June 14, 2026

भाँप रही चिड़िया

अनहोनी की आशंका से
काँप रही चिड़िया।

सर पर हरे-भरे पेड़ों की 
छाया बनी रहे
चाहे विरल रहे आवादी 
या फिर घनी रहे
झुरमुट के पीछे क्यों खुद को
ढाँप रही चिड़िया।

गाती मेघ मल्हार चहककर
बादल आ जाना
झुलसी धरती के तन-मन को
आकर सरसाना
बूँद रसातल तक जा पहुँची 
भाँप रही चिड़िया।

चहक चहककर जीवन का
उल्लास रचाती है
मुझ से मिलने कभी-कभी 
छत पर आ जाती है
बैठी है नंगे तारों पर 
हाँफ रही चिड़िया।

   -मनोज जैन मधुर

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