Thursday, October 04, 2018

समर में हम

समर में हम
औ' हमारे
कवच-कुंडल छिन चुके हैं

इन्द्र का छल -
सूर्यकुल की आस्थाएँ भी बिलाईं
धुआँ में हम घिरे
देती नहीं घटनाएँ दिखाईं
रक्त बहता
पाँव से है
देह में भाले भुँके हैं

एक खण्डित रथ बचा है
और घोड़े थके-हारे
मंत्र केवल मरण के ही
गये बरसों से उचारे
शत्रु बाहर
हैं नहीं
वे घरों के भीतर लुके हैं

आँगनों पर फिर रहें हैं
मृत्युपाखी शोर करते
रोज़ ही पूजाघरों में
रक्त-भीगे पंख झरते
सूर्यरथ के
अश्व भी
अंधी गुफाओं में रुके हैं

-कुमार रवीन्द्र

Saturday, September 08, 2018

खमोशी : हलचल

कितना खमोश है
मेरा कुछ आस-पास
कितनी बेख्वाब हैं
सारी चीजें उदास

दरवाज़े खुले हुए
सुनते कुछ, बिना कहे
बेवकूफ नज़रों से
मुँह बाये देख रहे

चीज़ें हैं, चीज़ें बेजान हैं
फिर भी यह लगता है
बेहद परेशान हैं
मेरी नाकामी से
ये भी नाकाम हैं
मेरी हैरानी से
ये भी हैरान हैं

टिक-टिक कर एक घड़ी
चुप्पी को कुचल रही
लगता है दिल की ही
धड़कन को निगल रही

कैसे कुछ अपने आप
गिर जाये, पड़ जाये
खनक कर भनक कर
लड़ जाये भिड़ जाये

लगता है बैठा हूँ
भूतों के डेरे में
सजे हुए सीलबंद
एक बड़े कमरे में

सदियों से दूर
किसी अंधे उजियाले में
अपनों से दूर
किसी पिरामिडी घेरे में

एकटक घूर रहीं
मुझ को बस दीवारें
जी करता उन पर जा
यह मत्था दे मारें

चिल्ला कर गूँजों से
पत्थर को थर्रा दें
घेरी खामोशी की
दीवारें बिखरा दें

इन मुरदा महलों की
मीनारें हिल जायें
इन रोगी ख्य़ालों की
सीमाएँ घुल जायें

अन्दर से बाहर आ
सदियों की कुंठाएँ
बहुत बड़े जीवन की
हलचल से मिल जायें


-कुँवर नारायण
(तीसरा सप्तक से)

घर रहेंगे

घर रहेंगे
हमीं उनमें रह न पायेंगे
सत्य होगा
हम अचानक बीत जायेंगे
अनर्गल ज़िन्दगी ढोते
किसी दिन हम
एक आशय तक पहुँच
सहसा बहुत थक जायेंगे

मृत्यु होगी खड़ी
सम्मुख राह रोके
हम जगेंगे
यह विवधता स्वप्न खो के
और चलते भीड़ में
कन्धे रगड़ कर हम
अचानक जा रहे होंगे कहीं
सदियों अलग हो के

प्रकृति औ पाखण्ड के
ये घने लिपटे
बँटे, ऐंठे तार
जिन से कहीं गहरा
कहीं सच्चा
मैं समझता प्यार
मेरी अमरता की
नहीं देंगे ये दुहाई
छीन लेगा इन्हें
हमसे देह-सा संसार

राख-सी साँझ
बुझे दिन की घिर जायेगी
वही रोज संसृति का
अपव्यय दुहरायेगी

-कुँवर नारायण
(तीसरा सप्तक से)

Sunday, August 19, 2018

मौसम की दिन-दूनी भीषण तैयारी है

मौसम की
दिन-दूनी
भीषण तैयारी है
अब सूख चुके हैं पुष्प
वृंत की बारी है

पत्तों के झरने का था
सदा समय निश्चित
अब असमय ही पतझार
पाँव फैलाता है
सर्जन करने में तो कुछ
मेहनत लगती है
पर ध्वंस मचाने में
किसका क्या जाता है
तटबन्ध सभी
टूटे-बिखरे-से जाते हैं
रसधारा को भी
लगी ज़रा बीमारी है

