Monday, August 08, 2022

दिशा भरम

दुविधाओं की पगडण्डी पर 
भटके जनम-जनम
जितने जीवन में चौराहे 
उतने दिशा भरम 

धीरज संयम और सबूरी 
शब्द बहुत ही हलके 
अधरों से जब पीर छुपाओ 
आँखों से क्यों छलके 
ऊपर-ऊपर बर्फ़ भले हो 
भीतर धरा गरम
जितने जीवन में...

फटे हुए अंतः वस्त्रों पर 
रोज़ नयी पोशाकें 
आज़ादी का जश्न दासियाँ 
घूँघट में से ताकें 
ऊपर जितना तेज उजाला 
नीचे उतना तम
जितने जीवन में... 

भीतर पानी में जीवन है 
भले जमी हो काई 
पिंजरे की चिड़िया सपने में 
अम्बर तक हो आयी 
मन की अपनी मुक्त उड़ाने 
तन के सख़्त नियम 
जितने जीवन में चौराहे 
उतने दिशा भरम 

-संध्या सिंह

वर्षा-दिनः एक आफि़स

जलती-बुझती रही
दिवस के ऑफ़िस में बिज़ली।
वर्षा थी,
यों अपने घर से 
धूप नहीं निकली।

सुबह-सुबह आवारा बादल 
गोली दाग़ गया
सूरज का चपरासी डरकर
घर को भाग गया
गीले मेज़पोश वाली-
भू-मेज़ रही इकली
वर्षा थी, यूँ अपने घर से 
धूप नहीं निकली।

आज न आई आशुलेखिका 
कोई किरण-परी
विहग-लिपिक ने
आज न खोली पंखों की छतरी
सी-सी करती पवन
पिच गई स्यात् कहीं उँगली।
वर्षा थी, यों अपने घर से 
धूप नहीं निकली

ख़ाली पड़ी सड़क की फ़ाइल 
कोई शब्द नहीं
स्याही बहुत
किंतु कोई लेखक उपलब्ध नहीं
सिर्फ़ अकेलेपन की छाया
कुर्सी से उछली।
वर्षा थी, यों अपने घर से 
धूप नहीं निकली

-कुँअर बेचैन

Saturday, August 06, 2022

उतनी दूर पिया तू मेरे गाँव से

जितनी दूर नयन से सपना
जितनी दूर अधर से हँसना
बिछुए जितनी दूर कुँआरे पाँव से।
उतनी दूर पिया तू मेरे गाँव से।।

हर पुरवा का झोंका तेरा घूँघरू
हर बादल की रिमझिम तेरी भावना
हर सावन में तेरे आँसू की व्यथा
हर कोयल की ‘कुहू’ में तेरी कल्पना
जितनी दूर खुशी हर ग़म से
जितनी दूर साज़ सरगम से
जितनी दूर पात पतझर का, छाँव से।
उतनी दूर पिया तू मेरे गाँव से।।

हर पत्ते में तेरा हरियाला बदन
हर कलिका में तेरी ही प्रिय साधना
हर डाली में तेरे तन की झाँइयाँ
हर मंदिर में तेरी ही आराधना
जितनी दूर रूप घूँघट से
जितनी दूर प्यास पनघट से
गागर जितनी दूर नीर की ठाँव से।
उतनी दूर पिया तू मेरे गाँव से।।

क्या है, कैसा है, कैसे मैं यह कहूँ
तुझसे दूर, अपरिचित, फिर भी प्रीत है
है इतना मालूम कि तू हर साँस में
बसा हुआ जैसे मन में संगीत है
जितनी दूर लहर हर तट से
जितनी दूर शोखियाँ लट से
जितनी दूर याद कागा की काँव से।
उतनी दूर पिया तू मेरे गाँव से।।
             
