Thursday, July 25, 2013

है दुनिया जादू मंतर की


- शशिकांत गीते 


भैया रे! ओ भैया रे!
है दुनिया जादू मंतर की

पार समुंदर का जादूगर
मीठा मंतर मारे
पड़े चाँदनी काली होते
मीठे सोते खारे
बढ़ी- बढ़ी जाती गहराई
उथली धरती खंतर की

अपनी खाते- पीते ऐसा
करे टोटका- टोना
कौर हाथ से छूटे, मिट्टी
होता सारा सोना
एक खोखले भय से दुर्गत
ठाँय लुकुम हर अंतर की

उर्वर धरती पर तामस, है
बीज तमेसर बोये
अहं-ब्रह्म दुर्गन्धित कालिख
दूध- नदी में धोये
दिग- दिगंत अनुगूँजें हैं मन
काले- काले कंतर की

पाँच पहाड़ी, पाँच पींजरे
हर पिंजरे में सुग्गा
रक्त समय का पीते
लेते हैं बारूदी चुग्गा
इनकी उमर, उमर जादूगर
जादूकथा निरंतर की

- शशिकांत गीते