Monday, October 24, 2016

अमौसा के मेला

-कैलाश गौतम

भक्ति के रंग में रंगल गाँव देखा
धरम में, करम में, सनल गाँव देखा
अगल में, बगल में सगल गाँव देखा
अमौसा नहाये चलल गाँव देखा

एहू हाथे झोरा, ओहू हाथे झोरा
कान्ही पर बोरा, कपारे पर बोरा
कमरी में केहू, कथरी में केहू
रजाई में केहू, दुलाई में केहू

आजी रँगावत रही गोड़ देखऽ
हँसत हँउवे बब्बा, तनी जोड़ देखऽ
घुंघटवे से पूछे पतोहिया कि, अईया
गठरिया में अब का रखाई बतईहा

एहर हउवे लुग्गा, ओहर हउवे पूड़ी
रामायण का लग्गे ह मँड़ुआ के डूंढ़ी
चाउर आ चिउरा किनारे के ओरी
नयका चपलवा अचारे का ओरी

अमौसा के मेला, अमौसा के मेला

(इस गठरी और इस व्यवस्था के साथ गाँव का आदमी जब गाँव के बाहर रेलवे स्टेशन पर आता है तब क्या स्थिति होती है ?)

मचल हउवे हल्ला, चढ़ावऽ उतारऽ
खचाखच भरल रेलगाड़ी निहारऽ
एहर गुर्री-गुर्रा, ओहर लुर्री-लुर्रा
आ बीचे में हउव शराफत से बोलऽ

चपायल ह केहु, दबायल ह केहू
घंटन से उपर टँगायल ह केहू
केहू हक्का-बक्का, केहू लाल-पियर
केहू फनफनात हउवे जीरा के नियर

बप्पा रे बप्पा, आ दईया रे दईया
तनी हम्मे आगे बढ़े देतऽ भईया
मगर केहू दर से टसकले ना टसके
टसकले ना टसके, मसकले ना मसके

छिड़ल ह हिताई-मिताई के चरचा
पढ़ाई-लिखाई-कमाई के चरचा
दरोगा के बदली करावत हौ केहू
लग्गी से पानी पियावत हौ केहू
अमौसा के मेला, अमौसा के मेला

(इसी भीड़ में गाँव का एक नया जोड़ा, साल भर के अन्दरे के मामला है, वो भी आया हुआ है. उसकी गती से उसकी अवस्था की जानकारी हो जाती है बाकी आप आगे देखिये…)

गुलब्बन के दुलहिन चलै धीरे धीरे
भरल नाव जइसे नदी तीरे तीरे
सजल देहि जइसे हो गवने के डोली
हँसी हौ बताशा शहद हउवे बोली

देखैली ठोकर बचावेली धक्का
मने मन छोहारा, मने मन मुनक्का
फुटेहरा नियरा मुस्किया मुस्किया के
निहारे ली मेला चिहा के चिहा के

सबै देवी देवता मनावत चलेली
नरियर प नरियर चढ़ावत चलेली
किनारे से देखैं, इशारे से बोलैं
कहीं गाँठ जोड़ें कहीं गाँठ खोलैं

बड़े मन से मन्दिर में दर्शन करेली
आ दुधै से शिवजी के अरघा भरेली
चढ़ावें चढ़ावा आ कोठर शिवाला
छूवल चाहें पिण्डी लटक नाहीं जाला
अमौसा के मेला, अमौसा के मेला

(इसी भीड़ में गाँव की दो लड़कियां, शादी वादी हो जाती है, बाल बच्चेदार हो जाती हैं, लगभग दस बारह बरसों के बाद मिलती हैं. वो आपस में क्या बतियाती हैं …)

एही में चम्पा-चमेली भेंटइली
बचपन के दुनो सहेली भेंटइली
ई आपन सुनावें, ऊ आपन सुनावें
दुनो आपन गहना-गजेला गिनावें

असो का बनवलू, असो का गढ़वलू
तू जीजा क फोटो ना अबतक पठवलू
ना ई उन्हें रोकैं ना ऊ इन्हैं टोकैं
दुनो अपना दुलहा के तारीफ झोंकैं

हमैं अपना सासु के पुतरी तूं जानऽ
हमैं ससुरजी के पगड़ी तूं जानऽ.
शहरियो में पक्की देहतियो में पक्की
चलत हउवे टेम्पू, चलत हउवे चक्की

मने मन जरै आ गड़ै लगली दुन्नो
भया तू तू मैं मैं, लड़ै लगली दुन्नो
साधु छुड़ावैं सिपाही छुड़ावैं
हलवाई जइसे कड़ाही छुड़ावै
अमौसा के मेला, अमौसा के मेला

(कभी-कभी बड़ी-बड़ी दुर्घटनायें हो जाती हैं. दो तीन घटनाओं में मैं खुद शामिल रहा, चाहे वो हरिद्वार का कुंभ हो, चाहे वो नासिक का कुंभ रहा हो. सन ५४ के कुंभ में इलाहाबाद में ही कई हजार लोग मरे. मैंने कई छोटी-छोटी घटनाओं को पकड़ा. जहाँ जिन्दगी है, मौत नहीं है. हँसी है दुख नहीं है….)

