Friday, January 12, 2018

तुम अभी कुछ देर ठहरो

मैं धरातल पर घड़ी भर पाँव धरना चाहता हूँ
कल्पनाओं  !
तुम अभी कुछ देर ठहरो 

मैं बहुत ही थक गया हूँ
दूर से मुझको अकेले लौटकर आना पड़ा है
मैं जिधर से जा चुका था
क्या बताऊँ क्यों मुझे फिर से उधर आना पड़ा है
कुछ समय तक मैं स्वयं से बात करना चाहता हूँ
व्यस्तताओं !
तुम अभी कुछ देर ठहरो 

मैं जिन्हें अपना चुका था
आज मैं यह जान पाया वे नहीं मेरे हुए हैं
जो दबे थे खो चुके थे
वे अभाषित प्रश्न मुझको आज तक घेरे हुए हैं
रिक्तियों को मैं किसी भी भाँति भरना चाहता हूँ
वर्जनाओं !
तुम अभी कुछ देर ठहरो 

मैं अटल कर्त्तव्य पथ पर
छोड़कर फिर आ गया हूँ अनमने अधिकार सारे
मौन मुझको रुच रहा है
अब नहीं सुनने कभी भी प्रश्न या उत्तर तुम्हारे
पत्थरों के बीच से अब मैं गुज़रना चाहता हूँ
देवताओं !
तुम अभी कुछ देर ठहरो 

- ज्ञान प्रकाश आकुल

Sunday, December 24, 2017

बाजीगर बन गई व्यवस्था

बाजीगर बन गई व्यवस्था
हम सब हुए जमूरे
सपने कैसे होंगे पूरे

चार कदम भर चल पाये थे
पैर लगे थर्राने
क्लान्त प्रगति की निरख
विवशता छाया लगी चिढ़ाने
मन के आहत मृगछौने ने
बीते दिवस विसूरे
सपने कैसे......................

हमने निज हाथों से युग
पतवार जिन्हें पकड़ाई
वे शोषक हो गए हुए
हम चिर शोषित तरुणाई
'शोषण' दुर्ग हुआ अलवत्ता
तोड़ो जीर्ण कंगूरे
सपने कैसे.........................

वे तो हैं स्वच्छन्द,
करेंगे जो मन में आएगा
सूरज को गाली देंगे
कोई क्या कर पाएगा
दोष व्यक्ति का नहीं,
व्यवस्था में छल छिद्र घनेरे
सपने कैसे.............................

बदल गए आदर्श,
आचरण की बदली परिभाषा
चोर–लुटेरे हुए घनेरे
यह अभिशप्त निराशा
बदले युग के वर्तमान को कैसे मैं बदलूं रे
सपने कैसे.................................

-डा० जगदीश व्योम

Saturday, December 23, 2017

कबन्धों की बात

इस शहर में
आदमी के नाम पर अक्सर
बात होती है कबन्धों की

पूर्णता सपना हुई
सच है अधूरापन
है सभी के हाथ में
टूटा हुआ दर्पन
दिन दहाड़े
काँच घर पर फेंकती पत्थर
जा रही है भीड़ अंधों की

आग से फिर खेलते हैं
खेल मृग छौने
पर्वतों को जेब में रख
घूमते बौने
बर्फ था जो
खौलता है खून का सागर
घुट रही है दम सुगंधों की

शोर में अब कौन किसकी
यहाँ सुनता है
एक बिरवा मरुस्थल में
शीश धुनता है
आँधियों में
उड़ रही है रेशमी चादर
अरथियों से झुके कन्धों की।

-देवेन्द्र शर्मा इन्द्र
(आजकल, अगस्त-1993)

Tuesday, December 19, 2017

राजधानी की नदी हूँ

राजधानी की नदी हूँ
साँवला था तन मगर
मनमोहिनी थी
कल्पनाओं की तरह
ही सोहिनी थी
अब न जाने कौन सा
रँग हो गया है
बाँकपन जाने कहाँ पर
खो गया है
देह से अंतःकरण तक
आधुनिकता से लदी हूँ

पांडु रोगी हो गये
संकल्प सारे
सोच में डूबे दिखे
भीषम किनारे
काल सीपी ने चुराये
धवल मोती
दर्द की उठतीं हिलोरें
मन भिगोती
कौरवों के जाल-जकड़ी
बेसहारा द्रौपदी हूँ

दौड़ती रुकती न दिल्ली
बात करती
रोग पीड़ित धार जल की
साँस भरती
लहरियों पर नाव अब
दिखती न चलती
कुमुदनी कोई नहीँ
खिलती मचलती
न्याय मंदिर में भटकती
अनसुनी सी त्रासदी हूँ

कालिया था एक वो
मारा गया था
दुष्टता के बाद भी
तारा गया था
कौन आयेगा यहाँ
बंसी बजाने
कालिया कुल कॊ पुनः
जड़ से मिटाने
आस का दीपक जलाये
टिमटिमाती सी सदी हूँ

-कल्पना मनोरमा

फिर आई सरकार नई

फिर आई सरकार नई
फिर नए मिलेंगे आश्वासन
फिर स्वागत में स्वर्ण मृगों के
नाचो बेटा रामलखन !

