Sunday, September 11, 2011

आदमखोर

-जयकृष्ण राय तुषार

पंछी पेड़ों से दहशत में
उड़े मचाते शोर
जंगल के सीने पर चढ़कर
बैठा आदमखोर ।

संध्याओं के हाथ जले हैं
पंख तितलियों के
कितने तेज धार वाले
नाखून उँगलियों के
फंदा डाल गले में
लटकी हुई सुनहरी भोर ।

इतना सब कुछ हुआ मगर
ये दिन भी कहाँ अछूता
फर्जी हर मुठभेड़ कहाँ तक
लिखता इब्नबतूता
फिर बहेलिए खींच रहे हैं
नये जाल की डोर ।

सपनीली आँखों में भी हैं
सपने डरे हुए
तपती हुई रेत में
सौ-सौ चीतल मरे हुए
जल विहीन मेघों के सम्मुख
कत्थक करते मोर ।



( सम्यक पत्रिका के नवगीत विशेषांक से )

8 comments:

जयकृष्ण राय तुषार said...

डॉ० व्योम जी आपका बहुत -बहुत आभार

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा दिनांक 12-09-2011 को सोमवासरीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

मोहिनी चोरडिया said...

अति सुन्दर गीत लिखा हे आपने

रेखा said...

बहुत खूब .... बहुत सुन्दर

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) said...

मन को छूते हुये शब्दों में बड़ी कुशलता से अपनी बात कही है.

वन्दना said...

bahut sundar prastuti.

रविकर said...

सुन्दर रचना आपकी, नए नए आयाम |
देत बधाई प्रेम से, प्रस्तुति हो अविराम ||

नवगीत said...

जयकृष्ण राय तुषार जी के नवगीत पर आप सभी ने प्रतिक्रिया लिखकर हमारा सहयोग किया है, आप सभी का आभार।
-नवगीत