करौता के माई के झोरा हेराइल
बुद्धू के बड़का कटोरा हेराइल
टिकुलिया के माई टिकुलिया के जोहै
बिजुरिया के माई बिजुरिया के जोहै

मचल हउवै हल्ला त सगरो ढुढ़ाई
चबैला के बाबू चबैला के माई
गुलबिया सभत्तर निहारत चलेले
मुरहुआ मुरहुआ पुकारत चलेले
छोटकी बिटउआ के मारत चलेले
बिटिइउवे प गुस्सा उतारत चलेले

गोबरधन के सरहज किनारे भेंटइली

(बड़े मीठे रिश्ते मिलते हैं.)
गोबरधन के सरहज किनारे भेंटइली
गोबरधन का संगे पँउड़ के नहइली
घरे चलतऽ पाहुन दही गुड़ खिआइब
भतीजा भयल हौ भतीजा देखाइब
उहैं फेंक गठरी, परइले गोबरधन,
ना फिर फिर देखइले धरइले गोबरधन
अमौसा के मेला, अमौसा के मेला.

(अन्तिम पंक्तियाँ हैं. परिवार का मुखिया पूरे परिवार को कइसे लेकर के आता है यह दर्द वही जानता है. जाड़े के दिन होते हैं. आलू बेच कर आया है कि गुड़ बेच कर आया है. धान बेच कर आया है, कि कर्ज लेकर आया है. मेला से वापस आया है. सब लोग नहा कर के अपनी जरुरत की चीजें खरीद कर चलते चले आ रहे हैं. साथ रहते हुये भी मुखिया अकेला दिखाई दे रहा है….)

केहू शाल, स्वेटर, दुशाला मोलावे
केहू बस अटैची के ताला मोलावे
केहू चायदानी पियाला मोलावे
सुखौरा के केहू मसाला मोलावे

नुमाइश में जा के बदल गइली भउजी
भईया से आगे निकल गइली भउजी
आयल हिंडोला मचल गइली भउजी
देखते डरामा उछल गइली भउजी

भईया बेचारु जोड़त हउवें खरचा
भुलइले ना भूले पकौड़ी के मरीचा
बिहाने कचहरी कचहरी के चिंता
बहिनिया के गौना मशहरी के चिंता

फटल हउवे कुरता टूटल हउवे जूता
खलीका में खाली किराया के बूता
तबो पीछे पीछे चलल जात हउवें
कटोरी में सुरती मलत जात हउवें
अमौसा के मेला, अमौसा के मेला

-कैलाश गौतम

Friday, July 29, 2016

मुस्कान लीले नाग

उठ रहे दंगे-धुएँ हैं
नून-रोटी साग पर
हो गया
चलना जरुरी
आग फैली आग पर

पीर की अनुभूतियाँ भी
शब्द पाकर बोलती हैं
खीर टेढ़ी हो
भले, पर तह
परत को खोलती हैं
तिलमिलाये भाव लेकर
रागिनी है राग पर

रोटियाँ, घर, द्वार, कपड़े
दाँव में खुद को लगाकर
फिर मुसीबत
झेलने को
पग धरे आगे बढाकर
मंत्र जागे पढ़ रहा
मुस्कान लीले नाग पर


-रामकिशोर दाहिया

Friday, June 24, 2016

ओ चिड़िया

-जयप्रकाश श्रीवास्तव

ओ चिड़िया
आंगन मत झांकना
दानों का हो गया अकाल

धूप के लिबासों में
झुलस रही छांव
सूरज की हठधर्मी
ताप रहा गांव
ओ चिड़िया
दिया नहीं बालना
बेच रहे रोशनी दलाल।

मेड़ के मचानों पर
ठिठुरती सदी
व्यवस्थाओं की मारी
सूखती नदी
ओ चिड़िया
तटों को न लांघना
धार खड़े करेगी सवाल।

अपनेपन का जंगल
रिश्तों के ठूंठ
अपने अपनों पर ही
चला रहे मूंठ
ओ चिड़िया
सिर जरा संभालना
लोग रहे पगड़ियां उछाल।
         
-जयप्रकाश श्रीवास्तव 

नहीं मील का पत्थर कोई

-संध्या सिंह

कितनी दूर चले हैं जाने
कैसे जीवन पथ पहचाने
नहीं मील का पत्थर कोई
दिखा सफ़र में गड़ा हुआ

खुशियाँ जंग लगे बक्से में
बंद पोटली के भीतर
ताले लगे विवशताओं के
मुस्कानो पर कड़ी नज़र
सपना चारदीवारी भीतर
पंजो के बल खडा हुआ

दंड मिला तितली को वन में
फूल फूल मंडराने पर
हवा स्वयं ही चुगली करती
शाखों के लहराने पर
पाबंदी के तंग शहर में
जंगल का मृग बड़ा हुआ

