Wednesday, July 18, 2018

पाँव जले छाँव के

हम ठहरे गाँव के
लाल हुए धूप में
पाँव जले छाँव के
हम ठहरे गाँव के

हींसे में भूख-प्यास
लिये हुए मरी आस
भटक रहे जन्म से
न कोई आसपास
नदी रही और की
लट्ठ हुए नाव के
हम ठहरे गाँव के

पानी बिन कूप हुए
दुविधा के भूप हुए
छाँट रही गृहणी भी
इतना विद्रूप हुए
टिके हुए आश में
हाथ लगे दाँव के
हम ठहरे गाँव के

याचना के द्वार थे
सामने त्यौहार थे
जहाँ भी उम्मीद थी
लोग तार-तार थे
हार नहीं मानें हम
आदमी तनाव के
हम ठहरे गाँव के

-रामकिशोर दाहिया
कटनी [म.प्र.]

Saturday, July 14, 2018

अभी न होगा मेरा अन्त

अभी न होगा मेरा अन्त
अभी-अभी ही तो आया है
मेरे वन में मृदुल वसन्त-
अभी न होगा मेरा अन्त

हरे-हरे ये पात,
डालियाँ, कलियाँ कोमल गात

मैं ही अपना स्वप्न-मृदुल-कर
फेरूँगा निद्रित कलियों पर
जगा एक प्रत्यूष मनोहर
पुष्प-पुष्प से तन्द्रालस
लालसा खींच लूँगा मैं,
अपने नवजीवन का अमृत
सहर्ष सींच दूँगा मैं
द्वार दिखा दूँगा फिर उनको
हैं मेरे वे जहाँ अनन्त-
अभी न होगा मेरा अन्त

मेरे जीवन का यह है
जब प्रथम चरण
इसमें कहाँ मृत्यु ?
है जीवन ही जीवन
अभी पड़ा है आगे
सारा यौवन
स्वर्ण-किरण कल्लोलों पर
बहता रे, बालक-मन
मेरे ही अविकसित राग से
विकसित होगा बन्धु
दिगन्त
अभी न होगा मेरा अन्त

-सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

Tuesday, July 03, 2018

सुनो सभासद

सुनो सभासद
हम केवल
विलाप सुनते हैं
तुम कैसे सुनते हो अनहद

पहरा वैसे
बहुत कड़ा है
देश किन्तु अवसन्न पड़ा है

खत्म नहीं
हो पाई अब तक
मन्दिर से मुर्दों की आमद

आवाजों से
बचती जाए
कानों में है रुई लगाए

दिन-पर-दिन है
बहरी होती जाती
यह बड़ बोली संसद

बौने शब्दों के
आश्वासन
और दुःखी कर जाते हैं मन

उतना छोटा
काम कर रहा
जिसका है जितना ऊँचा कद
                 

-माहेश्वर तिवारी

हम कठपुतली रहे समय के

हाँ, जीवन-भर
हम कठपुतली रहे समय के

हमने देखे
किसिम-किसिम के
स्वाँग हाट के
बाँचे मंतर
दरवाज़े पर लिखे लाट के

उनके रहते
सुन न सके हम
गान हृदय के

राजाओं के हर खेले में
हम शामिल थे
क़त्ल हुए हम कभी 
कभी हम ही क़ातिल थे

नारे बने
ख़ुशी से हम
शाहों की जय के

गिरवी रखकर
पुरखों की थाती हम लाये
सुख-सुविधाएँ
और हुए युग के चौपाये

भूल गये हम
जो सपने थे
सूर्योदय के

-कुमार रवीन्द्र

Saturday, June 30, 2018

याद तुम्हारी

याद तुम्हारी जैसे कोई
कंचन-कलश भरे
जैसे कोई किरन अकेली
पर्वत पार करे।

लौट रही गायों के
संग-संग
याद तुम्हारी आती
और धूल के
संग-संग
मेरे माथे को छू जाती
दर्पण में अपनी ही छाया-सी
रह-रह उभरे
जैसे कोई हंस अकेला
आंगन में उतरे।

जब इकला कपोत का
जोड़ा
कंगनी पर आ जाए
दूर चिनारों के
वन से
कोई वंशी स्वर आए
सो जाता सूखी टहनी पर
अपने अधर धरे
लगता जैसे रीते घट से
कोई प्यास हरे।