उनके आने पर झूमे थे
इनके आने पर झूमो
इनकी उनकी लिए पालकी
गाँव गली घर घर घूमो
उनकी गर्दन की रस्सी से
नपवाओ अपनी गर्दन !

करो न चिंता भूख तुम्हारी
आँतें अगर मरोड़ रही
बदहाली यदि जनम जनम का
नाता तुमसे जोड़ रही
ढको आँकड़ों से अपना तन
पेट भरो पीकर भाषन !

खून तुम्हारा पीते रहने को
फिर नए जतन होंगे
लोकतंत्र की हाँफ रही धरती पर
उनके फन होंगे
राजतिलक है उनके हिस्से
भाग तुम्हारे सियाहरन !


-जय चक्रवर्ती

Sunday, October 01, 2017

रामलीला हो चुकी है


रामलीला हो चुकी है
दर्शकों के दल घरों में खो गये

और पात्रों ने उतारे
मुकुट, बंदर के मुखौटे
काम जिनके पास था तो
काम पर वे लोग लौटे
धो लिया चेहरा ज़रा सा
राक्षस सब आदमी से हो गये

उड़ गयी रंगत गुलाबी
खुल गया फिर रंग भूरा
फिर ग़रीबी मुस्करायी
दिक्कतों ने खूब घूरा
लौटने का मन नहीं था
पर ज़रूरत ने बुलाया तो गये

क्या विजेता क्या पराजित
मंच के नीचे खड़े हैं
धनुष,रावण के खडग सब
एक झोले में पड़े हैं
आँख में आंसू भरे हैं
राम रावण फिर दरी पर सो गये

-ज्ञान प्रकाश आकुल

Saturday, September 09, 2017

माँ


जब गया मैं घर
अचानक याद आई माँ

याद आई
एक सरिता
दौड़ती अविराम
याद आई
क्ल्पवृक्षी
एक शीतल छाँव
टूटता छप्पर
अचानक याद आई माँ

याद आई
एक भाषा
लाड़ से भरपूर
याद आई
एक दृष्टि
वृष्टि से मजबूर
काँपते अक्षर
अचानक याद आई माँ

याद आई
एक ममता
फूल में मकरंद
याद आई
एक घाटी
तीर्थों के संग
मन हुआ निर्झर
अचानक याद आई माँ

-डा० अश्वघोष
9897700267

Saturday, May 20, 2017

हे चिर अव्यय ! हे चिर नूतन !


(पृकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत जी के जन्मदिवस पर)


कण–कण तृण–तृण में
चिर निवसित
हे ! रजत किरन के अनुयायी
सुकुमार पकृति के उद्घोषक
जीवंत तुम्हारी कवितायी
फूलों के मिस शत वार नमन
स्वीकारो संसृति के सावन
हे चिर अव्यय !
हे चिर नतून !!

बौछारें धारें जब आतीं
लगता है तुम नभ से उतरे
चाँदनी नहीं है पत्तों पर
चहुँ ओर तम्हीं तो हो बिखरे
तारापथ के अनुगामी का
कर रही धरा है मूक नमन
हे चिर अव्यय !
हे चिर नतून !!

सुकुमार वदन’ सुकुमार नयन
कौसानी की सुकुमार धूप
पूरा युग जिसमें संदर्शित
ऐसे कवि के तुम मूर्तरूप
हैं व्योम, पवन अब खड़े, लिये
कर में अभिनन्दन पत्र नमन
हे चिर अव्यय !
हे चिर नतून !!

-डा० जगदीश व्योम

Monday, May 15, 2017

फिर बज उठे हवा के नूपुर

फिर बज उठे हवा के नूपुर
फूलों के, भौंरों के चर्चे
खुले आम आँगन-गलियारे
बँटने लगे धूल के पर्चे

जाने क्या कह दिया दरद ने
रह-रह लगे बाँस वन बजने
पीले पड़े फसल के चेहरे
वृक्ष धरा पर लगे उतरने
पुरवा लगी तोड़ने तन को
धारहीन पछुआ के बरछे

बैर भाँजने हमसे, तुमसे
मन हारेगा फिर मौसम से
निपटे नहीं हिसाब पुराने
तन, रस, रूप, अधर, संयम से
फूलों से बच भी जाएं तो
गंधों के तेवर हैं तिरछे।

-विनोद निगम

Thursday, March 02, 2017

आओ बैठो पास कबीर

आओ बैठो पास कबीर
हम दोनों की एक लकीर

तुम अँधियारा दूर भगाते
हम गीतों की जोत जलाते
दोनों साधे रहते मन में
अपने आँसू-जग की पीर

तन माटी का, जगत कांच का
फिर भी झगड़ा तीन–पाँच का
मन जोगी तो, लगे एक से
राख मलें या मलें अबीर

तुमने धूप चदरिया तानी
हमने इन गीतों की बानी
सूरज ओढ़ा दोनों ने ही
हम राही तुम आलमगीर

मृगजल के सारे घर रीते
कुछ तो होता, जो हम पीते
हम दोनों की पीर एक सी
देखो कभी कलेजा चीर

आओ बैठो पास कबीर
हम दोनों की एक लकीर

-राजकुमारी रश्मि