शुद्धता आज अपने दिन
गिन गिन काट रही
यह समय मिलावट का ही तो
ब्यौहारी है

संकर पौधों की
संकर बीजों की खेती
ढक रही प्रतिष्ठा
अब प्रामाणिक बीजों की
जीवन जीने के भी
निश्चित फॉर्मूले हैं
आवश्यकता क्या
दुनिया-भर की चीज़ों की
लेते जमुहाई नियम-कायदे
बरसों से
अब तौर-तरीकों की ज़्यादा
बलिहारी है


-पंकज परिमल

Thursday, August 16, 2018

वर्ष का प्रथम

पृथ्वी के उठे उरोज
मंजु पर्वत निरुपम
किसलयों बँधे
पिक भ्रमर-गुंज भर मुखर
प्राण रच रहे सधे
प्रणय के गान
सुन कर सहसा
प्रखर से प्रखरतर हुआ
तपन-यौवन सहसा
ऊर्जित,भास्वर
पुलकित
शत शत व्याकुल कर भर
चूमता रसा को बार बार
चुम्बित दिनकर
क्षोभ से, लोभ से ममता से
उत्कंठा से
प्रणय के नयन की समता से
सर्वस्व दान
दे कर, ले कर सर्वस्व
प्रिया का सुक्रत मान

दाब में ग्रीष्म
भीष्म से भीष्म बढ़ रहा ताप
प्रस्वेद कम्प
ज्यों युग उर पर और चाप-
और सुख-झम्प
निश्वास सघन
पृथ्वी की--बहती लू
निर्जीवन जड़-चेतन

यह सान्ध्य समय
प्रलय का दृश्य भरता अम्बर
पीताभ, अग्निमय, ज्यों दुर्जय
निर्धूम, निरभ्र, दिगन्त प्रसर
कर भस्मीभूत
समस्त विश्व को एक शेष,
उड़ रही धूल
नीचे अदृश्य हो रहा देश

मैं मन्द-गमन
धर्माक्त, विरक्त पार्श्व-दर्शन से
खींच नयन
चल रहा नदी-तट को
करता मन में विचार-
'हो गया व्यर्थ जीवन
मैं रण में गया हार !
सोचा न कभी-
अपने भविष्य की रचना पर
चल रहे सभी'
इस तरह बहुत कुछ
आया निज इच्छित
स्थल पर
बैठ एकान्त देख कर
मर्माहत स्वर भर !

फिर लगा सोचने यथासूत्र-
'मैं भी होता
यदि राजपुत्र-
मैं क्यों न सदा कलंक ढोता
ये होते-जितने विद्याधर
मेरे अनुचर
मेरे प्रसाद के लिए
विनत-सिर उद्यत-कर
मैं देता कुछ
रख अधिक
किन्तु जितने पेपर
सम्मिलित कंठ से
गाते मेरी कीर्ति अमर
जीवन-चरित्र
लिख अग्रलेख
अथवा छापते विशाल चित्र

इतना भी नहीं
लक्षपति का भी यदि कुमार
होता मैं
शिक्षा पाता अरब-समुद्र पार
देश की नीति के
मेरे पिता परम पण्डित
एकाधिकार रखते भी
धन पर
अविचल-चित्त होते
उग्रतर साम्यवादी
करते प्रचार
चुनती जनता
राष्ट्रपति उन्हे ही सुनिर्धार
पैसे में दस दस
राष्ट्रीय गीत रच कर
उन पर
कुछ लोग बेचते
गा-गा गर्दभ-मर्दन-स्वर
हिन्दी-सम्मेलन भी न कभी
पीछे को पग रखता कि
अटल साहित्य कहीं यह हो डगमग
मैं पाता खबर तार से
त्वरित समुद्र-पार
लार्ड के लाड़लों को देता
दावत विहार
इस तरह खर्च केवल
सहस्र षट मास-मास
पूरा कर आता लौट
योग्य निज पिता पास
वायुयान से
भारत पर रखता चरण-कमल
पत्रों के प्रतिनिधि-दल में
मच जाती हलचल
दौड़ते सभी
कैमरा हाथ
कहते सत्वर
निज अभिप्राय
मैं सभ्य मान जाता झुक कर
होता फिर खड़ा
इधर को मुख कर कभी उधर
बीसियों भाव की दृष्टि
सतत नीचे ऊपर
फिर देता दृढ़ संदेश
देश को मर्मांतिक
भाषा के बिना न रहती
अन्य गंध प्रांतिक
जितने रूस के भाव
मैं कह जाता अस्थिर
समझते विचक्षण ही
जब वे छपते फिर-फिर
फिर पिता संग
जनता की सेवा का व्रत
मैं लेता अभंग
करता प्रचार
मंच पर खड़ा हो
साम्यवाद इतना उदार