-माहेश्वर तिवारी

घर जैसे

घर न रह गए
अब, घर जैसे
जीवन के हरियालेपन पर
उग आए हों
बंजर जैसे ।

रिश्तों की
कोमल रचनाएँ
हमको अधिक
उदास बनाएँ

दादी वाली
किस्सागोई
शापग्रस्त है
पत्थर जैसे ।

बाहर हँसते
भीतर रोते
नींद उचटती
सोते-सोते

शब्द बने परिवार
टूटकर
बिखर रहे हैं
अक्षर जैसे ।

-माहेश्वर तिवारी

खुद से खुद की बातें

खुद से खुद की
बतियाहट
हम, लगता भूल गए ।

डूब गए हैं
हम सब इतने
दृश्य कथाओं में
स्वर कोई भी
बचा नहीं है
शेष, हवाओं में

भीतर के जल की
आहट
हम, लगता भूल गए ।

रिश्तों वाली
पारदर्शिता लगे
कबंधों-सी
शामें लगती हैं
थकान से टूटे
कंधों-सी

संवादों की
गरमाहट
हम, लगता भूल गए ।


-माहेश्वर तिवारी 

Sunday, June 24, 2018

गंगा मइया

गंगोत्री में पलना झूले
आगे चले बकइयाँ
भागीरथी घुटुरवन डोले
शैल-शिखर की छइयाँ
                       
छिन छिपती
छिन हौले किलके
छिन ता-झाँ वह बोले
अरबराय के गोड़ी काढ़े
ठमकत-ठमकत डोले                                 
घाटी-घाटी दही-दही कर
चहके सोनचिरैया
पाँवों पर पहुड़ाकर परबत
गाये खंता-खैयाँ   

पट्टी पूज रही है
वरणाव्रत की परिक्रमा कर
बालों में रूमाल फेन का
दौड़े गाये हर हर
चढ़ती उमर चौंकड़ी भरती
छूट गई लरिकइयाँ
भली लगे मुग्धा को
अपनी ही प्यारी परछइयाँ 

दिन-दिन अँगिया छोटी पड़ती
गदराये तरुणाई
पोर-पोर चटखे मादकता
लहराये अँगड़ाई
दोनों तट प्रियतम शान्तनु की
फेर रहीं दो बहियाँ
छूट गया मायका बर्फ का
बाबुल की अँगनइयाँ                   

भूखा कहीं देवव्रत टेरे
दूध भरी है छाती
दौड़ पड़ी ममता की मारी
तजकर सँग-संघाती
गंगा नित्य रँभाती
फिरती जैसे कपिला गइया
सारा देश क्षुधातुर बेटा
वत्सल गंगा मइया' 

-उमाकान्त मालवीय

देखेगा कौन

बगिया में नाचेगा मोर
देखेगा कौन ?
तुम बिन ओ मेरे चितचोर
देखेगा कौन ?

नदिया का यह नीला जल
रेतीला घाट
झाऊ की झुरमुट के बीच
यह सूनी बाट
रह-रह कर उठती हिलकोर
देखेगा कौन ?
आँखड़ियों से झरते लोर
देखेगा कौन ?

बौने ढाकों का यह वन
लपटों के फूल
पगडंडी के उठते पाँव
रोकते बबूल
बौराये आमों की ओर
देखेगा कौन ?
पाथर-सा ले हिया कठोर
देखेगा कौन ?

नाचती हुई फुल-सुंघनी
बनतीतर शोख
घास पर सोन-चिरैया
डाल पर महोख
मैना की यह पतली ठोर
देखेगा कौन ?
कलंगी वाले ये कठफोर
देखेगा कौन ?

आसमान की ऐंठन-सी
धुएँ की लकीर
ओर-छोर नापती हुई
जलती शहतीर
छू-छूकर सांझ और भोर
देखेगा कौन ?
दुखती यह देह पोर-पोर
देखेगा कौन ?

