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October 13, 2022

प्रहर,दिवस, मास, वर्ष बीते

प्रहर,दिवस, मास, वर्ष बीते
जीवन का कालकूट पीते.

पूँछें उपलब्धियाँ हुईं
खेलते हुए साँप-सीढ़ी
मंत्रित-निस्तब्ध सो गयी
युद्ध-भूमि में युयुत्सु पीढ़ी
कंधों पर ले निषंग रीते
प्रहर,दिवस, मास...

खुद ही अज्ञातवास ओढ़कर 
धनञ्जय बृहन्नला हुआ 
मछली फिर तेल पर टँगी है
धनुष पड़ा किंतु अनछुआ 
कौन इस स्वयंवर को जीते
प्रहर,दिवस, मास...

जाने कैसा निदाघ तपता है
आग भर गयी श्यामल घन में
दावानल कौन बो गया
चीड़-शाल-देवदारु-वन में
अकुलाये सिंह-व्याघ्र-चीते
प्रहर,दिवस, मास...

-धनञ्जय सिंह

May 17, 2011

गमलों में उग आई नागफनी

हमने कलमें गुलाब की रोपी थीं
पर गमलों में उग आई नागफनी

जीवन ऐसे मोड़ों तक आ पहुँचा
आ जहाँ हृदय को सपने छोड़ गये
मरघट की सूनी पगडंडी तक ज्यों
कंधा दे शव को अपने छोड़ गये
सावन-भादो के मेघों के जैसा
मन भर-भर आया पीड़ा हुई घनी
हमने कलमें गुलाब की रोपी थीं
पर गमलों में उग ...

आशा के सुमन महक तो जाते पर
मुस्कानों वाले भ्रम ने मार दिया
पतझर को तो बदनामी व्यर्थ मिली
हमको मादक मौसम ने मार दिया
पूजन से तो इनक़ार नहीं था पर
अपने घर की मंदिर से नहीं बनी
हमने कलमें गुलाब की रोपी थीं
पर गमलों में उग ...

रंगों-गंधों में रहा नहाता पर
अपनापन इस पर भी मजबूरी है
कीर्तन में चाहे जितना चिल्लाए
मन की ईश्वर से फिर भी दूरी है
सौगंधों में अनुबंध रहे बँधते
पर मन में कोई चुभती रही अनी
हमने कलमें गुलाब की रोपी थीं
पर गमलों में उग ...

समझौतों के गुब्बारे बहुत उड़े
उड़ते ही सबकी डोरी छूट गई
विश्वास किसे क्या कहकर बहलाते
जब नींद लोरियाँ सुनकर टूट गई
सम्बंधों से हम जुड़े रहे यों ही
ज्यों जुड़ी वृक्ष से हो टूटी टहनी
हमने कलमें गुलाब की रोपी थीं
पर गमलों में उग आई नागफनी।

-डॅा. धनंजय सिंह