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June 25, 2018

देखेगा कौन

बगिया में नाचेगा मोर
देखेगा कौन ?
तुम बिन ओ मेरे चितचोर
देखेगा कौन ?

नदिया का यह नीला जल
रेतीला घाट
झाऊ की झुरमुट के बीच
यह सूनी बाट
रह-रह कर उठती हिलकोर
देखेगा कौन ?
आँखड़ियों से झरते लोर
देखेगा कौन ?

बौने ढाकों का यह वन
लपटों के फूल
पगडंडी के उठते पाँव
रोकते बबूल
बौराये आमों की ओर
देखेगा कौन ?
पाथर-सा ले हिया कठोर
देखेगा कौन ?

नाचती हुई फुल-सुंघनी
बनतीतर शोख
घास पर सोन-चिरैया
डाल पर महोख
मैना की यह पतली ठोर
देखेगा कौन ?
कलंगी वाले ये कठफोर
देखेगा कौन ?

आसमान की ऐंठन-सी
धुएँ की लकीर
ओर-छोर नापती हुई
जलती शहतीर
छू-छूकर सांझ और भोर
देखेगा कौन ?
दुखती यह देह पोर-पोर
देखेगा कौन ?

-शम्भुनाथ सिंह

August 28, 2011

समय की शिला पर

समय की शिला पर मधुर चित्र कितने
किसी ने बनाए, किसी ने मिटाए।

किसी ने लिखी आँसुओं से कहानी
किसी ने पड़ा किन्तु दो बूँद पानी
इसी में गए बीत दिन ज़िन्दगी के
गई घुल जवानी, गई मिट निशानी।
विकल सिन्धु के साध के मेघ कितने
धरा ने उठाए, गगन ने गिराए।

शलभ ने शिखा को सदा ध्येय माना,
किसी को लगा यह मरण का बहाना
शलभ जल न पाया, शलभ मिट न पाया
तिमिर में उसे पर मिला क्या ठिकाना?
प्रणय-पंथ पर प्राण के दीप कितने
मिलन ने जलाए, विरह ने बुझाए।

भटकती हुई राह में वंचना की
रुकी शांत हो जब लहर चेतना की
तिमिर-आवरण ज्योति का वर बना तब
कि टूटी तभी श्रृंखला साधना की।
नयन-प्राण में रूप के स्वप्न कितने
निशा ने सुलाये, उषा ने जगाये ।

सुरभि की अनिल-पंख पर मौन भाषा
उड़ी, वंदना की जगी सुप्त आशा
तुहिन-बिन्दु बनकर बिखर, पर, गए स्वर
नहीं बुझ सकी अर्चना की पिपासा।
किसी के चरण पर वरण-फूल कितने
लता ने चढ़ाए, लहर ने बहाए।

-शम्भुनाथ सिंह