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March 10, 2012

सुनो कबीर

सुनो, कबीर
बचाकर रखना
अपनी पोथी.
सरल नहीं
गंगा के तट पर
बातें कहना  .
घडियालों  ने
मानव बनकर
सीखा रहना .
हित की बात
जहर सी लगती
लगती थोथी

बाहर कुछ
अन्दर से कुछ हैं
दुनिया वाले .
उजले लोग
मखमली कपड़े
दिल है काले.

सब ने रखी
ताक पर जाकर
गरिमा जो थी

-त्रिलोक सिंह ठकुरेला 

July 18, 2011

नया दौर

परिवर्तन के
नये दौर मे
सब कुछ बदल गया ।

भूली कोयल
गीत सुरीले
मँहगाई की मारी
उपवन में
सन्नाटा छाया
पसर गई लाचारी
कैसे जुटें
नीड़ के साधन
व्याकुल हुई बया ।

जानबूझ कर बन्दर
मिलकर
मस्ती मार रहे
जहाँ लग रहा दाँव
वहीं से
माल डकार रहे
कोई जिये, मरे
उनको क्या
उन्हें न हया, दया ।

जंगल के राजा ने
सुनकर
राशन भिजवाया
कुछ को थोड़ा बाँट
तिकड़मी
जोड़ रहे माया
मन में लड्डू फूट रहे
संसाधन
मिला नया ।
परिवर्तन के
नये दौर मे
सब कुछ बदल गया ।।

-त्रिलोक सिंह ठकुरेला

July 6, 2011

शंखनाद के सुर

अंधा राजा,
मौन सभासद,
दुःखी हस्तिनापुर।
जगह जगह पर
द्यूत-सभा के
मंडप सजे हुए
और पाण्डवों के
चेहरों पर
बारह बजे हुए
चीरहरण के लिए
दुःशासन
बार-बार आतुर।

भीष्म
उचित अनुचित की
गणना करना भूल रहे
विवश प्रजा के सपने
बीच हवा में
झूल रहे
छिपी कुटिलता
चट कर जाती
सच के नव अंकुर।

होगा
आने वाले कल में
एक महाभारत
कुटिल कौरवों को
फिर करना होगा
क्षत विक्षत
सुनने में आ रहे
अभी से
शंखनाद के सुर।

-त्रिलोक सिंह ठकुरेला

June 2, 2011

करघा व्यर्थ हुआ

करघा व्यर्थ हुआ
कबीर ने
बुनना छोड़ दिया

काशी में
नंगों का बहुमत
अब चादर की
किसे ज़रूरत
सिर धुन रहे कबीर
रुई का
धुनना छोड़ दिया ।

धुंध भरे दिन
काली रातें
पहले जैसी
रही न बातें
लोग काँच पर मोहित
मोती
चुनना छोड़ दिया ।

तन-मन थका
गाँव-घर जाकर
किसे सुनायें
ढाई आखर
लोग बुत हुए
सच्ची बातें
सुनना छोड़ दिया ।
करघा व्यर्थ हुआ
कबीर ने
बुनना छोड़ दिया ।

-त्रिलोक सिंह ठकुरेला