Saturday, June 16, 2018

कहो कबीरा

ठंड लगी है, सिकुड़ रहे हो
कहो कबीरा ! चादर दूँ ?
मन की पीर नही ले सकता
तन के हित क्या लाकर दूँ ?

मेरी चादर कुछ मैली है
थोडा सा सह लोगे क्या ?
अभी भोर में बहुत देर है
अपनाकर रह लोगे क्या ?

तुमसे एक जुलाहे तुम ही,
तुमको क्या बनवाकर दूँ ?

काशी में कबीर हो जाना
आज शिष्ट व्यवहार नही,
और नगर ये उलटबांसियां
सहने को तैयार नही।

सुनो कबीरा ! वहाँ न जाना
धूनी यही रमाकर दूँ ?

हो सकता है समय लगे
"मगहर" होने में काशी को,
कबिरा से अल्हड फ़कीर का
घर होने में काशी को ।

बोलो तुम्हें कहाँ से सुख दूँ,
कहो कौनसा आदर दूँ ?

दुनिया की हालत है जैसे
धुनी रुई के फाहे की,
मगर उसे भी फिक्र नहीं है
वो भी एक जुलाहे की ?

जटिल पहेली पूछी साधो !
मैं कैसे सुलझाकर दूँ ?

-चित्रांश वाघमारे

Friday, June 15, 2018

मथुरा का पथ

मथुरा का पथ
सुनो, यहीं से से होकर जाता

आते-जाते हैं हरकारे रोज़ इधर से
डरते-डरते लोग निकलते अपने घर से
राजा का
साधो, परजा से झूठा नाता

हाँका पड़ा नदी पर - शाही बजरे आये
राजा जी के विरुद गये घर-घर में गाये
अब भी
पगला सूर किशनजी के गुण गाता

वंशी चुप है - धर्मक्षेत्र में बिगुल बज रहा
नदी पूछती - क्यों परजा का लहू है बहा
बोधगया में
बिलख रही क्यों, बंधु, सुजाता

-कुमार रवीन्द्र

Thursday, June 14, 2018

ओ वासंती पवन हमारे घर आना

बहुत दिनों के बाद खिड़कियाँ खोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना

जड़े हुए थे ताले सारे कमरों में
धूल भरे थे आले सारे कमरों में
उलझन और तनावों के रेशों वाले
पुरे हुए थे जले सारे कमरों में
बहुत दिनों के बाद साँकलें डोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना

एक थकन-सी थी नव भाव तरंगों में
मौन उदासी थी वाचाल उमंगों में
लेकिन आज समर्पण की भाषा वाले
मोहक-मोहक, प्यारे-प्यारे रंगों में
बहुत दिनों के बाद ख़ुशबुएँ घोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना

पतझर ही पतझर था मन के मधुबन में
गहरा सन्नाटा-सा था अंतर्मन में
लेकिन अब गीतों की स्वच्छ मुंडेरी पर
चिंतन की छत पर, भावों के आँगन में
बहुत दिनों के बाद चिरैया बोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना

-कुँअर बेचैन

तुम अभी कुछ देर ठहरो

मैं धरातल पर घड़ी भर
पाँव धरना चाहता हूँ
कल्पनाओं !
तुम अभी कुछ देर ठहरो

मैं बहुत ही थक गया हूँ
दूर से मुझको अकेले
लौटकर आना पड़ा है
मैं जिधर से जा चुका था
क्या बताऊँ क्यों मुझे फिर से
उधर आना पड़ा है
कुछ समय तक मैं
स्वयं से बात करना चाहता हूँ
व्यस्तताओं !
तुम अभी कुछ देर ठहरो

मैं जिन्हें अपना चुका था
आज मैं यह जान पाया
वे नहीं मेरे हुए हैं
जो दबे थे खो चुके थे
वे अभाषित प्रश्न मुझको
आज तक घेरे हुए हैं
रिक्तियों को मैं
किसी भी भाँति भरना चाहता हूँ
वर्जनाओं !
तुम अभी कुछ देर ठहरो

