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August 20, 2018

मौसम की दिन-दूनी

मौसम की
दिन-दूनी
भीषण तैयारी है
अब सूख चुके हैं पुष्प
वृंत की बारी है

पत्तों के झरने का था
सदा समय निश्चित
अब असमय ही पतझार
पाँव फैलाता है
सर्जन करने में तो कुछ
मेहनत लगती है
पर ध्वंस मचाने में
किसका क्या जाता है
तटबन्ध सभी
टूटे-बिखरे-से जाते हैं
रसधारा को भी
लगी ज़रा बीमारी है

शुद्धता आज अपने दिन
गिन गिन काट रही
यह समय मिलावट का ही तो
ब्यौहारी है

संकर पौधों की
संकर बीजों की खेती
ढक रही प्रतिष्ठा
अब प्रामाणिक बीजों की
जीवन जीने के भी
निश्चित फॉर्मूले हैं
आवश्यकता क्या
दुनिया-भर की चीज़ों की
लेते जमुहाई नियम-कायदे
बरसों से
अब तौर-तरीकों की ज़्यादा
बलिहारी है

...
-पंकज परिमल

March 13, 2015

चंदा चाँदी का

माँ बच्चे के गले बाँधती
चंदा चाँदी का
चंद्रदोष से बचे पुत्र
निर्मल-शीतल मन हो
सच्चे मोती की आभा से
दिपदिप ये तन हो
हँसुली-धगुली बंधे हुए ये
बालक मटक रहे
इनमें कोई रानी का है
कोई बाँदी का

श्वास-रोग ना हो
गुस्से से छाती ना फूले
लाल हमारा बचे नज़र से
खूब फले-फूले
बालक का विद्रोह देख के
घबराती माता
बच्चे को दे रही अहिंसा-
मंतर गाँधी का

ये ही माँ का पीहर वाला
मीत पुराना है
इसीलिए परिचय बतलाती-
चंदा मामा है
इतना बड़ा कहाँ से लाए
सच्ची-मुच्ची का
माँ बच्चे को बहलाती दे
चंदा चाँदी का

-पंकज परिमल