-शम्भुनाथ सिंह

एक नेह का सोता भीतर

नदीधार ने
कुछ हिरदय ने
हमें बनाया बहता पानी

बरसों पहले
हम जनमे थे नदी किनारे
सुरज देवता तब रहते थे
घर के द्वारे

रहो सहज ही -
बहते जल से
यही सीख हमने है जानी

अम्मा ने था कहा -
नदी है तारनहारी
चाहे कुछ हो
कभी नहीं होती वह खारी

झुर्री-झुर्री हुई
साँस में
बसी हुई माँ की वह बानी

एक नेह का सोता भीतर
देता साखी
बहते जल ने ही
मानुष की पत है राखी

पिछले दिनों
नदी को देखा-
नहीं लगी जानी-पहचानी

-कुमार रवीन्द्र

Saturday, June 16, 2018

कहो कबीरा

ठंड लगी है, सिकुड़ रहे हो
कहो कबीरा ! चादर दूँ ?
मन की पीर नही ले सकता
तन के हित क्या लाकर दूँ ?

मेरी चादर कुछ मैली है
थोडा सा सह लोगे क्या ?
अभी भोर में बहुत देर है
अपनाकर रह लोगे क्या ?

तुमसे एक जुलाहे तुम ही,
तुमको क्या बनवाकर दूँ ?

काशी में कबीर हो जाना
आज शिष्ट व्यवहार नही,
और नगर ये उलटबांसियां
सहने को तैयार नही।

सुनो कबीरा ! वहाँ न जाना
धूनी यही रमाकर दूँ ?

हो सकता है समय लगे
"मगहर" होने में काशी को,
कबिरा से अल्हड फ़कीर का
घर होने में काशी को ।

बोलो तुम्हें कहाँ से सुख दूँ,
कहो कौनसा आदर दूँ ?

दुनिया की हालत है जैसे
धुनी रुई के फाहे की,
मगर उसे भी फिक्र नहीं है
वो भी एक जुलाहे की ?

जटिल पहेली पूछी साधो !
मैं कैसे सुलझाकर दूँ ?

-चित्रांश वाघमारे

Friday, June 15, 2018

मथुरा का पथ

मथुरा का पथ
सुनो, यहीं से से होकर जाता

आते-जाते हैं हरकारे रोज़ इधर से
डरते-डरते लोग निकलते अपने घर से
राजा का
साधो, परजा से झूठा नाता

हाँका पड़ा नदी पर - शाही बजरे आये
राजा जी के विरुद गये घर-घर में गाये
अब भी
पगला सूर किशनजी के गुण गाता

वंशी चुप है - धर्मक्षेत्र में बिगुल बज रहा
नदी पूछती - क्यों परजा का लहू है बहा
बोधगया में
बिलख रही क्यों, बंधु, सुजाता

-कुमार रवीन्द्र

Thursday, June 14, 2018

ओ वासंती पवन हमारे घर आना

बहुत दिनों के बाद खिड़कियाँ खोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना

जड़े हुए थे ताले सारे कमरों में
धूल भरे थे आले सारे कमरों में
उलझन और तनावों के रेशों वाले
पुरे हुए थे जले सारे कमरों में
बहुत दिनों के बाद साँकलें डोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना

एक थकन-सी थी नव भाव तरंगों में
मौन उदासी थी वाचाल उमंगों में
लेकिन आज समर्पण की भाषा वाले
मोहक-मोहक, प्यारे-प्यारे रंगों में
बहुत दिनों के बाद ख़ुशबुएँ घोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना

पतझर ही पतझर था मन के मधुबन में
गहरा सन्नाटा-सा था अंतर्मन में
लेकिन अब गीतों की स्वच्छ मुंडेरी पर
चिंतन की छत पर, भावों के आँगन में
बहुत दिनों के बाद चिरैया बोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना

-कुँअर बेचैन

तुम अभी कुछ देर ठहरो

मैं धरातल पर घड़ी भर
पाँव धरना चाहता हूँ
कल्पनाओं !
तुम अभी कुछ देर ठहरो

मैं बहुत ही थक गया हूँ
दूर से मुझको अकेले
लौटकर आना पड़ा है
मैं जिधर से जा चुका था
क्या बताऊँ क्यों मुझे फिर से
उधर आना पड़ा है
कुछ समय तक मैं
स्वयं से बात करना चाहता हूँ
व्यस्तताओं !
तुम अभी कुछ देर ठहरो

मैं जिन्हें अपना चुका था
आज मैं यह जान पाया
वे नहीं मेरे हुए हैं
जो दबे थे खो चुके थे
वे अभाषित प्रश्न मुझको
आज तक घेरे हुए हैं
रिक्तियों को मैं
किसी भी भाँति भरना चाहता हूँ
वर्जनाओं !
तुम अभी कुछ देर ठहरो

