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May 14, 2011

छाया मत छूना, मन

छाया मत छूना, मन
होगा दुख दूना, मन ।।

जीवन में हैं सुरंग सुधियाँ सुहावनी
छवियों की चित्र-गंध शैली मनभावनी
तन-सुगंध शेष रही, बीत गई यामिनी
कुंतल के फूलों की याद बनी चाँदनी
भूली-सी एक छुअन
बनता हर जीवित क्षण
छाया मत छूना मन
होगा दुख दूना, मन 

यश है, न वैभव है, मान है, न सरमाया
जितना ही दौड़ा तू, उतना ही भरमाया
प्रभुता का शरण-बिंब केवल मृगतृष्‍णा है
हर चंद्रिका में छिपी एक रात कृष्‍णा है।
जो है यथार्थ कठिन
उसका तू कर पूजन
छाया मत छूना...

दुविधा-हत साहस है दिखता है पंथ नहीं
देह सुखी हो पर मन के दुख का है अंत नहीं
दुख है न चाँद खिला शरद रात आने पर
क्‍या हुया जो खिला फूल रस-बसंत जाने पर
जो न मिला भूल उसे
कर तू भविष्‍य वरण
छाया मत छूना...

-गिरिजा कुमार माथुर