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March 2, 2017

आओ बैठो पास कबीर

आओ बैठो पास कबीर
हम दोनों की एक लकीर

तुम अँधियारा दूर भगाते
हम गीतों की जोत जलाते
दोनों साधे रहते मन में
अपने आँसू-जग की पीर

तन माटी का, जगत कांच का
फिर भी झगड़ा तीन–पाँच का
मन जोगी तो, लगे एक से
राख मलें या मलें अबीर

तुमने धूप चदरिया तानी
हमने इन गीतों की बानी
सूरज ओढ़ा दोनों ने ही
हम राही तुम आलमगीर

मृगजल के सारे घर रीते
कुछ तो होता, जो हम पीते
हम दोनों की पीर एक सी
देखो कभी कलेजा चीर

आओ बैठो पास कबीर
हम दोनों की एक लकीर

-राजकुमारी रश्मि