मैं अटल कर्त्तव्य पथ पर
छोड़कर फिर आ गया हूँ
अनमने अधिकार सारे
मौन मुझको रुच रहा है
अब नहीं सुनने कभी भी
प्रश्न या उत्तर तुम्हारे
पत्थरों के बीच से अब
मैं गुज़रना चाहता हूँ
देवताओं !
तुम अभी कुछ देर ठहरो

-ज्ञान प्रकाश आकुल

पुरवा जो डोल गई

 पुरवा जो डोल गई
घटा घटा आँगन में
जूड़े से खोल गई
बूँदों का लहरा दीवारों को
चूम गया
मेरा मन सावन की गलियों में झूम गया
श्याम रंग परियों से अम्बर है
घिरा हुआ
घर को फिर लौट चला बरसों का फिरा हुआ
मइया के मन्दिर में
अम्मा की मानी हुई
डुग-डुग-डुग-डुग बधइया
फिर बोल गई

बरगद की जड़ें पकड़
चरवाहे झूल रहे
बिरहा की तानों में बिरहा
सब भूल रहे
अगली सहालक तक व्याहों
की बात टली
बात बड़ी छोटी पर बहुतों को
बहुत खली
नीम तले चौरा पर
मीरा की गुड़िया के
व्याह वाली चर्चा
रस घोल गई

खनक चूडियों की सुना
मेहँदी की पातों ने
कलियों पे रंग फेरा मालिन
की बातों ने
धानो के खेतों में
गीतों का पहरा है
चिड़ियों की आँखों में
ममता का सेहरा है
नदिया से उमक उमक
मछली वो छमक छमक
पानी की चूनर को
दुनिया से मोल गई

झूले के झूमक हैं
शाखा के कानों में
शबनम की फिसलन है
केले की रानों में
ज्वार और अरहर की
हरी हरी सारी है
सनई के फूलों की
गोटा किनारी है
गाँवो की रौनक
है मेहनत की बाँहों में
धोबिन भी पाटे पर
हइया छू बोल गई
पुरवा जो डोल गई

-डा० शिव बहादुर सिंह भदौरिया

Sunday, December 24, 2017

बाजीगर बन गई व्यवस्था

बाजीगर बन गई व्यवस्था
हम सब हुए जमूरे
सपने कैसे होंगे पूरे

चार कदम भर चल पाये थे
पैर लगे थर्राने
क्लान्त प्रगति की निरख
विवशता छाया लगी चिढ़ाने
मन के आहत मृगछौने ने
बीते दिवस विसूरे
सपने कैसे......................

हमने निज हाथों से युग
पतवार जिन्हें पकड़ाई
वे शोषक हो गए हुए
हम चिर शोषित तरुणाई
'शोषण' दुर्ग हुआ अलवत्ता
तोड़ो जीर्ण कंगूरे
सपने कैसे.........................

वे तो हैं स्वच्छन्द,
करेंगे जो मन में आएगा
सूरज को गाली देंगे
कोई क्या कर पाएगा
दोष व्यक्ति का नहीं,
व्यवस्था में छल छिद्र घनेरे
सपने कैसे.............................

बदल गए आदर्श,
आचरण की बदली परिभाषा
चोर–लुटेरे हुए घनेरे
यह अभिशप्त निराशा
बदले युग के वर्तमान को कैसे मैं बदलूं रे
सपने कैसे.................................

-डा० जगदीश व्योम

Saturday, December 23, 2017

कबन्धों की बात

इस शहर में
आदमी के नाम पर अक्सर
बात होती है कबन्धों की

पूर्णता सपना हुई
सच है अधूरापन
है सभी के हाथ में
टूटा हुआ दर्पन
दिन दहाड़े
काँच घर पर फेंकती पत्थर
जा रही है भीड़ अंधों की

आग से फिर खेलते हैं
खेल मृग छौने
पर्वतों को जेब में रख
घूमते बौने
बर्फ था जो
खौलता है खून का सागर
घुट रही है दम सुगंधों की

शोर में अब कौन किसकी
यहाँ सुनता है
एक बिरवा मरुस्थल में
शीश धुनता है
आँधियों में
उड़ रही है रेशमी चादर
अरथियों से झुके कन्धों की।

-देवेन्द्र शर्मा इन्द्र
(आजकल, अगस्त-1993)

