Saturday, October 22, 2011

स्वर्ण-मृगों से छले गए

-रमेश चन्द्र पंत

हम तापस
वन के अनुरागी
स्वर्ण-मृगों से छले गए।

रहे भटकते
जीवन-भर ही
एक अबूझी प्यास लिए
आँखों में
मधुमय वसंत का
खंडित-सा इतिहास लिए
हर अरण्य
जन के अनुरागी
मौन-शरों से छले गए।

अनुबंधों के
कोलाहल में
अरथवान सब छूट गया
अंतर्मन का
उजला दर्पण
बस, छूते ही टूट गया
हम निश्छल
मन के अनुरागी
अश्रु-दृगों से छले गए।

(आजकल, फरवरी-2010 से साभार)-"उत्कर्ष", विद्यापुर, द्वाराहाट, अल्मोड़ा- 263653(उत्तराखण्ड)

9 comments:

sushma 'आहुति' said...

बहुत ही भावपूर्ण रचना.....

S.N SHUKLA said...

सुन्दर सृजन , प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकारें.

समय- समय पर मिले आपके स्नेह, शुभकामनाओं तथा समर्थन का आभारी हूँ.

प्रकाश पर्व( दीपावली ) की आप तथा आप के परिजनों को मंगल कामनाएं.

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

आपकी यह सुन्दर प्रस्तुति कल सोमवार दिनांक 24-10-2011 को चर्चामंच http://charchamanch.blogspot.com/ की भी शोभा बनी है। सूचनार्थ

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

अंतर्मन का
उजला दर्पण
बस, छूते ही टूट गया
हम निश्छल
मन के अनुरागी
अश्रु-दृगों से छले गए।

बहुत सुन्दर ..

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

सुन्दर नवगीत.... बढ़िया लेखन...

आपको दीप पर्व की सपरिवार सादर शुभकामनाएं....

vandana said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति ....

प्रकाश पर्व की बहुत बहुत शुभ कामनाये
सादर

चन्दन..... said...

नवगीत !
बहुत ही सुन्दर सृजन!

दिवाली की हार्दिक शुभकामनायें!
जहां जहां भी अन्धेरा है, वहाँ प्रकाश फैले इसी आशा के साथ!
chandankrpgcil.blogspot.com
dilkejajbat.blogspot.com
पर कभी आइयेगा| मार्गदर्शन की अपेक्षा है|

आशा जोगळेकर said...

अनुबंधों के कोलाहल में अरथवान सब छूट गया....
.......

भावपूर्ण प्रस्तुति के लिये बहुत बधाई और दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं ।

आशा जोगळेकर said...

अनुबंधों के कोलाहल में अरथवान सब छूट गया....
.......

भावपूर्ण प्रस्तुति के लिये बहुत बधाई और दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं ।