Monday, March 19, 2012

छिड़ता युद्ध

-डा० जगदीश व्योम


छिड़ता युद्ध
बिखरता त्रासद
इंसां रोता है ।

जन संशय
त्रासदी ओढ़कर
आगे आया है
महानाश का
विकट राग, फिर
युग ने गाया है
पल में नाश
सृजन सदियों का
ऐसा होता है ।

वाट जोहती
थकित मनुजता
ले टूटी कश्ती
भय की छाया
व्यथित विकलता
औ फाकामस्ती
दम्भ-जनित
कंकाल सृजन के
कोई ढोता है ।

उठो मनुज
थामनी पड़ेगी, ये
पागल आँधी
आज उगाने
होंगे घर-घर में
युग के गाँधी
मिलता ‘व्योम’
विरासत में, युग
जैसा बोता है ।

7 comments:

रविकर said...

वाह डाक्टर व्योम जी, व्यवहारिक कह बात ।

व्योमोदक मोदक मिले, खाए-पिए अघात ।

खाए-पिए अघात, राग की महा-विकटता ।

युग सहता आघात, व्यथित हो रही मनुजता ।

गाँधी की भरमार, कौन सा रोके आँधी ।

ख़त्म हो रही धार, बढे है हर दिन व्याधी ।।

रविकर said...

रची उत्कृष्ट |

चर्चा मंच की दृष्ट --

पलटो पृष्ट ||


बुधवारीय चर्चामंच

charchamanch.blogspot.com

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बहुत ही बढ़िया सर!


सादर

expression said...

वाह...
बाहर खूब..
सार्थक लेखन.

vandana said...

बात जोहती थकित मनुजता ....
युग चित्रण करता नवगीत

परमेश्वर फुँकवाल said...

बहुत सुन्दर नवगीत है व्योम जी. हम आज अपने आप से युद्ध की स्थिती में हैं, कोई तो इस युग के गांधी से परिचय कराये.

Abnish Singh Chauhan said...

bahut sundar navgeet hai aapka. meree badhai sweekaren!