Tuesday, December 19, 2017

राजधानी की नदी हूँ

राजधानी की नदी हूँ
साँवला था तन मगर
मनमोहिनी थी
कल्पनाओं की तरह
ही सोहिनी थी
अब न जाने कौन सा
रँग हो गया है
बाँकपन जाने कहाँ पर
खो गया है
देह से अंतःकरण तक
आधुनिकता से लदी हूँ

पांडु रोगी हो गये
संकल्प सारे
सोच में डूबे दिखे
भीषम किनारे
काल सीपी ने चुराये
धवल मोती
दर्द की उठतीं हिलोरें
मन भिगोती
कौरवों के जाल-जकड़ी
बेसहारा द्रौपदी हूँ

दौड़ती रुकती न दिल्ली
बात करती
रोग पीड़ित धार जल की
साँस भरती
लहरियों पर नाव अब
दिखती न चलती
कुमुदनी कोई नहीँ
खिलती मचलती
न्याय मंदिर में भटकती
अनसुनी सी त्रासदी हूँ

कालिया था एक वो
मारा गया था
दुष्टता के बाद भी
तारा गया था
कौन आयेगा यहाँ
बंसी बजाने
कालिया कुल कॊ पुनः
जड़ से मिटाने
आस का दीपक जलाये
टिमटिमाती सी सदी हूँ

-कल्पना मनोरमा

फिर आई सरकार नई

फिर आई सरकार नई
फिर नए मिलेंगे आश्वासन
फिर स्वागत में स्वर्ण मृगों के
नाचो बेटा रामलखन !

उनके आने पर झूमे थे
इनके आने पर झूमो
इनकी उनकी लिए पालकी
गाँव गली घर घर घूमो
उनकी गर्दन की रस्सी से
नपवाओ अपनी गर्दन !

करो न चिंता भूख तुम्हारी
आँतें अगर मरोड़ रही
बदहाली यदि जनम जनम का
नाता तुमसे जोड़ रही
ढको आँकड़ों से अपना तन
पेट भरो पीकर भाषन !

खून तुम्हारा पीते रहने को
फिर नए जतन होंगे
लोकतंत्र की हाँफ रही धरती पर
उनके फन होंगे
राजतिलक है उनके हिस्से
भाग तुम्हारे सियाहरन !


-जय चक्रवर्ती

Sunday, October 01, 2017

रामलीला हो चुकी है


रामलीला हो चुकी है
दर्शकों के दल घरों में खो गये

और पात्रों ने उतारे
मुकुट, बंदर के मुखौटे
काम जिनके पास था तो
काम पर वे लोग लौटे
धो लिया चेहरा ज़रा सा
राक्षस सब आदमी से हो गये

उड़ गयी रंगत गुलाबी
खुल गया फिर रंग भूरा
फिर ग़रीबी मुस्करायी
दिक्कतों ने खूब घूरा
लौटने का मन नहीं था
पर ज़रूरत ने बुलाया तो गये

क्या विजेता क्या पराजित
मंच के नीचे खड़े हैं
धनुष,रावण के खडग सब
एक झोले में पड़े हैं
आँख में आंसू भरे हैं
राम रावण फिर दरी पर सो गये

-ज्ञान प्रकाश आकुल

Saturday, September 09, 2017

माँ


जब गया मैं घर
अचानक याद आई माँ

याद आई
एक सरिता
दौड़ती अविराम
याद आई
क्ल्पवृक्षी
एक शीतल छाँव
टूटता छप्पर
अचानक याद आई माँ

याद आई
एक भाषा
लाड़ से भरपूर
याद आई
एक दृष्टि
वृष्टि से मजबूर
काँपते अक्षर
अचानक याद आई माँ

याद आई
एक ममता
फूल में मकरंद
याद आई
एक घाटी
तीर्थों के संग
मन हुआ निर्झर
अचानक याद आई माँ

-डा० अश्वघोष
9897700267

Saturday, May 20, 2017

हे चिर अव्यय ! हे चिर नूतन !


(पृकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत जी के जन्मदिवस पर)


कण–कण तृण–तृण में
चिर निवसित
हे ! रजत किरन के अनुयायी
सुकुमार पकृति के उद्घोषक
जीवंत तुम्हारी कवितायी
फूलों के मिस शत वार नमन
स्वीकारो संसृति के सावन
हे चिर अव्यय !
हे चिर नतून !!