             
-डा० कुँअर बेचैन

सपने में आये हो बैठो

सपने में आये हो बैठो
कोई बात करो।
मौसम बहुत उदार यहाँ का
उर का ताप हरो।।

स्वप्न-देश में मेरा शासन
मैं ही इसकी रानी
सुधियाँ तुम्हें खींच लाई हैं
करने को मनमानी
निष्कासित हर नियम यहाँ से,
मन चाहा बिचरो।
सपने में आये हो बैठो
कोई बात करो।।

बैसे तो मैं मात्र व्यथा हूँ
सपने में हूँ नारी
पढ़कर नयन हृदय पर लिख दूँ
भाषा अति शृंगारी
ऐसे में मत रहो देवता
मानव बन निखरो।
सपने में आये हो बैठो
कोई बात करो।।

जागूँ तो कबीर की साखी
सोऊँ, पंक्ति बिहारी
मुख खोलूँ तो बंजारिन हूँ
घूँघट में ब्रजनारी
विद्यापति की मुखर नायिका
इतना ध्यान धरो।
सपने में आये हो बैठो
कोई बात करो।।
   
-ज्ञानवती सक्सेना

Tuesday, July 26, 2022

तुम कुछ मत कहना

 बेटा ! 
निर्वाचित प्रधान से
तुम कुछ मत कहना

चाहें कायाकल्प
गाँव से कोसों दूर रहे
या गलियों में
जातिवाद वाला दस्तूर रहे
तुम तो 
अपनी लघुता की
सीमाओं में रहना
बेटा ! ... 

ग्राम सभा वाली 
ज़मीन पर लाठी चलनी है
और विपक्षी के 
खेतों से सड़क निकलनी है
अभी
रक्त को भी है 
फूटे सिर में से बहना
बेटा ! ... 

जत्था रहता है
प्रधान के साथ दबंगों का
जो कट्टर दुश्मन है
मानवता के अंगों का
और
समझता है जो
हिंसा को अपना गहना
बेटा ! ... 

-विवेक चतुर्वेदी

Sunday, July 24, 2022

पारिजात के फूल

सारी रात झरे आँगन में
पारिजात के फूल

महके प्राण-प्रणव, जागे हैं
अनगिन सुप्त शिवाले
कई अबूझी रही सुरंगें
फैले भोर उजाले
दीप-दान करती सुहागिनें
द्वार नदी के कूल

वन-प्रांतर में मृग-शावक-दल
भरने लगे कुलाँचें
बिना मेघ, नभ के जादू से
मन-मयूर भी नाचे
झूम-झूम कर पेड़ों ने, है
झाडी़ लिपटी धूल

ले सुदूर से आये पाखी
मनभावन संदेशे
देह-देह झंकृत वीणा-सी
पुलकन रेशे-रेशे
दूब गलीचे बिछे, हटे हैं
यात्रा-पथ के शूल

-शशिकांत गीते

तुम निश्चिन्त रहना

कर दिये, लो आज गंगा में प्रवाहित
सब तुम्हारे पत्र, सारे चित्र
तुम निश्चिन्त रहना

धुंध डूबी घाटियों के इंद्रधनु तुम
छू गया नत भाल, पर्वत हो गया मन
बूँद भर जल बन गया पूरा समुन्दर
पा तुम्हारा दुख, तथागत हो गया मन
अश्रु-जन्मा गीत-कमलों से सुवासित
यह नदी होगी नहीं अपवित्र
तुम निश्चिन्त रहना

दूर हूँ तुम से, न अब बातें उठेंगी
मैं स्वयं रंगीन दर्पन तोड़ आया
वह नगर, वह राजपथ, वे चौक-गलियाँ
हाथ अंतिम बार सबको जोड़ आया
थे हमारे प्यार से जो-जो सुपरिचित
छोड़ आया वे पुराने मित्र
तुम निश्चिन्त रहना

