कब तक सहती बाँध धैर्य का
आखिर तोड़ दिया
जिस आँगन में डोली उतरी
उसने छोड़ दिया।
मुड़-मुड़ दृष्टि यातनागृह को
पीछे देख रही
बोले नील निशान देह के
बस अब और नहीं
एक अकेले पहिए पर
रथ उसने मोड दिया।
बाँह गहे को अरसा गुजरा
उपजा नहीं भरोसा
सजा-सजाकर उसने खुद को
कितनी बार परोसा
रिश्ते का नासूर आज खुद
उसने फोड़ दिया।
दुनिया की क्या चिंता
यह तो कुछ भी कहती है
तोड़ शिलाएँ नदिया भी तो
मरु में बहती है
इसी भाव से क्षण भर उसने
खुद को जोड़ लिया।
-रामशंकर वर्मा
आखिर तोड़ दिया
जिस आँगन में डोली उतरी
उसने छोड़ दिया।
मुड़-मुड़ दृष्टि यातनागृह को
पीछे देख रही
बोले नील निशान देह के
बस अब और नहीं
एक अकेले पहिए पर
रथ उसने मोड दिया।
बाँह गहे को अरसा गुजरा
उपजा नहीं भरोसा
सजा-सजाकर उसने खुद को
कितनी बार परोसा
रिश्ते का नासूर आज खुद
उसने फोड़ दिया।
दुनिया की क्या चिंता
यह तो कुछ भी कहती है
तोड़ शिलाएँ नदिया भी तो
मरु में बहती है
इसी भाव से क्षण भर उसने
खुद को जोड़ लिया।
-रामशंकर वर्मा