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September 16, 2011

कमरों में कामरेड बैठे हैं

कमरों में कामरेड बैठे हैं
सड़कों पर खून बह रहा है।

क्रांति तो किताबों में बंद है
खुले हैं किवाड़ इतिहासों के
नारों की फ़सल उगे होंठों पर
सौ टुकड़े होते विश्वासों के
हरे॑-भरे सपनों की कौन कहे
जंगल में गीत दह रहा है ।

लाशों को चीथ रहे कौवों की
अपनी क्या जात कहीं होती है
दिन पर दिन बढ़ते नाखूनों  की
कोई तारीख नहीं होती है
सन्नाटा मौसम पर भारी है
कितना कुछ शब्द सह रहा है ।

सूरज के माथ पर पसीना है
सुबह कहीं खोई अफ़वाहों में
थर-थर-थर काँपती मुँडेरें हैं
सहमी है धूप क़त्लगाहों में
बदलेगा, यह सब कुछ बदलेगा
मूरख है, कौन कह रहा है ?

-यश मालवीय

September 13, 2011

गीत लेकर आ गए

गीत लेकर आ गए हैं
हम तुम्हारी सभ्यता पर
संस्कृति से छा गए हैं।

ये सुबह-शामें हमारी
और अनदेखी तुम्हारी
अब समझ आने लगी है
नींद की सारी खुमारी
गीत लेकर आ गए हैं
रात भी अब क्या करेगी
जागने को भा गए हैं ।

धूप में कालाबजारी
बहुत देखी सेंधमारी
अब नकद भूगतान लेगी
ज़िंदगी ही हर उधारी
गीत लेकर आ गए है
अब नहीं वो गीत गाना
जो गवैये गा गए हैं।

लोग ज्यों हारे जुआरी
हो चुकी मर्दुमशुमारी
सुख न कोई मोल पाए
खर्च करके रेजगारी
गीत लेकर आ गए हैं
अब किले उनके ढहेंगे
जो सितम-सा ढा गए हैं।

आड़ में चोरी चकारी
शाह से हो चुकी यारी
अब मिलेगी ख़ाक में
ओढ़ी हुई सी ख़ाकसारी
गीत लेकर आ गए हैं
हम कि अपने को अचानक
भीड़ ही में पा गए हैं।

-यश मालवीय


( सम्यक् पत्रिका के नवगीत विशेषांक से साभार )