Monday, February 23, 2015

कहाँ ज़िन्दगी वश में

-ओमप्रकाश तिवारी

चौदह रुपए बड़ा पाव के
चाय हो गई दस में
कहाँ ज़िन्दगी वश में !

राशनकार्ड कई रंगों के
उलझे ताने-बाने
बैठ शिखर पर तय होते हैं
गुरबत के पैमाने
देश दिखे, जैसा दिखलाएँ
आकाओं के चश्मे !

अनुदानो की सूची लम्बी
हुआ खजाना खाली
अर्थव्यवस्था के माहिर भी
बजा रहे हैं थाली
सौ दिन में सुख देने वाली
धूल खा रही कस्में !

संसद में लड़ते-भिड़ते सब
पीछे मिले हुए हैं
होंठ सभी के, जनता के
प्रश्नों पर सिले हुए हैं
नारा, वोट, चुनाव आदि सब
लोकतंत्र की रस्में !

-ओमप्रकाश तिवारी
[ खिड़कियाँ खोलो... नवगीत संग्रह से ]

6 comments:

रविकर said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बुधवार को
आज प्रियतम जीवनी में आ रहा है; चर्चा मंच 1900
पर भी है ।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!

Pratibha Verma said...

बिलकुल सही कहा आपने...बहुत सुन्दर!!

कालीपद "प्रसाद" said...

बहुत सटीक !
मैं भी ब्रह्माण्ड का महत्वपूर्ण अंग हूँ l

संजीव वर्मा 'सलिल' said...

भाई ओम तिवारी जी के नवगीत पारिस्थितिक विसंगतियों और वैषम्य को शब्दित करते हैं. यह नवगीत भी युगीन सच को आइना दिखाता है.

dr.rajeevraj said...

गीत के सभी मानकों पर खरा

dr.rajeevraj said...

गीत के सभी मानकों पर खरा