Showing posts with label * कल्पना मनोरमा. Show all posts
Showing posts with label * कल्पना मनोरमा. Show all posts

December 19, 2017

राजधानी की नदी हूँ

राजधानी की नदी हूँ
साँवला था तन मगर
मनमोहिनी थी
कल्पनाओं की तरह
ही सोहिनी थी
अब न जाने कौन सा
रँग हो गया है
बाँकपन जाने कहाँ पर
खो गया है
देह से अंतःकरण तक
आधुनिकता से लदी हूँ

पांडु रोगी हो गये
संकल्प सारे
सोच में डूबे दिखे
भीषम किनारे
काल सीपी ने चुराये
धवल मोती
दर्द की उठतीं हिलोरें
मन भिगोती
कौरवों के जाल-जकड़ी
बेसहारा द्रौपदी हूँ

दौड़ती रुकती न दिल्ली
बात करती
रोग पीड़ित धार जल की
साँस भरती
लहरियों पर नाव अब
दिखती न चलती
कुमुदनी कोई नहीँ
खिलती मचलती
न्याय मंदिर में भटकती
अनसुनी सी त्रासदी हूँ

कालिया था एक वो
मारा गया था
दुष्टता के बाद भी
तारा गया था
कौन आयेगा यहाँ
बंसी बजाने
कालिया कुल कॊ पुनः
जड़ से मिटाने
आस का दीपक जलाये
टिमटिमाती सी सदी हूँ

-कल्पना मनोरमा