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November 26, 2023

उतनी दूर पिया तू मेरे गाँव से

                                [डॅा. कुँअर बेचैन जी का एक गीत]

जितनी दूर नयन से सपना
जितनी दूर अधर से हँसना
बिछुए जितनी दूर कुँआरे पाँव से
उतनी दूर पिया तू मेरे गाँव से!

हर पुरवा का झोंका तेरा घूँघरू
हर बादल की रिमझिम तेरी भावना
हर सावन में तेरे आँसू की व्यथा
हर कोयल की ‘कुहू’ में तेरी कल्पना
जितनी दूर खुशी हर ग़म से
जितनी दूर साज़ सरगम से
जितनी दूर पात पतझर का, छाँव से
उतनी दूर पिया तू मेरे गाँव से!

हर पत्ते में तेरा हरियाला बदन
हर कलिका में तेरी ही प्रिय साधना
हर डाली में तेरे तन की झाँइयाँ
हर मंदिर में तेरी ही आराधना
जितनी दूर रूप घूँघट से
जितनी दूर प्यास पनघट से
गागर जितनी दूर नीर की ठाँव से
उतनी दूर पिया तू मेरे गाँव से!

क्या है, कैसा है, कैसे मैं यह कहूँ
तुझसे दूर, अपरिचित, फिर भी प्रीत है
है इतना मालूम कि तू हर साँस में
बसा हुआ जैसे मन में संगीत है
जितनी दूर लहर हर तट से
जितनी दूर शोखियाँ लट से
जितनी दूर याद कागा की काँव से
उतनी दूर पिया तू मेरे गाँव से!
                      
-डा० कुँअर बेचैन

August 8, 2022

वर्षा-दिनः एक आफि़स

जलती-बुझती रही
दिवस के ऑफ़िस में बिज़ली।
वर्षा थी,
यों अपने घर से 
धूप नहीं निकली।

सुबह-सुबह आवारा बादल 
गोली दाग़ गया
सूरज का चपरासी डरकर
घर को भाग गया
गीले मेज़पोश वाली-
भू-मेज़ रही इकली
वर्षा थी, यूँ अपने घर से 
धूप नहीं निकली।

आज न आई आशुलेखिका 
कोई किरण-परी
विहग-लिपिक ने
आज न खोली पंखों की छतरी
सी-सी करती पवन
पिच गई स्यात् कहीं उँगली।
वर्षा थी, यों अपने घर से 
धूप नहीं निकली

ख़ाली पड़ी सड़क की फ़ाइल 
कोई शब्द नहीं
स्याही बहुत
किंतु कोई लेखक उपलब्ध नहीं
सिर्फ़ अकेलेपन की छाया
कुर्सी से उछली।
वर्षा थी, यों अपने घर से 
धूप नहीं निकली

-कुँअर बेचैन

January 15, 2012

दिन दिवंगत हुए

रोज़ आँसू बहे रोज़ आहत हुए
रात घायल हुई, दिन दिवंगत हुए

हम जिन्हें हर घड़ी याद करते रहे
रिक्त मन में नई प्यास भरते रहे
रोज़ जिनके हृदय में उतरते रहे
वे सभी दिन चिता की लपट पर रखे
रोज़ जलते हुए आख़िरी ख़त हुए

शीश पर सूर्य को जो सँभाले रहे
नैन में ज्योति का दीप बाले रहे
और जिनके दिलों में उजाले रहे
अब वही दिन किसी रात की भूमि पर
एक गिरती हुई शाम की छत हुए !

जो अभी साथ थे, हाँ अभी, हाँ अभी
वे गए तो गए, फिर न लौटे कभी
है प्रतीक्षा उन्हीं की हमें आज भी
दिन कि जो प्राण के मोह में बंद थे
आज चोरी गई वो ही दौलत हुए

चाँदनी भी हमें धूप बनकर मिली
रह गई जिंन्दगी की कली अधखिली
हम जहाँ हैं वहाँ रोज़ धरती हिली
हर तरफ़ शोर था और इस शोर में
ये सदा के लिए मौन का व्रत हुए

-डॉ० कुँअर बेचैन

September 27, 2011

सोख न लेना पानी

सूरज !
सोख न लेना पानी 

तड़प तड़प कर मर जाएगी
मन की मीन सयानी !
सूरज, सोख न लेना पानी !

बहती नदिया सारा जीवन
साँसें जल की धारा
जिस पर तैर रहा नावों-सा
अँधियारा उजियारा
बूँद-बूँद में गूँज रही है
कोई प्रेम कहानी !
सूरज, सोख न लेना पानी !

यह दुनिया पनघट की हलचल
पनिहारिन का मेला
नाच रहा है मन पायल का
हर घुँघुरू अलबेला
लहरें बाँच रही हैं
मन की कोई बात पुरानी !
सूरज, सोख न लेना पानी !

-डॉ० कुँअर बेचैन

June 25, 2011

ओ वासंती पवन, हमारे घर आना

बहुत दिनों के बाद खिड़कियाँ खोली हैं
ओ वासंती पवन, हमारे घर आना।
जड़े हुए थे ताले सारे कमरों में
धूल भरे थे आले सारे कमरों में
उलझन और तनावों के रेशों वाले
पुरे हुए थे जाले सारे कमरों में
बहुत दिनों के बाद साँकलें डोली हैं
ओ वासंती पवन, हमारे घर आना।

एक थकन-सी थी नव भाव-तरंगों में
मौन उदासी थी वाचाल उमंगों में
लेकिन आज समर्पण की भाषा वाले
मोहक-मोहक, प्यारे-प्यारे रंगों में
बहुत दिनों के बाद खुशबुएँ घोली हैं
ओ वासंती पवन, हमारे घर आना।

पतझर ही पतझर था मन के मधुवन में
गहरा सन्नाटा-सा था अन्तर्मन में
लेकिन अब गीतों की स्वच्छ मुँडेरी पर
चिंतन की छत पर, भावों के आँगन में
बहुत दिनों के बाद चिरइयाँ बोली हैं
ओ वासंती पवन, हमारे घर आना।

-डॉo कुँअर बेचैन