Saturday, October 22, 2011

स्वर्ण-मृगों से छले गए

-रमेश चन्द्र पंत

हम तापस
वन के अनुरागी
स्वर्ण-मृगों से छले गए।

रहे भटकते
जीवन-भर ही
एक अबूझी प्यास लिए
आँखों में
मधुमय वसंत का
खंडित-सा इतिहास लिए
हर अरण्य
जन के अनुरागी
मौन-शरों से छले गए।

अनुबंधों के
कोलाहल में
अरथवान सब छूट गया
अंतर्मन का
उजला दर्पण
बस, छूते ही टूट गया
हम निश्छल
मन के अनुरागी
अश्रु-दृगों से छले गए।

(आजकल, फरवरी-2010 से साभार)-"उत्कर्ष", विद्यापुर, द्वाराहाट, अल्मोड़ा- 263653(उत्तराखण्ड)