Friday, February 10, 2012

ज़िन्दगी


-महेंद्रभटनागर

बिखरता जा रहा सब कुछ
सिमटता कुछ नहीं !

ज़िन्दगी
एक बेतरतीब सूने बंद कमरे की तरह,
दूर सिकता पर पड़े तल-भग्न बजरे की तरह,
हर तरफ़ से कस रहीं गाँठें
सुलझता कुछ नहीं !

ज़िन्दगी क्या ?
धूमकेतन-सी अवांछित
जानकी-सी त्रस्त लांछित,
किस तरह हो संतरण
भारी भँवर, भारी भँवर !
हो प्रफुल्लित किस तरह बेचैन मन
तापित लहर, शापित लहर !
.
ज़िन्दगी :
बदरंग केनवस की तरह
धूल की परतें लपेटे
किचकिचाहट से भरी,
स्वप्नवत है
वाटिका पुष्पित हरी !
हर पक्ष भावी का भटकता है
सँभलता कुछ नहीं !

पर, जी रहा हूँ
आग पर शय्या बिछाये !
पर, जी रहा हूँ
शीश पर पर्वत उठाये !
पर, जी रहा हूँ
कटु हलाहल कंठ का गहना बनाये !
ज़िन्दगी में बस
जटिलता ही जटिलता है
सरलता कुछ नहीं !

Sunday, February 05, 2012

धूप से संवाद



-संजीव गौतम

धूप से
संवाद करना
आ गया है

उम्र भर
सच को सराहा
सच कहा
झूठ का
हर वार
सीने पर सहा
क्या डरायेंगे
हिरण कश्यप हमें
स्वयं को
प्रहलाद करना
आ गया है

धूल वाले रास्ते
हक के सबब
राजमार्गों से करेंगे
होड़ अब
कान वाले
खोलकर
सुन लें सभी
मौन को
प्रतिवाद करना
आ गया है

Sunday, January 15, 2012

दिन दिवंगत हुए


-डॉ० कुँअर बेचैन
[ डॉ० कुँअर बेचैन ]

रोज़ आँसू बहे रोज़ आहत हुए
रात घायल हुई, दिन दिवंगत हुए

हम जिन्हें हर घड़ी याद करते रहे
रिक्त मन में नई प्यास भरते रहे
रोज़ जिनके हृदय में उतरते रहे
वे सभी दिन चिता की लपट पर रखे
रोज़ जलते हुए आख़िरी ख़त हुए


शीश पर सूर्य को जो सँभाले रहे
नैन में ज्योति का दीप बाले रहे
और जिनके दिलों में उजाले रहे
अब वही दिन किसी रात की भूमि पर
एक गिरती हुई शाम की छत हुए !


जो अभी साथ थे, हाँ अभी, हाँ अभी
वे गए तो गए, फिर न लौटे कभी
है प्रतीक्षा उन्हीं की हमें आज भी
दिन कि जो प्राण के मोह में बंद थे
आज चोरी गई वो ही दौलत हुए


चाँदनी भी हमें धूप बनकर मिली
रह गई जिंन्दगी की कली अधखिली
हम जहाँ हैं वहाँ रोज़ धरती हिली
हर तरफ़ शोर था और इस शोर में
ये सदा के लिए मौन का व्रत हुए



-डॉ० कुँअर बेचैन

Friday, January 13, 2012

अनचाहे फूलेंगे टेसू के फूल

[ डा० विनोद निगम ]

-विनोद निगम


बीती दुहरायेंगे
तन मन भरमायेंगे
प्राणों को छू लेंगे टेसू के फूल

धूप की चिरैया
अमराई के आंगन में
फुदकेगी, गाएगी
बंसवट के कानों में
उम्र च़ढी हवा
प्रीति के स्वर दुहराएगी
दृग में तिर जाएंगे
पानी में उतराते
जोड़े सुरखाबों के
महुए की डाल
झुकेंगी, परिचित बाँहों सी
बाँहों तक जाएंगी
आसपास झूमेंगे
सुधियों को चूमेंगे
नयनों में झूलेंगे, टेसू के फूल

इच्छाओं के तन पर
रह रह पुरवाई के
कांटे चुभ जाएंगे
आँखों में,
बुझे हुए खालीपन के
अनगिन बिरवे अंखुवाएंगे
सूनापन डोलेगा
आंगन दहलीजों के
बन्द द्वार खोलेगा
अमलतास के पत्तों से
झरते चन्दन-क्षण
लौट नहीं आएंगे
प्यास को उगाएंगे
सांस में समाएंगे,
जन्म भर न भूलेंगे
टेसू के फूल

Sunday, January 08, 2012

बड़े चाव से बतियाता था

-अवनीश सिंह चौहान
[अवनीश सिंह चौहान]


बड़े चाव से बतियाता था
अपना गाँव-समाज
छोड़ दिया है चौपालों में
मिलना-जुलना आज

बीन-बान लाता था लकड़ी
अपना दाऊ बागों से
धर अलाव पर आँच दिखाता
सबै बुलाता रागों से

सब आते निज गाथा गाते
इक दूजे पर नाज़

नैहर से जब आते मामा
सब दौड़े-दौड़े आते
फूले नहीं समाते मिलकर
घण्टों-घण्टों बतियाते

