Friday, July 29, 2016

मुस्कान लीले नाग

उठ रहे दंगे-धुएँ हैं
नून-रोटी साग पर
हो गया
चलना जरुरी
आग फैली आग पर

पीर की अनुभूतियाँ भी
शब्द पाकर बोलती हैं
खीर टेढ़ी हो
भले, पर तह
परत को खोलती हैं
तिलमिलाये भाव लेकर
रागिनी है राग पर

रोटियाँ, घर, द्वार, कपड़े
दाँव में खुद को लगाकर
फिर मुसीबत
झेलने को
पग धरे आगे बढाकर
मंत्र जागे पढ़ रहा
मुस्कान लीले नाग पर


-रामकिशोर दाहिया

Friday, June 24, 2016

ओ चिड़िया

-जयप्रकाश श्रीवास्तव

ओ चिड़िया
आंगन मत झांकना
दानों का हो गया अकाल

धूप के लिबासों में
झुलस रही छांव
सूरज की हठधर्मी
ताप रहा गांव
ओ चिड़िया
दिया नहीं बालना
बेच रहे रोशनी दलाल।

मेड़ के मचानों पर
ठिठुरती सदी
व्यवस्थाओं की मारी
सूखती नदी
ओ चिड़िया
तटों को न लांघना
धार खड़े करेगी सवाल।

अपनेपन का जंगल
रिश्तों के ठूंठ
अपने अपनों पर ही
चला रहे मूंठ
ओ चिड़िया
सिर जरा संभालना
लोग रहे पगड़ियां उछाल।
         
-जयप्रकाश श्रीवास्तव 

नहीं मील का पत्थर कोई

-संध्या सिंह

कितनी दूर चले हैं जाने
कैसे जीवन पथ पहचाने
नहीं मील का पत्थर कोई
दिखा सफ़र में गड़ा हुआ

खुशियाँ जंग लगे बक्से में
बंद पोटली के भीतर
ताले लगे विवशताओं के
मुस्कानो पर कड़ी नज़र
सपना चारदीवारी भीतर
पंजो के बल खडा हुआ

दंड मिला तितली को वन में
फूल फूल मंडराने पर
हवा स्वयं ही चुगली करती
शाखों के लहराने पर
पाबंदी के तंग शहर में
जंगल का मृग बड़ा हुआ

परिवर्तन ने पंख दे दिए
पर रस्मों ने डोर कसी
घर–बाहर के बीच जंग हैं
दरवाजे में देह फँसी
बहती गयी उमर नदिया-सी
मन जिद्दी-सा अड़ा हुआ

-संध्या सिंह

Thursday, March 24, 2016

विडम्बना

 -संध्या सिंह
गहन उदासी के आँगन को
उत्सव दिखना था
बालू के पन्ने पर हमको
दरिया लिखना था

पथरीला सच पाँव तले था
मिट्टी के सपने सर पर
द्वेष ईर्ष्या के गड्ढों से
भरसक चले सदा बच कर
मगर जहाँ पर मिली ढलाने
रस्ता चिकना था

पंखों की सब रद्द उड़ाने
कुहरे का परिवेश मिला
बूंदों को काजल की हद में
रहने का आदेश मिला
घूम-घूम कर एक नोक पर  
लट्टू टिकना था

-संध्या सिंह

ये कैसे बंटवारे गम के

-संध्या सिंह
घाव दर्द मुस्कान ठहाके
मिले धरा पर बिना नियम के
कैसी ये तकसीम सुखों की
कैसे ये बंटवारे गम के

कहीं अमीरी के बक्से में
सोना सोना ख़्वाब धरे हैं
कहीं फटी किस्मत का पल्लू
सिक्का सिक्का स्वप्न मरे हैं  

जहां किश्त पर नींद मिली हो
वहीं फिक्र के डाकू धमके
कैसी ये तकसीम सुखों की
कैसे ये बंटवारे गम के

कहीं कुतर्कों से ‘आज़ादी‘
रोज़ नयी परिभाषा लाती
कहीं रिवाजों के पिंजरे में
चिड़िया पंख लिये मर जाती

जहाँ भूख से आँत ऐंठती
वहीं पहाड़े हैं संयम के
ये कैसी तकसीम सुखों की
ये कैसे बंटवारे गम के

जहाँ लबालब नदिया बहती
वहीं बरसते बादल आ कर
जहाँ धरा की सूखी छाती
धूप बैठती पाँव जमा कर

जहाँ थकी हो प्यास रेत में
वहीं भरम का पानी चमके
कैसी ये तकसीम सुखों की
कैसे ये बंटवारे गम के