लो, विसर्जन आज बासंती छुअन का
साथ बीने सीप-शंखों का विसर्जन
गुँथ न पाये कनुप्रिया के कुंतलों में
उन अभागे मोरपंखों का विसर्जन
उस कथा का जो न हो पायी प्रकाशित
मर चुका है एक एक चरित्र
तुम निश्चिन्त रहना
         
-किशन सरोज

Wednesday, July 06, 2022

साधो दरस परस सब छूटे

 साधो दरस परस सब छूटे 
सूख गई पन्नों की स्याही 
संवादों के रस छूटे
साधो! दरस परस सब छूटे।

मृत अतीत की नई व्याख्या 
पढ़ना सुनना है
शेष विकल्प नहीं अब कोई 
फिर भी चुनना है
रातें और संध्याएँ छूटीं 
अब कुनकुने दिवस छूटे 
साधो! दरस परस सब छूटे।

नहीं निरापद हैं यात्राएँ 
उठते नहीं कदम
रोज-रोज सपनों का मरना
देख रहे हैं हम
हाथों से उड़ गए कबूतर 
कौन बताए कस छूटे
साधो! दरस परस सब छूटे।

आदमकद हो गए आइने
चेहरे बौने हैं
नोन, राई, अक्षत,सिंदूर के
जादू-टोने के
लहलहाई अपयश की फसलें 
जनम-जनम के यश छूटे 
साधो! दरस परस सब छूटे।
     
-शिवकुमार अर्चन

Wednesday, June 08, 2022

नवगीत

नवगीत

Sunday, October 24, 2021

गाँव नहीं छोड़ा


दरवाजे का
आम-आँवला 
घर का तुलसी-चौरा 
इसीलिए!
अम्मा ने अपना
गाँव नहीं छोड़ा 
           
पैबन्दों को सिलते
मन से उदास होती 
भैया के आने की खुशबू
भर से खुश होती 
भाभी ने
कितना समझाया
मान नहीं तोड़ा 
   
कभी-कभी
बजते घर में 
घुंँघरू से पोती-पोते 
छोटे-छोटे बँटे बताशे 
हाथों के सुख होते 
घर की खातिर
लुटा दिया सब
रखा न कुछ थोड़ा 

गहना बनने
वाले दिन में 
खेत खरीद लिये 
बाबूजी के
कहे हुए सब
सपने संग लिए 
सह न सकी
जब खूँटे पर से
गया बैल जोड़ा
         
-डा० शांति सुमन

Friday, October 01, 2021

राधे-राधे


उतरी, चढ़ी 
रात की दारू
उठ बैठा
मुँह खोल रहा है।
राधे-राधे बोल रहा है।

कहता है जी 
गौ दर्शन से 
सारे काज सम्हर जाते हैं
कोष पाप का 
खाली होता
मंगल के अवसर आते हैं।
लगा ठेलने 
केवल अपनी
चिंतन सारा गोल रहा है।
राधे-राधे  बोल  रहा  है।

लूट-पाट की 
बना योजना
वंशी वाले की जय बोले।
धीरे-धीरे 
दाँव-पेंच की 
खुद ही अपनी गुत्थी खोले।
ढोंग-फरेबी, 
जीवन रस में
कालकूट ही घोल रहा है।
राधे - राधे  बोल  रहा  है।

लाज रखेगा
डमरू वाला 
अपनी नैया पार करेगा।
जो चलता है 
चले हमेशा
वह खाली भंडार भरेगा।
हर-हर गंगे 
बोल-बोल कर 
ज़बरन पानी ढोल रहा है।
राधे - राधे  बोल  रहा   है।

प्रथम लक्ष्मी 
मध्य शारदा
और मूल में है गोविंदा।
करतल दर्शन
करता उठकर 
खाने को है मुर्गा ज़िन्दा।
खुल कर पूरा
भीतर-भीतर
बाहर हमें टटोल रहा है।
राधे- राधे  बोल रहा  है।