तप तप मस्तक
हो गया सान्ध्य-नभ का
रक्ताभ दिगन्त-फलक
खोली आँखें आतुरता से
देखा अमन्द
प्रेयसी के अलक से
आयी ज्यों स्निग्ध गन्ध,
'आया हूँ मैं तो यहाँ अकेला
रहा बैठ'
सोचा सत्वर
देखा फिर कर
घिर कर हँसती उपवन-बेला
जीवन में भर
यह ताप, त्रास
मस्तक पर ले कर
उठी अतल की अतुल साँस
ज्यों सिद्धि परम
भेद कर कर्म
जीवन के दुस्तर क्लेश
सुषम आयी ऊपर
जैसे पार कर क्षीर सागर
अप्सरा सुघर
सिक्त-तन-केश
शत लहरों पर
काँपती विश्व के
चकित दृश्य के दर्शन-शर

बोला मैं
बेला नहीं ध्यान लोगों का
जहाँ खिली हो बन कर वन्य गान !
जब तार प्रखर
लघु प्याले में अतल की
सुशीतलता ज्यों कर
तुम करा रही हो यह
सुगन्ध की सुरा पान !
लाज से नम्र हो उठा
चला मैं और पास
सहसा बह चली
सान्ध्य बेला की सुबातास
झुक-झुक, तन-तन
फिर झूम-झूम
हँस-हँस झकोर
चिर-परिचित चितवन डाल
सहज मुखड़ा मरोर
भर मुहुर्मुहर, तन-गन्ध विकल
बोली बेला-
'मैं देती हूँ सर्वस्व
छुओ मत, अवहेला
की अपनी स्थिति की जो तुमने
अपवित्र स्पर्श
हो गया तुम्हारा, रुको
दूर से करो दर्श '

मैं रुका वहीं
वह शिखा नवल
आलोक स्निग्ध भर
दिखा गयी पथ जो उज्ज्वल
मैंने स्तुति की-
"हे वन्य वह्नि की तन्वि-नवल
कविता में कहाँ खुले
ऐसे दल दुग्ध-धवल ?
यह अपल स्नेह-
विश्व के प्रणयि-प्रणयिनियों का
हार उर गेह ?
गति सहज मन्द
यह कहाँ-कहाँ वामालक
चुम्बित पुलक गन्ध !
'केवल आपा खोया
खेला इस जीवन में'
कह
सिहरी तन में वन बेला !
कूऊ कू--ऊ' बोली कोयल
अन्तिम सुख-स्वर
'पी कहाँ पपीहा-
प्रिय मधुर विष गयी छहर,
उर बढ़ा आयु
पल्लव को हिला
हरित बह गयी वायु,
लहरों में कम्प और लेकर
उत्सुक सरिता
तैरी, देखती तमश्चरिता
छबि बेला की नभ की
ताराएँ निरुपमिता
शत-नयन-दृष्टि
विस्मय में भर कर रही
विविध-आलोक-सृष्टि

भाव में हरा मैं
देख मन्द हँस दी बेला
बोली अस्फुट स्वर से-
'यह जीवन का मेला
चमकता सुघर
बाहरी वस्तुओं को लेकर
त्यों-त्यों आत्मा की निधि
पावन, बनती पत्थर
बिकती जो कौड़ी-मोल
यहाँ होगी कोई
इस निर्जन में
खोजो, यदि हो समतोल
वहाँ कोई, विश्व के नगर-धन में
है वहाँ मान
इसलिए बड़ा है एक
शेष छोटे अजान
पर ज्ञान जहाँ
देखना-
बड़े-छोटे असमान समान वहाँ
सब सुहृद्वर्ग
उनकी आँखों की आभा से
दिग्देश स्वर्ग

