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March 31, 2013

कागज का भी मन होता है

कागज का भी मन होता है
हर क्षण मन में उल्लास भरे
आशा का हार पिरोता है

इसका वक्षस्थल मत चीरो
कोमल स्पर्श करो भाई
इसमें बलिदानी सोए हैं
वीरों की संचित तरुणाई
इस पर फूहड़पन मत परसो
लज्जा से नयन भिगोता है

जब मन की कुछ बातों का हो
अधरों पर लाना बहुत कठिन
जब आतुर मन तय करता हो
लम्बी रातें तारे गिन-गिन
वाणी का तब वाहक बनकर
प्रियतम का प्राण बिलोता है

परदेश गये बेटे की माँ
जब कोई ख़बर नहीं पाती
ऐसा होगा, वैसा होगा
यह सोच-सोच धड़के छाती
तब काग़ज़ उसका नाम लिखा
माँ के मन चन्दन बोता है

गीता, कुरान, गुरुग्रन्थ और
बाइबिल इसकी ही है महिमा
रसखान, बिहारी, तुलसी की
इसके कारण ही है गरिमा
जो सादर पलकों पर रखता
वह अमर जगत में होता है
काग़ज़ का भी मन होता है।

-डा० विजेन्द्र पाल शर्मा
( "कागज का भी मन होता है" गीत संग्रह से साभार )