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September 6, 2023

हम उदास हैं और नदी में आग लगी है

 हम उदास हैं
और नदी में आग लगी है
कैसा है दिन ! 
 
अंधे सपनों का आश्वासन
हमें मिला है
नदी-किनारे फिर
ज़हरीला फूल खिला है
दिन-भर सोई
आँख बावरी रात जगी है
कैसा है दिन! 

छली हवाओं ने
जंगल में पतझर बाँटे
सीने में चुभ रहे
सैकड़ों पिछले काँटे
 बस्ती-बस्ती
शाहों की चल रही ठगी है
कैसा है दिन! 

आदमक़द कारों से निकले
चौपट बौने
सहमे घूम रहे हैं
जंगल में मृगछौने
धुनें पराई
हम सबको लग रहीं सगी हैं
कैसा है दिन  

-कुमार रवीन्द्र

October 5, 2018

समर में हम

समर में हम
औ' हमारे
कवच-कुंडल छिन चुके हैं

इन्द्र का छल -
सूर्यकुल की आस्थाएँ भी बिलाईं
धुआँ में हम घिरे
देती नहीं घटनाएँ दिखाईं
रक्त बहता
पाँव से है
देह में भाले भुँके हैं

एक खण्डित रथ बचा है
और घोड़े थके-हारे
मंत्र केवल मरण के ही
गये बरसों से उचारे
शत्रु बाहर
हैं नहीं
वे घरों के भीतर लुके हैं

आँगनों पर फिर रहें हैं
मृत्युपाखी शोर करते
रोज़ ही पूजाघरों में
रक्त-भीगे पंख झरते
सूर्यरथ के
अश्व भी
अंधी गुफाओं में रुके हैं

-कुमार रवीन्द्र

July 4, 2018

हम कठपुतली रहे समय के

हाँ, जीवन-भर
हम कठपुतली रहे समय के

हमने देखे
किसिम-किसिम के
स्वाँग हाट के
बाँचे मंतर
दरवाज़े पर लिखे लाट के

उनके रहते
सुन न सके हम
गान हृदय के

राजाओं के हर खेले में
हम शामिल थे
क़त्ल हुए हम कभी 
कभी हम ही क़ातिल थे

नारे बने
ख़ुशी से हम
शाहों की जय के

गिरवी रखकर
पुरखों की थाती हम लाये
सुख-सुविधाएँ
और हुए युग के चौपाये

भूल गये हम
जो सपने थे
सूर्योदय के

-कुमार रवीन्द्र

June 25, 2018

एक नेह का सोता भीतर

नदीधार ने
कुछ हिरदय ने
हमें बनाया बहता पानी

बरसों पहले
हम जनमे थे नदी किनारे
सुरज देवता तब रहते थे
घर के द्वारे
रहो सहज ही -
बहते जल से
यही सीख हमने है जानी

अम्मा ने था कहा -
नदी है तारनहारी
चाहे कुछ हो
कभी नहीं होती वह खारी
झुर्री-झुर्री हुई
साँस में
बसी हुई माँ की वह बानी

एक नेह का सोता भीतर
देता साखी
बहते जल ने ही
मानुष की पत है राखी
पिछले दिनों
नदी को देखा-
नहीं लगी जानी-पहचानी

-कुमार रवीन्द्र

June 15, 2018

मथुरा का पथ

मथुरा का पथ
सुनो, यहीं से से होकर जाता

आते-जाते हैं हरकारे रोज़ इधर से
डरते-डरते लोग निकलते अपने घर से
राजा का
साधो, परजा से झूठा नाता

हाँका पड़ा नदी पर - शाही बजरे आये
राजा जी के विरुद गये घर-घर में गाये
अब भी
पगला सूर किशनजी के गुण गाता

वंशी चुप है - धर्मक्षेत्र में बिगुल बज रहा
नदी पूछती - क्यों परजा का लहू है बहा
बोधगया में
बिलख रही क्यों, बंधु, सुजाता

-कुमार रवीन्द्र

August 30, 2011

बच्चे कहानी सुन रहे हैं

यह ज़गह है कौन-सी, बोलो
जहाँ पर
अभी भी बच्चे कहानी सुन रहे हैं ।

बात होती झील की भी
है यहाँ पर
यह इधर क्या -
लग रहा जैसे दुआघर
चल रहा करघा कहीं है
क्या अभी भी
रेशमी चादर जुलाहे बुन रहे हैं ।

दिख रहा जो उधर
है क्या मेमना वह
हुई कलकल- क्या कहीं सोता रहा बह
आई ख़ुशबू
क्या कहीं पर है बगीचा
जहाँ आशिक फूल अब भी चुन रहे हैं।

पक्षियों की चहचहाहट भी
इधर है
नीड़ जिस पर
सुनो, वह बरगद किधर है
यह करिश्मा हुआ कैसे
क्या यहाँ पर
बर्फ़ होते वक़्त में फागुन रहे हैं ।

-कुमार रवीन्द्र
 
( " बराबर" पत्रिका   संवत-२०६० अंक से साभार )

April 15, 2011

बच्चे की आँख में - ( कुमार रवीन्द्र)

बच्चे की आँख में

सामने कैलेंडर है
बच्चा है
बच्चे की आँख में कबूतर है

कमरे में दिन है
धूप है-हवाएँ हैं
नीले आकाश हैं
परियों की बातें हैं
नदियों के घाट हैं
गाछ-हरी घास हैं

खिड़की के बाहर
जो पीपल है
उसकी परछाईं भी अंदर है

खुले हुए दरवाजे
आर-पार फैले हैं
सपने-ही-सपने
फूल और पत्तों के
आपस के रिश्ते
सारे हैं अपने

यह टापू साँसों का
जिस पर हैं यादें
यहीँ सूरज का घर है


-कुमार रवीन्द्र