बौछारें धारें जब आतीं
लगता है तुम नभ से उतरे
चाँदनी नहीं है पत्तों पर
चहुँ ओर तम्हीं तो हो बिखरे
तारापथ के अनुगामी का
कर रही धरा है मूक नमन
हे चिर अव्यय !
हे चिर नतून !!

सुकुमार वदन’ सुकुमार नयन
कौसानी की सुकुमार धूप
पूरा युग जिसमें संदर्शित
ऐसे कवि के तुम मूर्तरूप
हैं व्योम, पवन अब खड़े, लिये
कर में अभिनन्दन पत्र नमन
हे चिर अव्यय !
हे चिर नतून !!

-डा० जगदीश व्योम

Monday, May 15, 2017

फिर बज उठे हवा के नूपुर

फिर बज उठे हवा के नूपुर
फूलों के, भौंरों के चर्चे
खुले आम आँगन-गलियारे
बँटने लगे धूल के पर्चे

जाने क्या कह दिया दरद ने
रह-रह लगे बाँस वन बजने
पीले पड़े फसल के चेहरे
वृक्ष धरा पर लगे उतरने
पुरवा लगी तोड़ने तन को
धारहीन पछुआ के बरछे

बैर भाँजने हमसे, तुमसे
मन हारेगा फिर मौसम से
निपटे नहीं हिसाब पुराने
तन, रस, रूप, अधर, संयम से
फूलों से बच भी जाएं तो
गंधों के तेवर हैं तिरछे।

-विनोद निगम

Thursday, March 02, 2017

आओ बैठो पास कबीर

आओ बैठो पास कबीर
हम दोनों की एक लकीर

तुम अँधियारा दूर भगाते
हम गीतों की जोत जलाते
दोनों साधे रहते मन में
अपने आँसू-जग की पीर

तन माटी का, जगत कांच का
फिर भी झगड़ा तीन–पाँच का
मन जोगी तो, लगे एक से
राख मलें या मलें अबीर

तुमने धूप चदरिया तानी
हमने इन गीतों की बानी
सूरज ओढ़ा दोनों ने ही
हम राही तुम आलमगीर

मृगजल के सारे घर रीते
कुछ तो होता, जो हम पीते
हम दोनों की पीर एक सी
देखो कभी कलेजा चीर

आओ बैठो पास कबीर
हम दोनों की एक लकीर

-राजकुमारी रश्मि

Sunday, January 29, 2017

सहमा सा गणतंत्र

राजमार्ग पर सुबह सवेरे
यह कैसी शोभायात्रा है
इसमें लगन समर्पण कितना
आडंबर की क्या मात्रा है
पूछ रहा कोने में सिमटा
सहमा सा गणतंत्र !

एक ओर शहनाई वादन
एक ओर बज रहे नगाड़े
मादक धुन,लय ताल, सुरों पर
लोकनृत्य के जमे अखाड़े
उमड़ रही है एक ओर से
सैन्य बलों की प्रबल सुनामी
गर्वोन्नत हो,बड़ी शान से
राजा जी ले रहे सलामी
कौन दे गया वैभवशाली
उत्सव का गुरुमंत्र !

राजपुरुष हैं, शासकगण हैं
प्रजा देखती है विस्मय से
प्रहरीगण पहरा देते हैं
यहाँ न जाने किसके भय से
गण्यमान्य अभिजात वर्ग में
गण का क्या, वह तो नगण्य है
वह उपयोगी वस्तु मात्र है
या फिर कोई जिन्स पण्य है
एक राष्ट् के समारोह में
पलता क्या षड्यंत्र !

यह है कैसी उत्सव लीला
होता यह कैसा प्रचार है
प्रश्नाकुल है व्यग्र आमजन
प्रश्नों की लंबी कतार है
कहाँ गए भोले आश्वासन
कहाँ गया सपना सुराज का
जो वंचित है इस वैभव से
क्या न रहा हिस्सा समाज का
मूल्यों का गुब्बारा फूटा
कहाँ हुआ है रंध्र !
बेसुध पड़ा हुआ जनमानस
कब होगा निस्तंद्र !
पूछ रहा कोने में सिमटा
सहमा-सा गणतंत्र !

