Saturday, June 25, 2011

याद आये फिर तुम्हारे केश

-किशन सरोज
याद आये फिर तुम्हारे केश,
मन-भुवन में फिर अंधेरा हो गया
पर्वतों का तन
घटाओं ने छुआ
घाटियों का ब्याह
फिर जल से हुआ
याद आये फिर तुम्हारे नैन
देह मछली, मन मछेरा हो गया।

प्राण-वन में
चन्दनी ज्वाला जली
प्यास हिरनों की
पलाशों ने छली
याद आये फिर तुम्हारे होंठ
भाल, सूरज का बसेरा हो गया।

दूर मन्दिर में जगी
फिर रागिनी
गन्ध की बहने लगी
मनदाकिनी
याद आये फिर तुम्हारे पाँव,
प्रार्थना हर गीत मेरा हो गया।

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