बोला मैं-
'यही सत्य सुन्दर
नाचती वृन्त पर तुम
ऊपर
होता जब उपल-प्रहार-प्रखर
अपनी कविता
तुम रहो एक मेरे उर में
अपनी छबि में शुचि संचरिता '

फिर उषःकाल
मैं गया टहलता हुआ
बेल की झुका डाल
तोड़ता फूल कोई ब्राह्मण
'जाती हूँ मैं' बोली बेला,
जीवन प्रिय के चरणों में
करने को अर्पण
देखती रही
निस्वन
प्रभात की वायु बही


-सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

Wednesday, August 15, 2018

नन्हीं चिड़िया

छोटा-सा आकाश मिला है
फिर भी पंख पसार रही है
नन्हीं चिड़िया !

सोच रही है, कभी कहीं तो
एक बड़ा आकाश मिलेगा
जिसमें होंगे भूरे बादल
इंद्रधनुष भी कहीं खिलेगा
साध लिये लंबी उड़ान की
खुद को कर तैयार रही है
नन्हीं चिड़िया !

मिले बड़ा आकाश कहाँ, कब
यह सब आखिर किसे पता है
पर चिड़िया यह जान चुकी है
यह उसकी आवश्यकता है
यह क्या कम है, इस कोशिश में
हाथ-पाँव तो मार रही है
नन्हीं चिड़िया !

खुला-खिला आकाश समाये
मुट्ठी में, उसका सपना है
जितना रहे पहुँच के भीतर
समझो, उतना ही अपना है
अपने कस-बल से उड़ान की
प्रतिभा सतत निखार रही है
नन्हीं चिड़िया !

सपना सिर्फ न सपना है यह
सपना उसकी जिजीविषा है
पूरा इसे करे, इस क्रम में
नाप रही वह दिशा-दिशा है
अपनी जिजीविषा को क्रमशः
ऊँचा अधिक उभार रही है
नन्हीं चिड़िया !

दाना-पानी से भी ज्यादा
उसको प्रिय अपनी आज़ादी
खुली हवा में मुक्त साँस ले
यही ज़रूरत है बुनियादी
करती है संधान निरंतर
हार नहीं स्वीकार रही है
नन्हीं चिड़िया !

पर जाने किस प्रत्याशा में
मेरी ओर निहार रही है
नन्हीं चिड़िया !


-योगेन्द्र दत्त शर्मा

Tuesday, August 14, 2018

पन्द्रह अगस्त

आज जीत की रात
पहरुए ! सावधान रहना
खुले देश के द्वार
अचल दीपक समान रहना

प्रथम चरण है नए स्वर्ग का
है मंज़िल का छोर
इस जनमंथन से उठ आई
पहली रत्न-हिलोर
अभी शेष है पूरी होना
जीवन-मुक्ता-डोर
क्योंकि नहीं मिट पाई दुख की
विगत साँवली कोर
ले युग की पतवार
बने अम्बुधि समान रहना

विषम शृंखलाएँ टूटी हैं
खुली समस्त दिशाएँ
आज प्रभंजन बनकर चलतीं
युग-बंदिनी हवाएँ
प्रश्नचिह्न बन खड़ी हो गईं
यह सिमटी सीमाएँ
आज पुराने सिंहासन की
टूट रही प्रतिमाएँ
उठता है तूफ़ान, इन्दु ! तुम
दीप्तिमान रहना

ऊँची हुई मशाल हमारी
आगे कठिन डगर है
शत्रु हट गया, लेकिन उसकी
छायाओं का डर है
शोषण से है मृत समाज
कमज़ोर हमारा घर है
किन्तु आ रही नई ज़िन्दगी
यह विश्वास अमर है
जन-गंगा में ज्वार
लहर तुम प्रवहमान रहना
पहरुए ! सावधान रहना

-गिरिजा कुमार माथुर

Saturday, August 11, 2018

जाने क्या बतियाते पेड़

टहनी हिला-हिला
आपस में
जाने क्या
बतियाते पेड़

जंगल की
सब खुफिया बातें
इनके ज़ेहन में रहतीं
कितनी चीखें
घुलीं हवा में
पूरे युग का
सच कहतीं
हद से बेहद
अत्याचारों से
जब-तब
अकुलाते पेड़
टहनी हिला हिला........