-संध्या सिंह

Wednesday, March 02, 2016

धधकी आग तबाही

-रामकिशोर दाहिया

ठोंके निर्मम खुराफात की
सिर पर गहरी कील
खारा पानी लेकर आईं
आँखों वाली झील

ज़हर उतारा गया हमारे
पुनः कण्ठ के नीचे
नील पड़े सच डर के मारे
खड़े झूठ के पीछे
लौट रही बारूद जेल से
धरे हाथ कंदील

ऐसा जुल्म छद्म के हाथों
करते रोज़ नया
खेले खेल नज़र से देखे
सहमी हुई बया
नागनाथ से सांप छुड़ाने
झपटी फिर से चील

उभरे हुये सुराग पकड़कर
देने चला गवाही
नहीं बुझेगी भीतर बाहर
धधकी आग तबाही
मैंने उखड़े पाँव जमाये
पत्थर जैसे मील

-रामकिशोर दाहिया

Sunday, February 28, 2016

मजबूरी है

-रामकिशोर दाहिया
मजबूरी है
कविता लिखना
कलम बाँध कर लाठी से

लाठी देख
बँदरिया नाचे
अपना मालिक चीन्हे-जानें
रबर-सरीखे
लक्ष्य अकड़ को
जोर लगाकर खींचे-तानें
दंद-फंद को
बाहर करने
भिड़ा हुआ हूँ कद-काठी से

संवेदन को
जीना होगा
तोड़ रही दम आशा छोटी
शक्ल आदमी की
है लेकिन
खून पिये औ' छीने रोटी
सुअर खाल पर
शब्द व्यंजना
ताकतवर हो तन माटी से

दूध-मलाई
मक्खन खाते, जिसकी
लाठी भैंस उसी की
फ़कत सिपाही
रहे कलम के, किये
नहीं कम पीर किसी की
बेहतर अलग
हो जाना चाहूँ
निर्बल की परपाटी से
     
-रामकिशोर दाहिया

रस की रीत लिखे

-रामकिशोर दाहिया

बिंदिया, कँगना,
पायल, बिछुआ,
प्रणय अतीत लिखे
फूलों की पंखुरियों पर
फागुन ने गीत लिखे

रंगों की मादकता उस पर
छन्दों के अनुबन्ध
कहने को आतुर हैं
अपने-अपनों के सम्बंध
पत्र-प्रेयसी को चोरी से
ज्यों मनमीत लिखे

भौंरों की अनुगूँज फूल के
कानों में अनुप्रास
भीतर-भीतर लगा कसकने
मदिराया मधुमास
मन-आँगन की
चंचल तितली
रस की रीत लिखे

सेमल, साल,
पलाश वनों में
भर सिन्दूर नहाते
महुवाए रतजगे बेचारे
भीम पलासी गाते
अलगोजे की तान पुरानी
परिणय-प्रीत लिखे
       
-रामकिशोर दाहिया

हद में ही पाँवों को मोड़ना

-अनिरुद्ध नीरव
हांफ-हांफ जाता हूँ
चार पंक्ति जोड़कर
जैसे चट्टान कोई तोड़कर

अपनी झीनी बीनी ओढ़ना
हद में ही पाँवों को मोड़ना
संख्यायें ऋण चिह्नों पर खड़ीं
सबको संचित धन-जोड़ना
स्वेद-स्वेद होता हूँ
स्वप्न को निचोड़ कर
जैसे चट्टान कोई तोड़कर

ध्वंसों की नदियों में वेग है
वेगों में पागल उद्वेग है
पागल उद्वेगों की हर लहर
कोई बरछी कोई तेग है
युद्ध-युद्ध होता हूँ
एक धार मोड़कर
जैसे चट्टान कोई तोड़कर

हर अंतर्वस्तु तार-तार क्यों
मिलकर मुर्दों का बाजार क्यों
गढ़ते है जो शब्दों की चिता
मरघट को कहते गुलजार क्यों
काँप-काँप जाता हूँ
एक शव झिंझोड़कर
जैसे चट्टान कोई तोड़कर
         
 -अनिरुद्ध नीरव
[पुनर्नवा विशेषांक 2016 से]

Wednesday, February 03, 2016

साँस भी जर्जर

- डा० मालिनी गौतम
अब नहीं झरते
कलम से प्रेम के आखर

हर सुबह खटपट पुरानी
घाव-सी रिसती जवानी
नून, लकडी, तेल में ही
साँस की अटकी रवानी
छौंक में उड़ते-बिखरते
भावना के पर

लय कहीं ठिठकी हुई है
राह फिर भटकी हुई है
सफर में दलदल उगे हैं
चाल फिर अटकी हुई है
सर्द सन्नाटे हुए
क्या ताल क्या तरुवर

एक बालक-सी हठीली
धूसरित कुछ, कुछ सजीली
सीढ़ियों पर चढ़ रही है
उम्र सीली हो कि गीली
हो रही है आस बेशक
रेत-सी झर-झर

-डा० मालिनी गौतम