Monday, March 31, 2014

खनके चिड़ियों के कंगन

-आचार्य भगवत दुबे

आँख ऊषा ने खोली
खनके चिड़ियों के कंगन

किरणें रहीं टटोल
गेह के कोने-कोने को
रातों के प्रहरी उलूक
जाते हैं सोने को
आंगन में आगया, महकता
सुरभित वृंदावन

करती हवा ठिठोली
कलियों ने घूँघट खोले
सगुनौती पढ़ रहा
मुँडेरों पर कागा बोले
बड़े-बड़े हो गये
खुशी से, फूलों के लोचन

छन्द किसानों ने लिख डाले
हल से धरती पर
स्वप्न ऊगने लगे सुनहरे
बंजर पड़ती पर
धरती पर उतार लाये
ज्यों कृषक गंध मादन

-आचार्य भगवत दुबे

[पिसनहारी-मढ़िया के पास, जबलपुर- 482003 (म०प्र०)
मो० 09300613975 ]

[गीत गागर से साभार]

4 comments:

vandana said...

आभार आदरणीय सर अनमोल मोती इस ब्लॉग पर मिल जाते हैं

मन के - मनके said...

शब्दों के माध्यम से,मनोहारी विवरण

पुरुषोत्तम पाण्डेय said...

बहुत सुन्दर उपमान प्रयोग किये हैं, अच्छी रचना है. बधाई.

पुरुषोत्तम पाण्डेय said...

बहुत सुन्दर उपमान प्रयोग में लाये हैं, सुन्दर रचना. बधाई है.