हिरन-हिरनियों के
बेसुध दल पर जब
हाँका पड़ जाता
तितर-बितर होकर
जंगल का
सब गणतंत्र
बिखर जाता
खुद को विवश
समझ कर
अपने मन में
बहुत लजाते पेड़
टहनी हिला हिला........

राजा
अहंकार में डूबा
हुमक-हुमक कर
चलता है
एक नहीं
हो पाये जंगल
इसी जुगत में
रहता है
राजा की
दोमुँही सोच पर
अन खाये
अनखाते पेड़
टहनी हिला हिला........

जंगल में
कितनी ताकत है
कौन इन्हें अब
समझाये
ये चाहें तो
राजा क्या है
अखिल व्योम भी
झुक जाये
मार हवा के टोने
सबको
रहते सदा
जगाते पेड़
टहनी हिला-हिला
आपस में
जाने क्या
बतियाते पेड़

-डा० जगदीश व्योम

Thursday, August 09, 2018

जनता का गीत

तुम अँग्रेजी बुल-डॉग
और हम
पन्नी-खाती गायें

चरण चाट कर, पूँछ हिलाकर
तुम-
महलों में सोते
हम दर-दर अपनी लाशें
अपने
कंधों पर ढोते
तुम उड़ो हवा के संग
और हम
डग-डग डपटे जायें

चाहे जिस पर भौंको
काटो,
दौड़ाओ, गुर्राओ
जहाँ मन करे-
छीनो, झपटो, लूटो,
मारो, खाओ.
तुम टूटो बन कर मौत
और हम
भागें दायें- बायें

संविधान, कानून, कोर्ट
सब फेल
तुम्हारे आगे
करते तुम हो, लेकिन
हरदम
भरते हमीं अभागे
तुम खेलो अपने खेल
और हम
लाठी- गोली खायें

-जय चक्रवर्ती

Tuesday, August 07, 2018

कंक्रीट के महानगर में

कंक्रीट के महानगर में
सिमट रहे हैं लोग
कुनबा, घर, परिवार बिखरते
कैसा ये संयोग

अपनापन अब काट रहा है
बाहर सुख-दुख बाँट रहा है
भाई झगड़े, अलग हो गये
आँगन पड़ा उचाट रहा है
प्रेमभाव स्वारथ में बदला
ये कैसा दुर्योग

दादा नाना गुए पराये
चाचा मामा सब समझौते
किससे कैसे मतलब हल हो
बदलें वैसे रोज मुखौटे
कौन किसी पर करे भरोसा
बिना रीढ़ के लोग

सब अपने अपने में खोये
जाग रहे या सोये-सोये
जाने कैसी फसल उगी है
कैसे बीज वक़्त ने बोये
वाट्सप और फेसबुक पर ही
बतियाते अब लोग

कंक्रीट के महानगर में
सिमट रहे हैं लोग
कुनबा, घर, परिवार बिखरते
कैसा ये संयोग

-सोनम



मैं कैसे बदलूँ

मैं कैसे बदलूँ
जैसे दिन रोज़ बदलता है

रोज़ बदल जाती
जैसे कैलेण्डर की तारीख़
राजभवन की अक्सरहाँ
बदला करती है सीख
रंग बदलते
मौसम से मन बहुत दहकता है

खरबूजे को देख
बदल लेता खरबूजा रंग
जगत बदलते ही गिरगिट का
होता दूजा रंग
कहीं बरसते मेघ
कहीं पर भूतल जलता है

बदली हुई हवा के
रुख की हो पहले पहचान
और नदी की गहराई का
थोड़ा भी अनुमान
सोचे-समझे बिना
वनों में कौन टहलता है

-नचिकेता

राजा आएँगे

दीन-दलित के कीर्तन गाओ
राजा आएँगे
तोरन-बन्दनवार सजाओ
राजा आएँगे

उद्घाटन होगा
नूतन श्मशान घरों का
होगा मंगल-गान मूक
अँधे, बहरों का
फरियादी को दूर भगाओ
राजा आएँगे

माला लेकर
खड़े हुए तस्कर, अपराधी
बड़े सेठ के घर में है
बेटी की शादी
नयी प्रगति का जश्न मनाओ
राजा आएँगे