- योगेन्द्र दत्त शर्मा

Monday, October 24, 2016

अमौसा के मेला

-कैलाश गौतम

भक्ति के रंग में रंगल गाँव देखा
धरम में, करम में, सनल गाँव देखा
अगल में, बगल में सगल गाँव देखा
अमौसा नहाये चलल गाँव देखा

एहू हाथे झोरा, ओहू हाथे झोरा
कान्ही पर बोरा, कपारे पर बोरा
कमरी में केहू, कथरी में केहू
रजाई में केहू, दुलाई में केहू

आजी रँगावत रही गोड़ देखऽ
हँसत हँउवे बब्बा, तनी जोड़ देखऽ
घुंघटवे से पूछे पतोहिया कि, अईया
गठरिया में अब का रखाई बतईहा

एहर हउवे लुग्गा, ओहर हउवे पूड़ी
रामायण का लग्गे ह मँड़ुआ के डूंढ़ी
चाउर आ चिउरा किनारे के ओरी
नयका चपलवा अचारे का ओरी

अमौसा के मेला, अमौसा के मेला

(इस गठरी और इस व्यवस्था के साथ गाँव का आदमी जब गाँव के बाहर रेलवे स्टेशन पर आता है तब क्या स्थिति होती है ?)

मचल हउवे हल्ला, चढ़ावऽ उतारऽ
खचाखच भरल रेलगाड़ी निहारऽ
एहर गुर्री-गुर्रा, ओहर लुर्री-लुर्रा
आ बीचे में हउव शराफत से बोलऽ

चपायल ह केहु, दबायल ह केहू
घंटन से उपर टँगायल ह केहू
केहू हक्का-बक्का, केहू लाल-पियर
केहू फनफनात हउवे जीरा के नियर

बप्पा रे बप्पा, आ दईया रे दईया
तनी हम्मे आगे बढ़े देतऽ भईया
मगर केहू दर से टसकले ना टसके
टसकले ना टसके, मसकले ना मसके

छिड़ल ह हिताई-मिताई के चरचा
पढ़ाई-लिखाई-कमाई के चरचा
दरोगा के बदली करावत हौ केहू
लग्गी से पानी पियावत हौ केहू
अमौसा के मेला, अमौसा के मेला

(इसी भीड़ में गाँव का एक नया जोड़ा, साल भर के अन्दरे के मामला है, वो भी आया हुआ है. उसकी गती से उसकी अवस्था की जानकारी हो जाती है बाकी आप आगे देखिये…)

गुलब्बन के दुलहिन चलै धीरे धीरे
भरल नाव जइसे नदी तीरे तीरे
सजल देहि जइसे हो गवने के डोली
हँसी हौ बताशा शहद हउवे बोली

देखैली ठोकर बचावेली धक्का
मने मन छोहारा, मने मन मुनक्का
फुटेहरा नियरा मुस्किया मुस्किया के
निहारे ली मेला चिहा के चिहा के

सबै देवी देवता मनावत चलेली
नरियर प नरियर चढ़ावत चलेली
किनारे से देखैं, इशारे से बोलैं
कहीं गाँठ जोड़ें कहीं गाँठ खोलैं

बड़े मन से मन्दिर में दर्शन करेली
आ दुधै से शिवजी के अरघा भरेली
चढ़ावें चढ़ावा आ कोठर शिवाला
छूवल चाहें पिण्डी लटक नाहीं जाला
अमौसा के मेला, अमौसा के मेला

(इसी भीड़ में गाँव की दो लड़कियां, शादी वादी हो जाती है, बाल बच्चेदार हो जाती हैं, लगभग दस बारह बरसों के बाद मिलती हैं. वो आपस में क्या बतियाती हैं …)

एही में चम्पा-चमेली भेंटइली
बचपन के दुनो सहेली भेंटइली
ई आपन सुनावें, ऊ आपन सुनावें
दुनो आपन गहना-गजेला गिनावें

