Thursday, April 25, 2013

पके पान झर गये


-नरेन्द्र शर्मा
पके पान झर गये
डाल पर नये पान आये
पल्लव के धर देह
नेह के नए प्रान आये ।


लाल हो गयी डाल
हो गया धरती-तल पीला
सर्जनशीला प्रकृति-
कर रही रसवंती लीला
पंसु प्राण कोकिल ने
मधु के नए गान गाये ।


अर्थ चक्र की आँख-
बचाकर, वन-उपवन फूले
नियत समय पर आ जाना-
ऋतुराज नहीं भूले
राजनीति के धनी
न इसका मर्म जान पाये ।


भूमिति नारी, बीजगणित नर,
अंकगणित जीवन
पूर्ण न होगा अंश,
सुने बिन अंशी-वंशी-स्वन
क्यों न, पूरा-नव पान,
तुम्हारा, मुझे ध्यान आये?
पके पान झर गये,
डाल पर नए पान आये।

-नरेन्द्र शर्मा
[ "पाँच जोड़ बाँसुरी" से साभार]