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June 15, 2023

एक बार और जाल

एक बार और जाल फेंक रे मछेरे !
जाने किस मछली में बन्धन की चाह हो !!

सपनो की ओस गूँथती कुश की नोंक है
हर दर्पण में उभरा एक दिवालोक है
रेत के घरौंदों में सीप के बसेरे
इस अँधेर में कैसे  नेह का निर्बाह हो ! 

उनका मन आज हो गया पुरइन पात है
भिगो नहीं पाती यह पूरी बरसात है
चन्दा के इर्द-गिर्द मेघों के घेरे
ऐसे में क्यों न कोई मौसमी गुनाह हो !

गूँजती गुफाओं में पिछली सौगन्ध है
हर चारे में कोई चुम्बकीय गन्ध है
कैसे दे हंस झील के अनंत फेरे
पग-पग पर लहरें जब बाँध रही छाँह हों !

कुंकम-सी निखरी कुछ भोरहरी लाज है
बंसी की डोर बहुत काँप रही आज है
यूँ ही न तोड़ अभी बीन रे सपेरे
जाने किस नागिन में प्रीत का उछाह हो !

-बुद्धिनाथ मिश्र

May 11, 2011

जाल फेंक रे मछेरे

एक बार और जाल फेंक रे मछेरे !
जाने किस मछली में बन्धन की चाह हो !!

सपनो की ओस गूँथती कुश की नोंक है
हर दर्पण में उभरा एक दिवालोक है
रेत के घरौंदों में सीप के बसेरे
इस अँधेर में कैसे  नेह का निर्बाह हो ! 

उनका मन आज हो गया पुरइन पात है
भिगो नहीं पाती यह पूरी बरसात है
चन्दा के इर्द - गिर्द मेघों के घेरे
ऐसे में क्यों न कोई मौसमी गुनाह हो !

गूँजती गुफाओं में पिछली सौगन्ध है
हर चारे में कोई चुम्बकीय गन्ध है
कैसे दे हंस झील के अनंत फेरे
पग-पग पर लहरें जब बाँध रही छाँह हों !

कुंकम-सी निखरी कुछ भोरहरी लाज है
बंसी की डोर बहुत काँप रही आज है
यूँ ही न तोड़ अभी बीन रे सपेरे
जाने किस नागिन में प्रीत का उछाह हो !