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August 12, 2023

बाँध लिये अँजुरी में

बाँध लिये अँजुरी में-
जूही के फूल

मधुर गन्ध,
मन की हर एक गली महक गयी
सुखद परस,
रग-रग में चिनगी-सी दहक गयी
रोम-रोम उग आये-
साधों के शूल।

जोन्हा का जादू
जिन पंखुरियों था फैला,
छू गन्दे हाथों -
मैंने उन्हें किया मैला,
हाथ काट लो-
मेरे...
सजा है कबूल।

आह !
हो गयी मुझसे 
एक बड़ी भूल
अँजुरी में बाँध लिये 
जूही के फूल।

-रवीन्द्र भ्रमर
(पाँच जोड़ बाँसुरी से)

July 7, 2012

मछली बोली

मछली बोली
सुन मछुए
मत फेंक रुपहला जाल

मैं पानी के हाथ बिकानी
पानी मेरी लाज कहानी
मुझे न कर निर्वसना
इन लहरों से नहीं निकाल

अंकशायिनी हूँ अथाह की
प्राण-प्रिया निर्मल प्रवाह की
मत छू मेरी देह
मुझे इस रेती पर मत डाल

मैं जो तेरे घर जाऊँगी
रस्ते ही में मर जाऊँगी
मेरी सागर-प्रीत
मुझे गागर में नहीं उछाल

मछली बोली
सुन मछुए
मत फेंक रुपहला जाल।

-डा० रवीन्द्र भ्रमर


October 11, 2011

त्रासदी का गीत


दर्द में डूबा हुआ संगीत हूँ
मैं समय की त्रासदी का गीत हूँ।

घुट रहा है दम विषैली छाँव में
धुआँ फैला है समूचे गाँव में
सरहदों पर गीत की परछाइयाँ
मैं स्वयं से ही बहुत भयभीत हूँ।

क्यारियों में बैर के काटे हुए
दिलों के नासूर सन्नाटे हुए
लड़ रहे हैं लोग टूटी मूठ से
अधर में मैं वंचना की जीत हूँ।

काम के छोटे, बड़े हैं नाम के
दास होकर रह गए हैं दाम के
खान से पीछे पड़े हैं चाम के
मैं उन्हीं की वासनामय प्रीत हूँ।

जो मरा है, कौन चादर दे उसे
जो जिया है, कौन आदर दे उसे
मैं अकेला ही खड़ा हूँ भीड़ में
स्वयं अपना सखा-सहचर-मीत हूँ।

-डा० रवीन्द्र भ्रमर