बिना किसी गंतव्य लक्ष्य के
पत्थर बाँधे हुए पाँव मेंहम भी खूब फिरे।
यही बहुत है, फिसले, सम्हले
लेकिन नहीं गिरे
कई बार निष्ठायें बदलीं
कई बार पाले
तोड़ नहीं पाये खुद ऐसे
बाँधे थे जाले
यही बहुत है हाथों से बस
छूटे नहीं सिरे।
जो जिसने कह दिया उसे ही
सत्य वचन माना
दृष्टि बाँध ली पहले फिर
जंगल-जंगल छाना
यही बहुत है इन्द्रजाल में
ज्यादा नहीं घिरे।
नदी नाव संयोग सभी ने
कितनी बार छला
बार-बार आशंकाओं ने
मुख पर रंग मला
यही बहुत है टूटे लेकिन
कभी नहीं बिखरे।
-सुशील सरित
-( सम्यक, नवगीत विशेषांक से साभार)