मैं अटल कर्त्तव्य पथ पर
छोड़कर फिर आ गया हूँ
अनमने अधिकार सारे
मौन मुझको रुच रहा है
अब नहीं सुनने कभी भी
प्रश्न या उत्तर तुम्हारे
पत्थरों के बीच से अब
मैं गुज़रना चाहता हूँ
देवताओं !
तुम अभी कुछ देर ठहरो

-ज्ञान प्रकाश आकुल

पुरवा जो डोल गई

 पुरवा जो डोल गई
घटा घटा आँगन में
जूड़े से खोल गई
बूँदों का लहरा दीवारों को
चूम गया
मेरा मन सावन की गलियों में झूम गया
श्याम रंग परियों से अम्बर है
घिरा हुआ
घर को फिर लौट चला बरसों का फिरा हुआ
मइया के मन्दिर में
अम्मा की मानी हुई
डुग-डुग-डुग-डुग बधइया
फिर बोल गई

बरगद की जड़ें पकड़
चरवाहे झूल रहे
बिरहा की तानों में बिरहा
सब भूल रहे
अगली सहालक तक व्याहों
की बात टली
बात बड़ी छोटी पर बहुतों को
बहुत खली
नीम तले चौरा पर
मीरा की गुड़िया के
व्याह वाली चर्चा
रस घोल गई

खनक चूडियों की सुना
मेहँदी की पातों ने
कलियों पे रंग फेरा मालिन
की बातों ने
धानो के खेतों में
गीतों का पहरा है
चिड़ियों की आँखों में
ममता का सेहरा है
नदिया से उमक उमक
मछली वो छमक छमक
पानी की चूनर को
दुनिया से मोल गई

झूले के झूमक हैं
शाखा के कानों में
शबनम की फिसलन है
केले की रानों में
ज्वार और अरहर की
हरी हरी सारी है
सनई के फूलों की
गोटा किनारी है
गाँवो की रौनक
है मेहनत की बाँहों में
धोबिन भी पाटे पर
हइया छू बोल गई
पुरवा जो डोल गई

-डा० शिव बहादुर सिंह भदौरिया

Sunday, December 24, 2017

बाजीगर बन गई व्यवस्था

बाजीगर बन गई व्यवस्था
हम सब हुए जमूरे
सपने कैसे होंगे पूरे

चार कदम भर चल पाये थे
पैर लगे थर्राने
क्लान्त प्रगति की निरख
विवशता छाया लगी चिढ़ाने
मन के आहत मृगछौने ने
बीते दिवस विसूरे
सपने कैसे......................

हमने निज हाथों से युग
पतवार जिन्हें पकड़ाई
वे शोषक हो गए हुए
हम चिर शोषित तरुणाई
'शोषण' दुर्ग हुआ अलवत्ता
तोड़ो जीर्ण कंगूरे
सपने कैसे.........................

वे तो हैं स्वच्छन्द,
करेंगे जो मन में आएगा
सूरज को गाली देंगे
कोई क्या कर पाएगा
दोष व्यक्ति का नहीं,
व्यवस्था में छल छिद्र घनेरे
सपने कैसे.............................

बदल गए आदर्श,
आचरण की बदली परिभाषा
चोर–लुटेरे हुए घनेरे
यह अभिशप्त निराशा
बदले युग के वर्तमान को कैसे मैं बदलूं रे
सपने कैसे.................................

-डा० जगदीश व्योम

Saturday, December 23, 2017

कबन्धों की बात

इस शहर में
आदमी के नाम पर अक्सर
बात होती है कबन्धों की

पूर्णता सपना हुई
सच है अधूरापन
है सभी के हाथ में
टूटा हुआ दर्पन
दिन दहाड़े
काँच घर पर फेंकती पत्थर
जा रही है भीड़ अंधों की

आग से फिर खेलते हैं
खेल मृग छौने
पर्वतों को जेब में रख
घूमते बौने
बर्फ था जो
खौलता है खून का सागर
घुट रही है दम सुगंधों की

शोर में अब कौन किसकी
यहाँ सुनता है
एक बिरवा मरुस्थल में
शीश धुनता है
आँधियों में
उड़ रही है रेशमी चादर
अरथियों से झुके कन्धों की।

