा ?

रामचन्द्र कहता, अब्दुल कुछ
छुप छुप कर है प्लान बनाता
अब्दुल कहता, रामचन्द्र क्यों
जोर-जोर से शंख बजाता ?
रामचन्द्र-अब्दुल के मन का
खतरनाक संशय बदलेगा ?
तुमको क्या लगता है साधो
नये साल में क्या बदलेगा ?

-डा० प्रदीप शुक्ल


Tuesday, December 25, 2018

जाने क्या बतियाते पेड़

टहनी हिला-हिला
आपस में
जाने क्या बतियाते पेड़

जंगल की सब खुफिया बातें
इनके ज़ेहन में रहतीं
कितनी चीखें घुली हवा में
पूरे युग का सच कहतीं
हद से बेहद
अत्याचारों से
जब-तब
अकुलाते पेड़
टहनी हिला-हिला........

हिरन-हिरनियों के
बेसुध दल पर जब
हाँका पड़ जाता
तितर-बितर होकर
जंगल का
सब गणतंत्र बिखर जाता
खुद को विवश समझकर
अपने मन में
बहुत लजाते पेड़
टहनी हिला-हिला.....

राजा अहंकार में डूबा
हुमक-हुमक कर चलता है
एक नहीं हो पाये जंगल
इसी जुगत में रहता है
राजा की
दोमुँही सोच पर
अन खाये
अनखाते पेड़
टहनी हिला हिला........

जंगल में कितनी ताकत है
कौन इन्हें अब समझाये
ये चाहें तो
राजा क्या है
अखिल व्योम भी झुक जाये
मार हवा के टोने
सबको
रहते सदा जगाते पेड़
टहनी हिला हिला
आपस में
जाने क्या बतियाते पेड़

-डा० जगदीश व्योम

Thursday, October 04, 2018

समर में हम

समर में हम
औ' हमारे
कवच-कुंडल छिन चुके हैं

इन्द्र का छल -
सूर्यकुल की आस्थाएँ भी बिलाईं
धुआँ में हम घिरे
देती नहीं घटनाएँ दिखाईं
रक्त बहता
पाँव से है
देह में भाले भुँके हैं

एक खण्डित रथ बचा है
और घोड़े थके-हारे
मंत्र केवल मरण के ही
गये बरसों से उचारे
शत्रु बाहर
हैं नहीं
वे घरों के भीतर लुके हैं

आँगनों पर फिर रहें हैं
मृत्युपाखी शोर करते
रोज़ ही पूजाघरों में
रक्त-भीगे पंख झरते
सूर्यरथ के
अश्व भी
अंधी गुफाओं में रुके हैं

-कुमार रवीन्द्र

Saturday, September 08, 2018

खमोशी : हलचल

कितना खमोश है
मेरा कुछ आस-पास
कितनी बेख्वाब हैं
सारी चीजें उदास

दरवाज़े खुले हुए
सुनते कुछ, बिना कहे
बेवकूफ नज़रों से
मुँह बाये देख रहे

चीज़ें हैं, चीज़ें बेजान हैं
फिर भी यह लगता है
बेहद परेशान हैं
मेरी नाकामी से
ये भी नाकाम हैं
मेरी हैरानी से
ये भी हैरान हैं

टिक-टिक कर एक घड़ी
चुप्पी को कुचल रही
लगता है दिल की ही
धड़कन को निगल रही

कैसे कुछ अपने आप
गिर जाये, पड़ जाये
खनक कर भनक कर
लड़ जाये भिड़ जाये

लगता है बैठा हूँ
भूतों के डेरे में
सजे हुए सीलबंद
एक बड़े कमरे में

सदियों से दूर
किसी अंधे उजियाले में
अपनों से दूर
किसी पिरामिडी घेरे में

एकटक घूर रहीं
मुझ को बस दीवारें
जी करता उन पर जा
यह मत्था दे मारें

चिल्ला कर गूँजों से
पत्थर को थर्रा दें
घेरी खामोशी की
दीवारें बिखरा दें

इन मुरदा महलों की
मीनारें हिल जायें
इन रोगी ख्य़ालों की
सीमाएँ घुल जायें

अन्दर से बाहर आ
सदियों की कुंठाएँ
बहुत बड़े जीवन की
हलचल से मिल जायें


-कुँवर नारायण
(तीसरा सप्तक से)

घर रहेंगे

घर रहेंगे
हमीं उनमें रह न पायेंगे
सत्य होगा
हम अचानक बीत जायेंगे
अनर्गल ज़िन्दगी ढोते
किसी दिन हम
एक आशय तक पहुँच
सहसा बहुत थक जायेंगे

मृत्यु होगी खड़ी
सम्मुख राह रोके
हम जगेंगे
यह विवधता स्वप्न खो के
और चलते भीड़ में
कन्धे रगड़ कर हम
अचानक जा रहे होंगे कहीं
सदियों अलग हो के

प्रकृति औ पाखण्ड के
ये घने लिपटे
बँटे, ऐंठे तार
जिन से कहीं गहरा
कहीं सच्चा
मैं समझता प्यार
मेरी अमरता की
नहीं देंगे ये दुहाई
छीन लेगा इन्हें
हमसे देह-सा संसार

राख-सी साँझ
बुझे दिन की घिर जायेगी
वही रोज संसृति का
अपव्यय दुहरायेगी

-कुँवर नारायण
(तीसरा सप्तक से)