Monday, August 08, 2022

दिशा भरम

दुविधाओं की पगडण्डी पर 
भटके जनम-जनम
जितने जीवन में चौराहे 
उतने दिशा भरम 

धीरज संयम और सबूरी 
शब्द बहुत ही हलके 
अधरों से जब पीर छुपाओ 
आँखों से क्यों छलके 
ऊपर-ऊपर बर्फ़ भले हो 
भीतर धरा गरम
जितने जीवन में...

फटे हुए अंतः वस्त्रों पर 
रोज़ नयी पोशाकें 
आज़ादी का जश्न दासियाँ 
घूँघट में से ताकें 
ऊपर जितना तेज उजाला 
नीचे उतना तम
जितने जीवन में... 

भीतर पानी में जीवन है 
भले जमी हो काई 
पिंजरे की चिड़िया सपने में 
अम्बर तक हो आयी 
मन की अपनी मुक्त उड़ाने 
तन के सख़्त नियम 
जितने जीवन में चौराहे 
उतने दिशा भरम 

-संध्या सिंह

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