-देवेन्द्र शर्मा इन्द्र
(आजकल, अगस्त-1993)

Tuesday, December 19, 2017

राजधानी की नदी हूँ

राजधानी की नदी हूँ
साँवला था तन मगर
मनमोहिनी थी
कल्पनाओं की तरह
ही सोहिनी थी
अब न जाने कौन सा
रँग हो गया है
बाँकपन जाने कहाँ पर
खो गया है
देह से अंतःकरण तक
आधुनिकता से लदी हूँ

पांडु रोगी हो गये
संकल्प सारे
सोच में डूबे दिखे
भीषम किनारे
काल सीपी ने चुराये
धवल मोती
दर्द की उठतीं हिलोरें
मन भिगोती
कौरवों के जाल-जकड़ी
बेसहारा द्रौपदी हूँ

दौड़ती रुकती न दिल्ली
बात करती
रोग पीड़ित धार जल की
साँस भरती
लहरियों पर नाव अब
दिखती न चलती
कुमुदनी कोई नहीँ
खिलती मचलती
न्याय मंदिर में भटकती
अनसुनी सी त्रासदी हूँ

कालिया था एक वो
मारा गया था
दुष्टता के बाद भी
तारा गया था
कौन आयेगा यहाँ
बंसी बजाने
कालिया कुल कॊ पुनः
जड़ से मिटाने
आस का दीपक जलाये
टिमटिमाती सी सदी हूँ

-कल्पना मनोरमा

फिर आई सरकार नई

फिर आई सरकार नई
फिर नए मिलेंगे आश्वासन
फिर स्वागत में स्वर्ण मृगों के
नाचो बेटा रामलखन !

उनके आने पर झूमे थे
इनके आने पर झूमो
इनकी उनकी लिए पालकी
गाँव गली घर घर घूमो
उनकी गर्दन की रस्सी से
नपवाओ अपनी गर्दन !

करो न चिंता भूख तुम्हारी
आँतें अगर मरोड़ रही
बदहाली यदि जनम जनम का
नाता तुमसे जोड़ रही
ढको आँकड़ों से अपना तन
पेट भरो पीकर भाषन !

खून तुम्हारा पीते रहने को
फिर नए जतन होंगे
लोकतंत्र की हाँफ रही धरती पर
उनके फन होंगे
राजतिलक है उनके हिस्से
भाग तुम्हारे सियाहरन !


-जय चक्रवर्ती

Sunday, October 01, 2017

रामलीला हो चुकी है


रामलीला हो चुकी है
दर्शकों के दल घरों में खो गये

और पात्रों ने उतारे
मुकुट, बंदर के मुखौटे
काम जिनके पास था तो
काम पर वे लोग लौटे
धो लिया चेहरा ज़रा सा
राक्षस सब आदमी से हो गये

उड़ गयी रंगत गुलाबी
खुल गया फिर रंग भूरा
फिर ग़रीबी मुस्करायी
दिक्कतों ने खूब घूरा
लौटने का मन नहीं था
पर ज़रूरत ने बुलाया तो गये

क्या विजेता क्या पराजित
मंच के नीचे खड़े हैं
धनुष,रावण के खडग सब
एक झोले में पड़े हैं
आँख में आंसू भरे हैं
राम रावण फिर दरी पर सो गये

-ज्ञान प्रकाश आकुल

Saturday, September 09, 2017

माँ


जब गया मैं घर
अचानक याद आई माँ

याद आई
एक सरिता
दौड़ती अविराम
याद आई
क्ल्पवृक्षी
एक शीतल छाँव
टूटता छप्पर
अचानक याद आई माँ

याद आई
एक भाषा
लाड़ से भरपूर
याद आई
एक दृष्टि
वृष्टि से मजबूर
काँपते अक्षर
अचानक याद आई माँ

याद आई
एक ममता
फूल में मकरंद
याद आई
एक घाटी
तीर्थों के संग
मन हुआ निर्झर
अचानक याद आई माँ

-डा० अश्वघोष
9897700267

Saturday, May 20, 2017

हे चिर अव्यय ! हे चिर नूतन !


(पृकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत जी के जन्मदिवस पर)


कण–कण तृण–तृण में
चिर निवसित
हे ! रजत किरन के अनुयायी
सुकुमार पकृति के उद्घोषक
जीवंत तुम्हारी कवितायी
फूलों के मिस शत वार नमन
स्वीकारो संसृति के सावन
हे चिर अव्यय !
हे चिर नतून !!

