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September 30, 2011

बांध गई मुस्कान किसी की


बांध गई मुस्कान किसी की
घेरों में
बिछुए से पड़ गए
कुआंरे पैरों में ।

धूप-धूप हो गईं
शिराएं
रक्तचाप छू गईं
हवाएँ
शब्द-वृत्त मदहोश
छुअन के
अर्थ-बोध
तुलसी-चंदन के
सांसें जैसे बंधी
सतपदी फेरों में ।

सूखे दिन
आसाढ़ हो गए
सपने तिल से
ताड़ हो गए
सन्नाटे लिख गए
समास अंधेरों में ।

-विजय किशोर मानव


( पूर्व कार्यकारी संपादक- कादम्बिनी )

September 16, 2011

नावें पत्थर की

यात्राएँ गंगा सागर की 
नावें पत्थर की
ऐसी बदल गयी है आवो-हवा 
शहर भर की ।

चोंच पसारे चिड़िया बीने
आँगन-आँगन दाना
स्वाती भर सीपियाँ देखतीं
बादल आना-जाना
सूरज छूने की इच्छाएँ, 
कैदें हैं घर की
यात्राएँ गंगा सागर की 
नावें पत्थर की ।

अक्षर-अक्षर स्याही आँजे
रंग पुते -से चेहरे
हमें मिली हैं आँखें
सुनने वाले सब बहरे
बाहर से मुस्काने लगतीं 
चोटें भीतर की
यात्राएँ गंगा सागर की 
नावें पत्थर की ।

खुले आम चुन दिये गये हैं
हम पूरे के पूरे
कोई रहे मदारी हमको
रहना सिर्फ जमूरे
हम झूठे ही मरे 
लाख क़समें खाईं सर की
यात्राएँ गंगा सागर की 
नावें पत्थर की ।

-विजय किशोर मानव