असो का बनवलू, असो का गढ़वलू
तू जीजा क फोटो ना अबतक पठवलू
ना ई उन्हें रोकैं ना ऊ इन्हैं टोकैं
दुनो अपना दुलहा के तारीफ झोंकैं

हमैं अपना सासु के पुतरी तूं जानऽ
हमैं ससुरजी के पगड़ी तूं जानऽ.
शहरियो में पक्की देहतियो में पक्की
चलत हउवे टेम्पू, चलत हउवे चक्की

मने मन जरै आ गड़ै लगली दुन्नो
भया तू तू मैं मैं, लड़ै लगली दुन्नो
साधु छुड़ावैं सिपाही छुड़ावैं
हलवाई जइसे कड़ाही छुड़ावै
अमौसा के मेला, अमौसा के मेला

(कभी-कभी बड़ी-बड़ी दुर्घटनायें हो जाती हैं. दो तीन घटनाओं में मैं खुद शामिल रहा, चाहे वो हरिद्वार का कुंभ हो, चाहे वो नासिक का कुंभ रहा हो. सन ५४ के कुंभ में इलाहाबाद में ही कई हजार लोग मरे. मैंने कई छोटी-छोटी घटनाओं को पकड़ा. जहाँ जिन्दगी है, मौत नहीं है. हँसी है दुख नहीं है….)

करौता के माई के झोरा हेराइल
बुद्धू के बड़का कटोरा हेराइल
टिकुलिया के माई टिकुलिया के जोहै
बिजुरिया के माई बिजुरिया के जोहै

मचल हउवै हल्ला त सगरो ढुढ़ाई
चबैला के बाबू चबैला के माई
गुलबिया सभत्तर निहारत चलेले
मुरहुआ मुरहुआ पुकारत चलेले
छोटकी बिटउआ के मारत चलेले
बिटिइउवे प गुस्सा उतारत चलेले

गोबरधन के सरहज किनारे भेंटइली

(बड़े मीठे रिश्ते मिलते हैं.)
गोबरधन के सरहज किनारे भेंटइली
गोबरधन का संगे पँउड़ के नहइली
घरे चलतऽ पाहुन दही गुड़ खिआइब
भतीजा भयल हौ भतीजा देखाइब
उहैं फेंक गठरी, परइले गोबरधन,
ना फिर फिर देखइले धरइले गोबरधन
अमौसा के मेला, अमौसा के मेला.

(अन्तिम पंक्तियाँ हैं. परिवार का मुखिया पूरे परिवार को कइसे लेकर के आता है यह दर्द वही जानता है. जाड़े के दिन होते हैं. आलू बेच कर आया है कि गुड़ बेच कर आया है. धान बेच कर आया है, कि कर्ज लेकर आया है. मेला से वापस आया है. सब लोग नहा कर के अपनी जरुरत की चीजें खरीद कर चलते चले आ रहे हैं. साथ रहते हुये भी मुखिया अकेला दिखाई दे रहा है….)

केहू शाल, स्वेटर, दुशाला मोलावे
केहू बस अटैची के ताला मोलावे
केहू चायदानी पियाला मोलावे
सुखौरा के केहू मसाला मोलावे

नुमाइश में जा के बदल गइली भउजी
भईया से आगे निकल गइली भउजी
आयल हिंडोला मचल गइली भउजी
देखते डरामा उछल गइली भउजी

भईया बेचारु जोड़त हउवें खरचा
भुलइले ना भूले पकौड़ी के मरीचा
बिहाने कचहरी कचहरी के चिंता
बहिनिया के गौना मशहरी के चिंता

फटल हउवे कुरता टूटल हउवे जूता
खलीका में खाली किराया के बूता
तबो पीछे पीछे चलल जात हउवें
कटोरी में सुरती मलत जात हउवें
अमौसा के मेला, अमौसा के मेला

-कैलाश गौतम

Friday, July 29, 2016

मुस्कान लीले नाग

उठ रहे दंगे-धुएँ हैं
नून-रोटी साग पर
हो गया
चलना जरुरी
आग फैली आग पर

पीर की अनुभूतियाँ भी
शब्द पाकर बोलती हैं
खीर टेढ़ी हो
भले, पर तह
परत को खोलती हैं
तिलमिलाये भाव लेकर
रागिनी है राग पर