बौछारें धारें जब आतीं
लगता है तुम नभ से उतरे
चाँदनी नहीं है पत्तों पर
चहुँ ओर तम्हीं तो हो बिखरे
तारापथ के अनुगामी का
कर रही धरा है मूक नमन
हे चिर अव्यय !
हे चिर नतून !!

सुकुमार वदन’ सुकुमार नयन
कौसानी की सुकुमार धूप
पूरा युग जिसमें संदर्शित
ऐसे कवि के तुम मूर्तरूप
हैं व्योम, पवन अब खड़े, लिये
कर में अभिनन्दन पत्र नमन
हे चिर अव्यय !
हे चिर नतून !!

-डा० जगदीश व्योम

Monday, May 15, 2017

फिर बज उठे हवा के नूपुर

फिर बज उठे हवा के नूपुर
फूलों के, भौंरों के चर्चे
खुले आम आँगन-गलियारे
बँटने लगे धूल के पर्चे

जाने क्या कह दिया दरद ने
रह-रह लगे बाँस वन बजने
पीले पड़े फसल के चेहरे
वृक्ष धरा पर लगे उतरने
पुरवा लगी तोड़ने तन को
धारहीन पछुआ के बरछे

बैर भाँजने हमसे, तुमसे
मन हारेगा फिर मौसम से
निपटे नहीं हिसाब पुराने
तन, रस, रूप, अधर, संयम से
फूलों से बच भी जाएं तो
गंधों के तेवर हैं तिरछे।

-विनोद निगम

Thursday, March 02, 2017

आओ बैठो पास कबीर

आओ बैठो पास कबीर
हम दोनों की एक लकीर

तुम अँधियारा दूर भगाते
हम गीतों की जोत जलाते
दोनों साधे रहते मन में
अपने आँसू-जग की पीर

तन माटी का, जगत कांच का
फिर भी झगड़ा तीन–पाँच का
मन जोगी तो, लगे एक से
राख मलें या मलें अबीर

तुमने धूप चदरिया तानी
हमने इन गीतों की बानी
सूरज ओढ़ा दोनों ने ही
हम राही तुम आलमगीर

मृगजल के सारे घर रीते
कुछ तो होता, जो हम पीते
हम दोनों की पीर एक सी
देखो कभी कलेजा चीर

आओ बैठो पास कबीर
हम दोनों की एक लकीर

-राजकुमारी रश्मि

Sunday, January 29, 2017

सहमा सा गणतंत्र

राजमार्ग पर सुबह सवेरे
यह कैसी शोभायात्रा है
इसमें लगन समर्पण कितना
आडंबर की क्या मात्रा है
पूछ रहा कोने में सिमटा
सहमा सा गणतंत्र !

एक ओर शहनाई वादन
एक ओर बज रहे नगाड़े
मादक धुन,लय ताल, सुरों पर
लोकनृत्य के जमे अखाड़े
उमड़ रही है एक ओर से
सैन्य बलों की प्रबल सुनामी
गर्वोन्नत हो,बड़ी शान से
राजा जी ले रहे सलामी
कौन दे गया वैभवशाली
उत्सव का गुरुमंत्र !

राजपुरुष हैं, शासकगण हैं
प्रजा देखती है विस्मय से
प्रहरीगण पहरा देते हैं
यहाँ न जाने किसके भय से
गण्यमान्य अभिजात वर्ग में
गण का क्या, वह तो नगण्य है
वह उपयोगी वस्तु मात्र है
या फिर कोई जिन्स पण्य है
एक राष्ट् के समारोह में
पलता क्या षड्यंत्र !

यह है कैसी उत्सव लीला
होता यह कैसा प्रचार है
प्रश्नाकुल है व्यग्र आमजन
प्रश्नों की लंबी कतार है
कहाँ गए भोले आश्वासन
कहाँ गया सपना सुराज का
जो वंचित है इस वैभव से
क्या न रहा हिस्सा समाज का
मूल्यों का गुब्बारा फूटा
कहाँ हुआ है रंध्र !
बेसुध पड़ा हुआ जनमानस
कब होगा निस्तंद्र !
पूछ रहा कोने में सिमटा
सहमा-सा गणतंत्र !

- योगेन्द्र दत्त शर्मा