-मनोज जैन

Monday, September 20, 2021

छितराई शाम

दोपहरी सिमट गई
छितराई शाम
           
सूरज ने पश्चिम की
फाँदी दीवार
धरती में पसर गया
साँवल अँधियार
रोशनियाँ सड़कों की
हुई टीम- टाम
दोपहरी सिमट गई
छितराई शाम
            
फूलों ने उढ़काए
द्वार के कपाट
सैलानी भौंरे तब
हुए घाट-बाट
सोच रहे कैसे अब
छलकाएँ जाम
दोपहरी सिमट गई
छितराई शाम
            
अंबर में बगुलों की
सितबरनी पाँत
संध्या रानी के ज्यों
मोती-से दाँत
नीड़ों में पक्षी गण 
करते विश्राम
दोपहरी सिमट गई
छितराई शाम
           
माधो मछुआरे ने
बाँध लिया जाल
लौट चला फिर उसको
काँधे में डाल
मंदिर के पिछवाड़े
फेंककर प्रणाम
दोपहरी सिमट गई
छितराई शाम
           
-ईश्वरी प्रसाद यादव

Thursday, August 19, 2021

सोने के हिरन नहीं होते


आधा जीवन जब बीत गया
बनवासी-सा गाते-रोते
अब पता चला इस दुनिया में
सोने के हिरन नहीं होते।

सम्बन्ध सभी ने तोड़ लिए
चिन्ता ने कभी नहीं तोड़े
सब हाथ जोड़कर चले गये
पीड़ा ने हाथ नहीं जोड़े

सूनी घाटी में अपनी ही
प्रतिध्वनियों ने यों छला हमें
हम समझ गये पाषाणों में-
वाणी, मन, नयन नहीं होते।

मन्दिर-मन्दिर भटके-लेकर,
खंडित विश्वासों के टुकड़े
उसने ही हाथ जलाये, जिस-
प्रतिमा के चरण युगल पकड़े

जग जो कहना चाहे, कह ले
अविरल दृग जल धारा बह ले
पर जले हुए इन हाथों से
हमसे अब हवन नहीं होते।

-कन्हैयालाल बाजपेयी

Friday, August 13, 2021

सब को अन्न खिलाने वाला

 सब को
अन्न खिलाने वाला
कब तक भूखा सोयेगा
सब्र 
कभी तो खोयेगा! 

खाद, बीज
आकाश छू रहे 
डीजल ने भी
पर खोले
दिल्ली 
नहीं किसी की सुनती
कोई
कितना  भी बोले
भूमि-पुत्र कब तक
अपनी
इस बदहाली पर रोयेगा
सब्र कभी तो...... 

खेती का भी
एक गणित है
लगता है सीधा सादा
सस्ती उपज, 
आय भी कम है, 
लागत इसमें है ज़्यादा
घाटे के 
इस सौदे पर वह
कब तक सपने बोयेगा.
सब्र कभी तो........

धरा पुत्र है
शूरवीर ये
चौड़ा है इसका सीना
बाधाओं से 
रहा जूझता
सीखा कष्टों में जीना
भ्रष्ट-तंत्र 
बढ़ रहा 'कूकणा'
लुटिया यही डुबोयेगा
सब्र कभी........ 

-राय कूकणा

Friday, June 11, 2021

कुछ भी बदला नहीं फलाने

 कुछ भी बदला नहीं फलाने
सब जैसा का तैसा है
सब कुछ पूछो
यह मत पूछो
आम आदमी कैसा है

क्या सचिवालय
क्या न्यायालय
सबका वही रवैय्या है
बाबू बड़ा ना
भैय्या प्यारे
सबसे बड़ा रुपैय्या है
पब्लिक जैसे
हरी फसल है
शासन भूखा भैंसा है

मंत्री के
पी.ए. का नक्शा
मंत्री से भी हाई है
बिना कमीशन
काम न होता
उसकी यही कमाई है
रुक जाता है
कहकर फौरन
देखो भाई ऐसा है

