Thursday, November 19, 2020

किरन बसी फुनगी पर


किरन बसी फुनगी पर
जड़ से खानापूरी है
पूछ रही झोपड़ी
महल से
कितनी दूरी है।

कुछ सूखा अकाल को
अर्पित कुछ
भूचालों को
खोल न पाया कोई
लोकतंत्र के
तालों को
व्यर्थ कल्पना
अच्छे दिन की
आस अधूरी है।

समझ न पाये,
राजनीति में
जुमलों की भाषा
चाहत थी सोने की
हाथों में
पीतल-काँसा
चर्चायें उम्मीदों की
अब गै़र ज़रूरी हैं।

कहते हैं कुछ लोग
रोशनी
आयातित होगी
आगामी पीढ़ी
आजीवन
इन्द्रियजित होगी
मिलती है
सांत्वना रात में
सुबह सिंदूरी है।

पकती है
सदियों से
चतुर वीरबल की खिचड़ी
बाबा भूखे गये
भरोसे की
बगिया उजड़ी
ठठरी पर है चाम
ज़िन्दगी में बेनूरी है।

-मधुकर अष्ठाना

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