बिन त्योहार मनाई जाएगी
दीवाली
खूब बहेगी महँगी मदिराओं
की नाली
जनहित के नगमे दुहराओ
राजा आएँगे

छोड़ी जाएगी
आश्वासन की फुलझड़ियाँ
चीख़ों के होठों पर हों
गीतों की लड़ियाँ
कमलछाप झण्डा लहराओ
राजा आएँगे

-नचिकेता

Thursday, August 02, 2018

छुआ मैंने आग को

छुआ मैंने आग को
पर सावधानी से छुआ
खेलता अक्सर रहा
बेख़ौफ़, रिश्तों का जुआ

थी तजुर्बों की हिदायत
मानता कैसे न मैं
और कुछ ही हो गया
मैं ही रहा, जैसे न मैं
हर क़दम पर फिर नया
अनुभव अनोखा-सा हुआ
छुआ मैंने सूर्य को
पर रातरानी से छुआ

ज़िंदगी को दाँव पर
रखता रहा मैं उम्र भर
हो नहीं पाया किसी भी
हार का कोई असर
पी गया चुपचाप मैं
जो आँख से पानी चुआ
छुआ मैंने दर्द को
कविता, कहानी से छुआ

चोट खाई ख़ूब पर
सद्भावनाओं के तहत
संधि के प्रस्ताव पर
करता गया मैं दस्तखत
भर्त्सना, निंदा लगीं सब
मुझे मनमानी दुआ
छुआ मैंने राग को
पर सुर्ख़ पानी से छुआ

रहा संयत ख़ूब भावुक
अश्व की वल्गा कसी
अश्रु आँखों में, न अधरों
पर कभी प्रगटी हँसी
झेल कर पल पल मरण
जीवित रहा मन का सुआ
छुआ मैंने देश को
पर राजधानी से छुआ

-योगेन्द्र दत्त शर्मा

Sunday, July 29, 2018

सीमाओं में कहाँ बँधा है

सीमाओं में कहाँ बँधा है
प्रतिभाओं का तार
गगन के जाना जिनको पार

लिए हाथ में श्रम की लाठी
रच लेते ये नव परिपाटी
सपने आसमान के लेकिन
पाँव तले रहती है माटी
अपनी कूवत से कर लेते
सात समंदर पार
गगन के जाना जिनको पार

चाँद तोड अमृत निचोड़ लें
बरसाती जलधार मोड़ दें
टूटे हुए शिकारे कश्ती
जब चाहे ये उन्हें जोड़ लें
पाँव वक्त के सिर पर
रखने को हरदम तैयार
गगन के जाना जिनको पार

ये संघर्षों का प्रतिफल हैं
महाउदधि में मीठा जल हैं
नैराश्यों के वियावान में
एक मात्र ये ही संबल हैं
ये प्रलयी अंधड़ के आगे
भरते हैं हुंकार
गगन के जाना जिनको पार

-सोनम 

Tuesday, July 24, 2018

ये वृक्ष

याचक बन कर
कृपण सूर्य का
झुक झुक कर
वन्दन करते हैं
ऊँचाई पर खड़े हुए
ये वृक्ष
बहुत बौने लगते हैं

भ्रम है इनको
जब चाहें ये
आसमान
मुट्ठी में भर लें
जब चाहें
तारों को तोड़ें
चन्दा को
सिरहाने रख लें
दरबारी हैं ये पर्वत के
अंधड़ आने पर हिलते हैं

अभिमानी हैं
इनके सर पर
अंहकार के
सींग उगे हैं
इन्द्रधनुष
कंधे पर लादे
मेघों के ये
गले लगे हैं
इनकी
तारीफें कर करके
होंठ हवाओं के छिलते हैं

-कुमार शिव

Wednesday, July 18, 2018

पाँव जले छाँव के

हम ठहरे गाँव के
लाल हुए धूप में
पाँव जले छाँव के
हम ठहरे गाँव के

हींसे में भूख-प्यास
लिये हुए मरी आस
भटक रहे जन्म से
न कोई आसपास
नदी रही और की
लट्ठ हुए नाव के
हम ठहरे गाँव के

पानी बिन कूप हुए
दुविधा के भूप हुए
छाँट रही गृहणी भी
इतना विद्रूप हुए
टिके हुए आश में
हाथ लगे दाँव के
हम ठहरे गाँव के

याचना के द्वार थे
सामने त्यौहार थे
जहाँ भी उम्मीद थी
लोग तार-तार थे
हार नहीं मानें हम
आदमी तनाव के
हम ठहरे गाँव के

-रामकिशोर दाहिया
कटनी [म.प्र.]