मनमाफिक
सुविधाएँ पाते
हैं अपराधी जेलों में
कागज पर
जेलों में रहते
खेल दिखाते मेलों में
जैसे रोज
चढ़ावा चढ़ता
इन पर चढ़ता पैसा है

-कैलाश गौतम

Saturday, May 08, 2021

खोजें छोर-किनारा


मज़लूमों की
छत के नीचे
मिले नौकरी-चारा 
ऐसा हो
संघर्ष हमारा।

सबको
आदर-भाव
सौंप दें
समता-बीज पड़ें 
द्वेष-घृणा
चिन्तन से
निकलें
उन्नत पाँव बढ़ें
कृषक
मजूरों के
जीवन में
लौटे हर्ष दुबारा
ऐसा हो
संघर्ष हमारा।

एक वर्ण 
मानवता पा ले
जाति भेद
से दूरी
ऊँच-नीच की
कारा टूटे
कुछ भी
हो मजबूरी 
रार बिना मिल
जाने वाला
खोजें छोर-किनारा
ऐसा हो 
संघर्ष हमारा।

आंँस चटकती
काँच सरीखी
हिम्मत मांँगे पानी
रोज़नदारी 
लिये आस्था
पूजे गाँव गिरानी
नाक सभी
चेहरों पर आये
ब्याहें सपन कुँवारा
ऐसा हो
संघर्ष हमारा।

-रामकिशोर दाहिया

Monday, April 05, 2021

सरकारी अमला

फिर किसान की
खेती उजरी
पाला मार गया
शासन का
सरकारी अमला
पल्ला झार गया 

देने लगे
दलीलें कहते-
बीमा फसल
किसानी
शर्ते नियम
कम्पनी समझे
कौन भरे नुकसानी
हाल झूल से
गाल गूल तक
टूट करार गया 

लागत लौटी
नहीं खेत से
उस पर बनी-मजूरी
रकम शेष है
खाद-बीज की
जोत-सिंचाई पूरी
सिर पर लादे
कर्ज़ रोटियाँ
बढ़ता भार गया 

फुर्सत नहीं
रोग दम तोड़े
आफत और नई
खड़ी मूड़ पर
चिन्ता बिटिया
समधी खोज गई
बिना तेल की
बाती फागुन
फिर उकसार गया 
        
 -रामकिशोर दाहिया

उल्टी धार बहें

भागदौड़ की
रोटी देखें
या फिर भूख सहें 
किसको पकड़ें
किसको छोड़ें
किसके बीच रहें ?

शक्कर, दूध,
चाय की पत्ती
सब्जी, गरम मसाला
दिन निकले से
ढले साँझ हम
लौटे लिये निवाला
रिश्ते-नाते
मीत, पड़ोसी
उल्टी धार बहें 

घिरनी जैसा
रोज़ घूमना
दम से दम को साधे
काम-काज में
कम पड़ते हैं
चौबिस घण्टे आधे
घण्टे, घड़ी,
मिनट सब तड़के
उठतै उठत दहें 

दफ्तर के
आदेश कायदे
घर को नाच नचाते
मन का चैन
खुशी के पल छिन
लम्बे पाँव लगाते
हुकुम बजाकर
बीवी- बच्चे
कितना और ढहें 
              
      -रामकिशोर दाहिया

Sunday, April 04, 2021

मैं दुःख का जश्न मनाऊँगा


तुम दरबारों के गीत लिखो
मैं जन की पीड़ा गाऊँगा.

लड़ते-लड़ते तूफानों से
मेरे तो युग के युग बीते
वीभत्स अभावों का साया
आकर हर रोज डराता है.
मैं क्या जानूँ सोने-से दिन
क्या जानूँ चाँदी-सी रातें
जो भोग रहा हूँ रात-दिवस
मेरा तो उससे नाता है.

तुम सोने-मढ़ा अतीत लिखो
मैं अपना समय सुनाऊँगा.

