Monday, March 19, 2012

छिड़ता युद्ध

-डा० जगदीश व्योम


छिड़ता युद्ध
बिखरता त्रासद
इंसां रोता है ।

जन संशय
त्रासदी ओढ़कर
आगे आया है
महानाश का
विकट राग, फिर
युग ने गाया है
पल में नाश
सृजन सदियों का
ऐसा होता है ।

वाट जोहती
थकित मनुजता
ले टूटी कश्ती
भय की छाया
व्यथित विकलता
औ फाकामस्ती
दम्भ-जनित
कंकाल सृजन के
कोई ढोता है ।

उठो मनुज
थामनी पड़ेगी, ये
पागल आँधी
आज उगाने
होंगे घर-घर में
युग के गाँधी
मिलता ‘व्योम’
विरासत में, युग
जैसा बोता है ।