भेंटें होतीं, हँसना होता
खुलते थे कुछ राज

जब जाता था घर से कोई
पग पीछे-पीछे चलते
गाँव किनारे तक सब आते
थे अपनी आँखे मलते

डूब गया है किस पोखर में
गाँवों का वह साज




Monday, January 02, 2012

इन, उनके जैसा हो लेना

-नईम
[ नईम ]


इन, उनके जैसा हो लेना
बहुत सरल है
लेकिन अपने जैसा होना
बहुत विरल है।

औरों से कुछ अलग तबीयत बूबासों में
मुद्दत से रहते आए हम देवासों में
पैर टिकाए इस धरती पर ठीक तरह से
विचरे हैं मनपाखी अपने आकाशों में

कंधे भले गैर के हों पर
अरथी पर अपनी सो लेना
कहाँ सरल है ?


कभी नहीं थे ऐसे संकट पहचानों के
मेजबान के चेहरे लगते मेहमानों से
सुगढ़ शख्सियत के माने कुछ और हो गए
पशुओं से हो गए मूल्य कम इंसानों के

गैरों की क्या बात करें हम
कंधों सिर अपना ढो लेना
कहाँ सरल है ?


घुन-सी जहाँ लगी हों चिंताएँ होने की
धरती फाड़ भविष्यों को क्रमशः बोने की
बना रहे क्रम यस जीवन का इसीलिए बस
करनी होगी पहल शादियों की, गौने की

भले न हों हम शहंशाह
अंतस में लेकिन अपने भी
ताजमहल है।

[ आजकल दिसम्बर 1998 से साभार ]

Saturday, December 24, 2011

बंटवारा कर दो ठाकुर

-महेश अनघ

बंटवारा कर दो ठाकुर।
तन मालिक का
धन सरकारी
मेरे हिस्से परमेसुर

शहर धुंए के नाम चढ़ाओ
सड़कें दे दो झंडों को
पर्वत कूटनीति को अर्पित
तीरथ दे दो पंडों को
खीर खांड ख़ैराती खाते
हमको गौमाता के खुर


सब छुट्टी के दिन साहब के

सब उपास चपरासी के
उसमें पदक कुंअर जू के हैं
खून पसीने घासी के
अजर अमर श्रीमान उठा लें
हमको छोड़े क्षण भंगुर

पंच बुला कर करो फ़ैसला
चौड़े चौक उजाले में
त्याग तपस्या इस पाले में
राजभोग उस पाले में
दीदे फाड़-फाड़ सब देखें
हम देखेंगे टुकुर-टुकुर

Thursday, December 22, 2011

साँझ के बादल

धर्मवीर भारती
[ 25-12-1926 - 04-09-1997 ]
-धर्मवीर भारती

ये अनजान नदी की नावें
जादू के-से पाल
उड़ातीं आतीं मंथर चाल

नीलम पर
किरनों की साँझी
एक न डोरी
एक न माँझी
फिर भी
लाद निरंतर लातीं
सेंदुर और प्रवाल

कुछ समीप की
कुछ सुदूर की
कुछ चंदन की
कुछ कपूर की
कुछ में गेरू
कुछ में रेशम
कुछ में केवल जाल

Saturday, December 17, 2011

तू मन अनमना न कर अपना




भारत भूषण
[ ८ जुलाई १९२९ - १७ दिसम्बर २०११ ]
  -भारत भूषण
तू मन अनमना न कर अपना
इसमें कुछ
दोष नहीं तेरा
धरती के
कागज पर मेरी
तस्वीर अधूरी रहनी थी
शायद मैंने गत जनमों में
अधबने नीड़ तोड़े होंगे
चातक का स्वर
सुनने वाले बादल
वापस मोड़े होंगे
ऐसा अपराध हुआ होगा
जिसकी फिर
क्षमा नहीं मिलती
तितली के पर नोंचे होंगे
हिरनो के दृग फोड़े होंगे
अनगिनती कर्ज चुकाने थे
इसलिए जिन्दगी भर
मेरे तन को
बेचैन भटकना था
मन में
कस्तूरी रहनी थी।
----------------
[सुप्रसिद्ध गीतकार भारत भूषण ने शनिवार १७ दिसम्बर २०११ को दिन के ३ बजकर ५० मिनट पर इस संसार को हमेशा के लिए छोड़ दिया। नवगीत परिवार की ओर से विनम्र श्रद्धाजंलि। ]

Tuesday, December 06, 2011

कुटी चली परदेश कमाने

-शीलेन्द्र कुमार सिंह चौहान

कुटी चली परदेश कमाने
घर के बैल बिकाने
चमक दमक में भूल गई है
अपने ताने बाने


राड बल्ब के आगे फीके
दीपक के उजियारे
काट रहे हैं फुटपाथों पर
अपने दिन बेचारे
कोलतार सड़कों पर चिड़िया
ढूँढ़ रही है दाने


एक एक रोटी के बदले
सौ सौ धक्के खाये
किन्तु सुबह के भूले पंछी
लौट नहीं घर आये
काली तुलसी कैक्टस दल के
बैठी है पैताने


गोदामों के लिए बहाया
अपना खून पसीना
तन पर चमड़ी बची न बाकी
ऐसा भी क्या जीना
छाँव बरगदी राजनगर में
आई गाँव बसाने