अनहोनी की आशंका से
काँप रही चिड़िया।
सर पर हरे-भरे पेड़ों की
छाया बनी रहे
चाहे विरल रहे आवादी
या फिर घनी रहे
झुरमुट के पीछे क्यों खुद को
ढाँप रही चिड़िया।
गाती मेघ मल्हार चहककर
बादल आ जाना
झुलसी धरती के तन-मन को
आकर सरसाना
बूँद रसातल तक जा पहुँची
भाँप रही चिड़िया।
चहक चहककर जीवन का
उल्लास रचाती है
मुझ से मिलने कभी-कभी
छत पर आ जाती है
बैठी है नंगे तारों पर
हाँफ रही चिड़िया।
-मनोज जैन मधुर
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