Saturday, July 14, 2018

अभी न होगा मेरा अन्त

अभी न होगा मेरा अन्त
अभी-अभी ही तो आया है
मेरे वन में मृदुल वसन्त-
अभी न होगा मेरा अन्त

हरे-हरे ये पात,
डालियाँ, कलियाँ कोमल गात

मैं ही अपना स्वप्न-मृदुल-कर
फेरूँगा निद्रित कलियों पर
जगा एक प्रत्यूष मनोहर
पुष्प-पुष्प से तन्द्रालस
लालसा खींच लूँगा मैं,
अपने नवजीवन का अमृत
सहर्ष सींच दूँगा मैं
द्वार दिखा दूँगा फिर उनको
हैं मेरे वे जहाँ अनन्त-
अभी न होगा मेरा अन्त

मेरे जीवन का यह है
जब प्रथम चरण
इसमें कहाँ मृत्यु ?
है जीवन ही जीवन
अभी पड़ा है आगे
सारा यौवन
स्वर्ण-किरण कल्लोलों पर
बहता रे, बालक-मन
मेरे ही अविकसित राग से
विकसित होगा बन्धु
दिगन्त
अभी न होगा मेरा अन्त

-सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

Tuesday, July 03, 2018

सुनो सभासद

सुनो सभासद
हम केवल
विलाप सुनते हैं
तुम कैसे सुनते हो अनहद

पहरा वैसे
बहुत कड़ा है
देश किन्तु अवसन्न पड़ा है

खत्म नहीं
हो पाई अब तक
मन्दिर से मुर्दों की आमद

आवाजों से
बचती जाए
कानों में है रुई लगाए

दिन-पर-दिन है
बहरी होती जाती
यह बड़ बोली संसद

बौने शब्दों के
आश्वासन
और दुःखी कर जाते हैं मन

उतना छोटा
काम कर रहा
जिसका है जितना ऊँचा कद
                 

-माहेश्वर तिवारी

हम कठपुतली रहे समय के

हाँ, जीवन-भर
हम कठपुतली रहे समय के

हमने देखे
किसिम-किसिम के
स्वाँग हाट के
बाँचे मंतर
दरवाज़े पर लिखे लाट के

उनके रहते
सुन न सके हम
गान हृदय के

राजाओं के हर खेले में
हम शामिल थे
क़त्ल हुए हम कभी 
कभी हम ही क़ातिल थे

नारे बने
ख़ुशी से हम
शाहों की जय के

गिरवी रखकर
पुरखों की थाती हम लाये
सुख-सुविधाएँ
और हुए युग के चौपाये

भूल गये हम
जो सपने थे
सूर्योदय के

-कुमार रवीन्द्र

Saturday, June 30, 2018

याद तुम्हारी

याद तुम्हारी जैसे कोई
कंचन-कलश भरे
जैसे कोई किरन अकेली
पर्वत पार करे।

लौट रही गायों के
संग-संग
याद तुम्हारी आती
और धूल के
संग-संग
मेरे माथे को छू जाती
दर्पण में अपनी ही छाया-सी
रह-रह उभरे
जैसे कोई हंस अकेला
आंगन में उतरे।

जब इकला कपोत का
जोड़ा
कंगनी पर आ जाए
दूर चिनारों के
वन से
कोई वंशी स्वर आए
सो जाता सूखी टहनी पर
अपने अधर धरे
लगता जैसे रीते घट से
कोई प्यास हरे।