जो भोगा पग-पग वही लिखा
जैसा हूँ मुझमें वही दिखा
मैं कंकड़-पत्थर-काँटों पर
हर मौसम चलने का आदी.
वातानुकूल कक्षों में शिखरों-
की प्रशस्ति के तुम गायक
है मिली हुई जन्मना तुम्हें
कुछ भी करने की आजादी.

तुम सुख-सुविधा को मीत चुनो
मैं दुःख का जश्न मनाऊँगा.

आजन्म रही मेरे हिस्से
निर्मम अँधियारों की सत्ता
मुझ पर न किसी पड़ी दृष्टि
मैं अनबाँचा अनलिखा रहा.
मुस्तैद रहे हैं मेरे होंठों पर 
सदियों- सदियों ताले
स्वर अट्ठहास के गूँज उठे
जब मैंने अपना दर्द कहा.

तुम किरन-किरन को क़ैद करो
मैं सूरज नया उगाऊँगा .

-जय चक्रवर्ती
   

Thursday, March 18, 2021

इतना भी आसान कहाँ है


इतना भी 
आसान कहाँ है
पानी को पानी कह पाना! 

कुछ सनकी
बस बैठे ठाले
सच के पीछे पड़ जाते हैं
भले रहें गर्दिश में
लेकिन अपनी
ज़िद पर अड़ जाते हैं
युग की इस
उद्दण्ड नदी में
सहज नहीं उल्टा बह पाना! 
इतना भी.... !! 

यूँ तो सच के 
बहुत मुखौटे
कदम-कदम पर
दिख जाते हैं
जो कि इंच भर
सुख की ख़ातिर
फुटपाथों पर
बिक जाते हैं 
सोचो! 
इनके साथ सत्य का
कितना मुश्किल है रह पाना! 
इतना भी............. !! 

जिनके श्रम से
चहल-पहल है
फैली है
चेहरों पर लाली
वे शिव हैं
अभिशप्त समय के
लिये कुण्डली में
कंगाली
जिस पल शिव,
शंकर में बदले
मुश्किल है ताण्डव सह पाना
इतना भी........

-डा० जगदीश व्योम

बंद करो ये लिखना-विखना



सच लिखने से डर लगता है?
बंद करो, 
ये लिखना- विखना !

कब तक गाओगे -
मुखड़ा है 
चाँद का टुकड़ा'
देखा है क्या 
मुखड़े के पीछे का 
दुखड़ा 
दरबारों में 
लोट लगाते रहना है तो-
छोड़ो ये कवि जैसा दिखना !

दुःख में, पीड़ा में, 
चिन्ता में
बोलो-कब-कब मुस्काये हो
जो औरों से कहते हो,
क्या-
खुद भी वह सब कर पाये हो
पहले तो अपने को बाँचो
फिर 
दुनिया पर कविता लिखना!

पैदा करो 
एक चिनगारी प्रतिरोधों की-
संवेदन की
और दहकने दो भट्ठी
पल-प्रतिपल
अपने अंतर्मन की 
सीखो कविवर ,
इस भट्ठी में सुबह-शाम
रोटी-सा सिंकना !

-जय चक्रवर्ती

Thursday, November 19, 2020

किरन बसी फुनगी पर


किरन बसी फुनगी पर
जड़ से खानापूरी है
पूछ रही झोपड़ी
महल से
कितनी दूरी है।

कुछ सूखा अकाल को
अर्पित कुछ
भूचालों को
खोल न पाया कोई
लोकतंत्र के
तालों को
व्यर्थ कल्पना
अच्छे दिन की
आस अधूरी है।

समझ न पाये,
राजनीति में
जुमलों की भाषा
चाहत थी सोने की
हाथों में
पीतल-काँसा
चर्चायें उम्मीदों की
अब गै़र ज़रूरी हैं।

कहते हैं कुछ लोग
रोशनी
आयातित होगी
आगामी पीढ़ी
आजीवन
इन्द्रियजित होगी
मिलती है
सांत्वना रात में
सुबह सिंदूरी है।

पकती है
सदियों से
चतुर वीरबल की खिचड़ी
बाबा भूखे गये
भरोसे की
बगिया उजड़ी
ठठरी पर है चाम
ज़िन्दगी में बेनूरी है।

-मधुकर अष्ठाना

Wednesday, October 21, 2020

किन्तु इनका क्या करें ?

