Sunday, September 11, 2011

आदमखोर

-जयकृष्ण राय तुषार

पंछी पेड़ों से दहशत में
उड़े मचाते शोर
जंगल के सीने पर चढ़कर
बैठा आदमखोर ।

संध्याओं के हाथ जले हैं
पंख तितलियों के
कितने तेज धार वाले
नाखून उँगलियों के
फंदा डाल गले में
लटकी हुई सुनहरी भोर ।

इतना सब कुछ हुआ मगर
ये दिन भी कहाँ अछूता
फर्जी हर मुठभेड़ कहाँ तक
लिखता इब्नबतूता
फिर बहेलिए खींच रहे हैं
नये जाल की डोर ।

सपनीली आँखों में भी हैं
सपने डरे हुए
तपती हुई रेत में
सौ-सौ चीतल मरे हुए
जल विहीन मेघों के सम्मुख
कत्थक करते मोर ।



( सम्यक पत्रिका के नवगीत विशेषांक से )