-माहेश्वर तिवारी

घर जैसे

घर न रह गए
अब, घर जैसे
जीवन के हरियालेपन पर
उग आए हों
बंजर जैसे ।

रिश्तों की
कोमल रचनाएँ
हमको अधिक
उदास बनाएँ

दादी वाली
किस्सागोई
शापग्रस्त है
पत्थर जैसे ।

बाहर हँसते
भीतर रोते
नींद उचटती
सोते-सोते

शब्द बने परिवार
टूटकर
बिखर रहे हैं
अक्षर जैसे ।

-माहेश्वर तिवारी

खुद से खुद की बातें

खुद से खुद की
बतियाहट
हम, लगता भूल गए ।

डूब गए हैं
हम सब इतने
दृश्य कथाओं में
स्वर कोई भी
बचा नहीं है
शेष, हवाओं में

भीतर के जल की
आहट
हम, लगता भूल गए ।

रिश्तों वाली
पारदर्शिता लगे
कबंधों-सी
शामें लगती हैं
थकान से टूटे
कंधों-सी

संवादों की
गरमाहट
हम, लगता भूल गए ।


-माहेश्वर तिवारी 

Sunday, June 24, 2018

गंगा मइया

गंगोत्री में पलना झूले
आगे चले बकइयाँ
भागीरथी घुटुरवन डोले
शैल-शिखर की छइयाँ
                       
छिन छिपती
छिन हौले किलके
छिन ता-झाँ वह बोले
अरबराय के गोड़ी काढ़े
ठमकत-ठमकत डोले                                 
घाटी-घाटी दही-दही कर
चहके सोनचिरैया
पाँवों पर पहुड़ाकर परबत
गाये खंता-खैयाँ   

पट्टी पूज रही है
वरणाव्रत की परिक्रमा कर
बालों में रूमाल फेन का
दौड़े गाये हर हर
चढ़ती उमर चौंकड़ी भरती
छूट गई लरिकइयाँ
भली लगे मुग्धा को
अपनी ही प्यारी परछइयाँ 

दिन-दिन अँगिया छोटी पड़ती
गदराये तरुणाई
पोर-पोर चटखे मादकता
लहराये अँगड़ाई
दोनों तट प्रियतम शान्तनु की
फेर रहीं दो बहियाँ
छूट गया मायका बर्फ का
बाबुल की अँगनइयाँ                   

भूखा कहीं देवव्रत टेरे
दूध भरी है छाती
दौड़ पड़ी ममता की मारी
तजकर सँग-संघाती
गंगा नित्य रँभाती
फिरती जैसे कपिला गइया
सारा देश क्षुधातुर बेटा
वत्सल गंगा मइया' 

-उमाकान्त मालवीय

देखेगा कौन

बगिया में नाचेगा मोर
देखेगा कौन ?
तुम बिन ओ मेरे चितचोर
देखेगा कौन ?

नदिया का यह नीला जल
रेतीला घाट
झाऊ की झुरमुट के बीच
यह सूनी बाट
रह-रह कर उठती हिलकोर
देखेगा कौन ?
आँखड़ियों से झरते लोर
देखेगा कौन ?

बौने ढाकों का यह वन
लपटों के फूल
पगडंडी के उठते पाँव
रोकते बबूल
बौराये आमों की ओर
देखेगा कौन ?
पाथर-सा ले हिया कठोर
देखेगा कौन ?

नाचती हुई फुल-सुंघनी
बनतीतर शोख
घास पर सोन-चिरैया
डाल पर महोख
मैना की यह पतली ठोर
देखेगा कौन ?
कलंगी वाले ये कठफोर
देखेगा कौन ?

आसमान की ऐंठन-सी
धुएँ की लकीर
ओर-छोर नापती हुई
जलती शहतीर
छू-छूकर सांझ और भोर
देखेगा कौन ?
दुखती यह देह पोर-पोर
देखेगा कौन ?

-शम्भुनाथ सिंह

एक नेह का सोता भीतर

नदीधार ने
कुछ हिरदय ने
हमें बनाया बहता पानी

बरसों पहले
हम जनमे थे नदी किनारे
सुरज देवता तब रहते थे
घर के द्वारे

रहो सहज ही -
बहते जल से
यही सीख हमने है जानी

अम्मा ने था कहा -
नदी है तारनहारी
चाहे कुछ हो
कभी नहीं होती वह खारी

झुर्री-झुर्री हुई
साँस में
बसी हुई माँ की वह बानी

एक नेह का सोता भीतर
देता साखी
बहते जल ने ही
मानुष की पत है राखी

पिछले दिनों
नदी को देखा-
नहीं लगी जानी-पहचानी

-कुमार रवीन्द्र