रोटियाँ, घर, द्वार, कपड़े
दाँव में खुद को लगाकर
फिर मुसीबत
झेलने को
पग धरे आगे बढाकर
मंत्र जागे पढ़ रहा
मुस्कान लीले नाग पर


-रामकिशोर दाहिया

Friday, June 24, 2016

ओ चिड़िया

-जयप्रकाश श्रीवास्तव

ओ चिड़िया
आंगन मत झांकना
दानों का हो गया अकाल

धूप के लिबासों में
झुलस रही छांव
सूरज की हठधर्मी
ताप रहा गांव
ओ चिड़िया
दिया नहीं बालना
बेच रहे रोशनी दलाल।

मेड़ के मचानों पर
ठिठुरती सदी
व्यवस्थाओं की मारी
सूखती नदी
ओ चिड़िया
तटों को न लांघना
धार खड़े करेगी सवाल।

अपनेपन का जंगल
रिश्तों के ठूंठ
अपने अपनों पर ही
चला रहे मूंठ
ओ चिड़िया
सिर जरा संभालना
लोग रहे पगड़ियां उछाल।
         
-जयप्रकाश श्रीवास्तव 

नहीं मील का पत्थर कोई

-संध्या सिंह

कितनी दूर चले हैं जाने
कैसे जीवन पथ पहचाने
नहीं मील का पत्थर कोई
दिखा सफ़र में गड़ा हुआ

खुशियाँ जंग लगे बक्से में
बंद पोटली के भीतर
ताले लगे विवशताओं के
मुस्कानो पर कड़ी नज़र
सपना चारदीवारी भीतर
पंजो के बल खडा हुआ

दंड मिला तितली को वन में
फूल फूल मंडराने पर
हवा स्वयं ही चुगली करती
शाखों के लहराने पर
पाबंदी के तंग शहर में
जंगल का मृग बड़ा हुआ

परिवर्तन ने पंख दे दिए
पर रस्मों ने डोर कसी
घर–बाहर के बीच जंग हैं
दरवाजे में देह फँसी
बहती गयी उमर नदिया-सी
मन जिद्दी-सा अड़ा हुआ

-संध्या सिंह

Thursday, March 24, 2016

विडम्बना

 -संध्या सिंह
गहन उदासी के आँगन को
उत्सव दिखना था
बालू के पन्ने पर हमको
दरिया लिखना था

पथरीला सच पाँव तले था
मिट्टी के सपने सर पर
द्वेष ईर्ष्या के गड्ढों से
भरसक चले सदा बच कर
मगर जहाँ पर मिली ढलाने
रस्ता चिकना था

पंखों की सब रद्द उड़ाने
कुहरे का परिवेश मिला
बूंदों को काजल की हद में
रहने का आदेश मिला
घूम-घूम कर एक नोक पर  
लट्टू टिकना था

-संध्या सिंह

ये कैसे बंटवारे गम के

-संध्या सिंह
घाव दर्द मुस्कान ठहाके
मिले धरा पर बिना नियम के
कैसी ये तकसीम सुखों की
कैसे ये बंटवारे गम के

कहीं अमीरी के बक्से में
सोना सोना ख़्वाब धरे हैं
कहीं फटी किस्मत का पल्लू
सिक्का सिक्का स्वप्न मरे हैं  

जहां किश्त पर नींद मिली हो
वहीं फिक्र के डाकू धमके
कैसी ये तकसीम सुखों की
कैसे ये बंटवारे गम के

कहीं कुतर्कों से ‘आज़ादी‘
रोज़ नयी परिभाषा लाती
कहीं रिवाजों के पिंजरे में
चिड़िया पंख लिये मर जाती

जहाँ भूख से आँत ऐंठती
वहीं पहाड़े हैं संयम के
ये कैसी तकसीम सुखों की
ये कैसे बंटवारे गम के

जहाँ लबालब नदिया बहती
वहीं बरसते बादल आ कर
जहाँ धरा की सूखी छाती
धूप बैठती पाँव जमा कर

जहाँ थकी हो प्यास रेत में
वहीं भरम का पानी चमके
कैसी ये तकसीम सुखों की
कैसे ये बंटवारे गम के

