Saturday, July 30, 2011

मनचाहे सपनों को

- अश्वघोष
मनचाहे सपनों को
कोख में दबा
बंजारे दिन
हो गए हवा

नयनों के गेह से
गूँगा विश्वास
सहमा-सा देख रहा
अनुभव की प्यास
तन-मन में रमी हुई
नींद की दवा

सूली पर लटके-से
लगते हैं दिन
चिड़ियों-सी उड़ जातीं
रातें दुलहिन
सड़कों पर बिखरा है
मौन का रवा
हो गए हवा ।