Saturday, September 08, 2018

खमोशी : हलचल

कितना खमोश है
मेरा कुछ आस-पास
कितनी बेख्वाब हैं
सारी चीजें उदास

दरवाज़े खुले हुए
सुनते कुछ, बिना कहे
बेवकूफ नज़रों से
मुँह बाये देख रहे

चीज़ें हैं, चीज़ें बेजान हैं
फिर भी यह लगता है
बेहद परेशान हैं
मेरी नाकामी से
ये भी नाकाम हैं
मेरी हैरानी से
ये भी हैरान हैं

टिक-टिक कर एक घड़ी
चुप्पी को कुचल रही
लगता है दिल की ही
धड़कन को निगल रही

कैसे कुछ अपने आप
गिर जाये, पड़ जाये
खनक कर भनक कर
लड़ जाये भिड़ जाये

लगता है बैठा हूँ
भूतों के डेरे में
सजे हुए सीलबंद
एक बड़े कमरे में

सदियों से दूर
किसी अंधे उजियाले में
अपनों से दूर
किसी पिरामिडी घेरे में

एकटक घूर रहीं
मुझ को बस दीवारें
जी करता उन पर जा
यह मत्था दे मारें

चिल्ला कर गूँजों से
पत्थर को थर्रा दें
घेरी खामोशी की
दीवारें बिखरा दें

इन मुरदा महलों की
मीनारें हिल जायें
इन रोगी ख्य़ालों की
सीमाएँ घुल जायें

अन्दर से बाहर आ
सदियों की कुंठाएँ
बहुत बड़े जीवन की
हलचल से मिल जायें


-कुँवर नारायण
(तीसरा सप्तक से)