-संध्या सिंह

Wednesday, March 02, 2016

धधकी आग तबाही

-रामकिशोर दाहिया

ठोंके निर्मम खुराफात की
सिर पर गहरी कील
खारा पानी लेकर आईं
आँखों वाली झील

ज़हर उतारा गया हमारे
पुनः कण्ठ के नीचे
नील पड़े सच डर के मारे
खड़े झूठ के पीछे
लौट रही बारूद जेल से
धरे हाथ कंदील

ऐसा जुल्म छद्म के हाथों
करते रोज़ नया
खेले खेल नज़र से देखे
सहमी हुई बया
नागनाथ से सांप छुड़ाने
झपटी फिर से चील

उभरे हुये सुराग पकड़कर
देने चला गवाही
नहीं बुझेगी भीतर बाहर
धधकी आग तबाही
मैंने उखड़े पाँव जमाये
पत्थर जैसे मील

-रामकिशोर दाहिया

Sunday, February 28, 2016

मजबूरी है

-रामकिशोर दाहिया
मजबूरी है
कविता लिखना
कलम बाँध कर लाठी से

लाठी देख
बँदरिया नाचे
अपना मालिक चीन्हे-जानें
रबर-सरीखे
लक्ष्य अकड़ को
जोर लगाकर खींचे-तानें
दंद-फंद को
बाहर करने
भिड़ा हुआ हूँ कद-काठी से

संवेदन को
जीना होगा
तोड़ रही दम आशा छोटी
शक्ल आदमी की
है लेकिन
खून पिये औ' छीने रोटी
सुअर खाल पर
शब्द व्यंजना
ताकतवर हो तन माटी से

दूध-मलाई
मक्खन खाते, जिसकी
लाठी भैंस उसी की
फ़कत सिपाही
रहे कलम के, किये
नहीं कम पीर किसी की
बेहतर अलग
हो जाना चाहूँ
निर्बल की परपाटी से
     
-रामकिशोर दाहिया

रस की रीत लिखे

-रामकिशोर दाहिया

बिंदिया, कँगना,
पायल, बिछुआ,
प्रणय अतीत लिखे
फूलों की पंखुरियों पर
फागुन ने गीत लिखे

रंगों की मादकता उस पर
छन्दों के अनुबन्ध
कहने को आतुर हैं
अपने-अपनों के सम्बंध
पत्र-प्रेयसी को चोरी से
ज्यों मनमीत लिखे

भौंरों की अनुगूँज फूल के
कानों में अनुप्रास
भीतर-भीतर लगा कसकने
मदिराया मधुमास
मन-आँगन की
चंचल तितली
रस की रीत लिखे

सेमल, साल,
पलाश वनों में
भर सिन्दूर नहाते
महुवाए रतजगे बेचारे
भीम पलासी गाते
अलगोजे की तान पुरानी
परिणय-प्रीत लिखे
       
-रामकिशोर दाहिया

हद में ही पाँवों को मोड़ना

-अनिरुद्ध नीरव
हांफ-हांफ जाता हूँ
चार पंक्ति जोड़कर
जैसे चट्टान कोई तोड़कर

अपनी झीनी बीनी ओढ़ना
हद में ही पाँवों को मोड़ना
संख्यायें ऋण चिह्नों पर खड़ीं
सबको संचित धन-जोड़ना
स्वेद-स्वेद होता हूँ
स्वप्न को निचोड़ कर
जैसे चट्टान कोई तोड़कर

ध्वंसों की नदियों में वेग है
वेगों में पागल उद्वेग है
पागल उद्वेगों की हर लहर
कोई बरछी कोई तेग है
युद्ध-युद्ध होता हूँ
एक धार मोड़कर
जैसे चट्टान कोई तोड़कर

हर अंतर्वस्तु तार-तार क्यों
मिलकर मुर्दों का बाजार क्यों
गढ़ते है जो शब्दों की चिता
मरघट को कहते गुलजार क्यों
काँप-काँप जाता हूँ
एक शव झिंझोड़कर
जैसे चट्टान कोई तोड़कर
         
 -अनिरुद्ध नीरव
[पुनर्नवा विशेषांक 2016 से]