खिड़कियों में घन बरसते

द्वार पर पुरवा हवा..
पाँच-तारी चाशनी में पग रहे
सपने रवा !
किन्तु इनका क्या करें ?

क्या पता आये न बिजली
देखना माचिस कहाँ है
फैलता पानी सड़क का
मूसता चौखट जहाँ है
सिपसिपाती चाह ले
डूबा-मताया घुस रहा है
हक जमाता है धनी-सा
जो न सोचे.. ’क्या यहाँ है ?’

बंद दरवाजा, खुला बिस्तर,
पड़ी है कुछ दवा..
किन्तु इनका क्या करें ?

मात्र पद्धतियाँ दिखीं  
प्रेरक कहाँ सिद्धांत कोई
कुछ करें मंथन,
विचारों में उलझ उद्भ्रान्त कोई
चढ़ रहा बाज़ार
फिर भी क्यों टपकता है पसीना ?
सूचकांकों के गणित में
पिट रहा है क्लान्त कोई

एक नचिकेता नहीं 
लेकिन कई वाजश्रवा
किन्तु इनका क्या करें ?

सिमसिमी-सी मोमबत्ती
एक कोने में पड़ी है
पेट-मन के बीच, पर,
खूँटी बड़ी गहरी गड़ी है
उठ रही
जब-तब लहर-सी
तर्जनी की चेतना से,
ताड़ती है आँख जिसको
देह-बन्धन की कड़ी है

फिर दिखी है रात जागी
या बजा है फिर सवा..
किन्तु इनका क्या करें ?


-सौरभ पाण्डेय
एम-2 / ए-17, ए.डी.ए. कॉलोनी
 नैनी, इलाहाबाद - 211008
संपर्क - 9919889911

Tuesday, October 06, 2020

हवा आयी गंध आयी गीत भी आये

हवा आयी
गंध आयी
गीत भी आये
पर तुम्हारे पाँव
देहरी पर नहीं आये


अब गुलाबी होंठ से
जो प्यास उठती है
वह कंटीली डालियों पर
सांस भरती है
नील नभ पर
अश्रु–सिंचित
फूल उग आये


तितलियों की
धड़कने
चुभती लताओं पर
डोलती चिनगारियाँ
काली घटाओं पर
इन्द्रधनु–सा
झील में
कोई उतर आये

झर रहे हैं चुप्पियों की
आँख से सपने
फिर हँसी के पेड़ की
छाया लगी डसने
शब्द आँखों से
निचुड़ते
आग नहलाये

–डॉ० ओम प्रकाश सिंह

हम उदास हैं और नदी में आग लगी है

 हम उदास हैं
और नदी में आग लगी है
कैसा है दिन
 
अंधे सपनों का आश्वासन
हमें मिला है
नदी-किनारे फिर
ज़हरीला फूल खिला है
दिन-भर सोई
आँख बावरी रात जगी है
कैसा है दिन
छली हवाओं ने
जंगल में पतझर बाँटे
सीने में चुभ रहे
सैकड़ों पिछले काँटे
 बस्ती-बस्ती
शाहों की चल रही ठगी है
कैसा है दिन
आदमक़द कारों से निकले
चौपट बौने
सहमे घूम रहे हैं
जंगल में मृगछौने
धुनें पराई
हम सबको लग रहीं सगी हैं
कैसा है दिन

-कुमार रवीन्द्र