परिवर्तन ने पंख दे दिए
पर रस्मों ने डोर कसी
घर–बाहर के बीच जंग हैं
दरवाजे में देह फँसी
बहती गयी उमर नदिया-सी
मन जिद्दी-सा अड़ा हुआ

-संध्या सिंह

Thursday, March 24, 2016

विडम्बना

 -संध्या सिंह
गहन उदासी के आँगन को
उत्सव दिखना था
बालू के पन्ने पर हमको
दरिया लिखना था

पथरीला सच पाँव तले था
मिट्टी के सपने सर पर
द्वेष ईर्ष्या के गड्ढों से
भरसक चले सदा बच कर
मगर जहाँ पर मिली ढलाने
रस्ता चिकना था

पंखों की सब रद्द उड़ाने
कुहरे का परिवेश मिला
बूंदों को काजल की हद में
रहने का आदेश मिला
घूम-घूम कर एक नोक पर  
लट्टू टिकना था

-संध्या सिंह

ये कैसे बंटवारे गम के

-संध्या सिंह
घाव दर्द मुस्कान ठहाके
मिले धरा पर बिना नियम के
कैसी ये तकसीम सुखों की
कैसे ये बंटवारे गम के

कहीं अमीरी के बक्से में
सोना सोना ख़्वाब धरे हैं
कहीं फटी किस्मत का पल्लू
सिक्का सिक्का स्वप्न मरे हैं  

जहां किश्त पर नींद मिली हो
वहीं फिक्र के डाकू धमके
कैसी ये तकसीम सुखों की
कैसे ये बंटवारे गम के

कहीं कुतर्कों से ‘आज़ादी‘
रोज़ नयी परिभाषा लाती
कहीं रिवाजों के पिंजरे में
चिड़िया पंख लिये मर जाती

जहाँ भूख से आँत ऐंठती
वहीं पहाड़े हैं संयम के
ये कैसी तकसीम सुखों की
ये कैसे बंटवारे गम के

जहाँ लबालब नदिया बहती
वहीं बरसते बादल आ कर
जहाँ धरा की सूखी छाती
धूप बैठती पाँव जमा कर

जहाँ थकी हो प्यास रेत में
वहीं भरम का पानी चमके
कैसी ये तकसीम सुखों की
कैसे ये बंटवारे गम के

-संध्या सिंह

Wednesday, March 02, 2016

धधकी आग तबाही

-रामकिशोर दाहिया

ठोंके निर्मम खुराफात की
सिर पर गहरी कील
खारा पानी लेकर आईं
आँखों वाली झील

ज़हर उतारा गया हमारे
पुनः कण्ठ के नीचे
नील पड़े सच डर के मारे
खड़े झूठ के पीछे
लौट रही बारूद जेल से
धरे हाथ कंदील

ऐसा जुल्म छद्म के हाथों
करते रोज़ नया
खेले खेल नज़र से देखे
सहमी हुई बया
नागनाथ से सांप छुड़ाने
झपटी फिर से चील

उभरे हुये सुराग पकड़कर
देने चला गवाही
नहीं बुझेगी भीतर बाहर
धधकी आग तबाही
मैंने उखड़े पाँव जमाये
पत्थर जैसे मील

-रामकिशोर दाहिया

Sunday, February 28, 2016

मजबूरी है

-रामकिशोर दाहिया
मजबूरी है
कविता लिखना
कलम बाँध कर लाठी से

लाठी देख
बँदरिया नाचे
अपना मालिक चीन्हे-जानें
रबर-सरीखे
लक्ष्य अकड़ को
जोर लगाकर खींचे-तानें
दंद-फंद को
बाहर करने
भिड़ा हुआ हूँ कद-काठी से

संवेदन को
जीना होगा
तोड़ रही दम आशा छोटी
शक्ल आदमी की
है लेकिन
खून पिये औ' छीने रोटी
सुअर खाल पर
शब्द व्यंजना
ताकतवर हो तन माटी से

दूध-मलाई
मक्खन खाते, जिसकी
लाठी भैंस उसी की
फ़कत सिपाही
रहे कलम के, किये
नहीं कम पीर किसी की
बेहतर अलग
हो जाना चाहूँ
निर्बल की परपाटी से
     
-रामकिशोर दाहिया

रस की रीत लिखे

-रामकिशोर दाहिया

बिंदिया, कँगना,
पायल, बिछुआ,
प्रणय अतीत लिखे
फूलों की पंखुरियों पर
फागुन ने गीत लिखे

रंगों की मादकता उस पर
छन्दों के अनुबन्ध
कहने को आतुर हैं
अपने-अपनों के सम्बंध
पत्र-प्रेयसी को चोरी से
ज्यों मनमीत लिखे

भौंरों की अनुगूँज फूल के
कानों में अनुप्रास
भीतर-भीतर लगा कसकने
मदिराया मधुमास
मन-आँगन की
चंचल तितली
रस की रीत लिखे

सेमल, साल,
पलाश वनों में
भर सिन्दूर नहाते
महुवाए रतजगे बेचारे
भीम पलासी गाते
अलगोजे की तान पुरानी
परिणय-प्रीत लिखे
       
-रामकिशोर दाहिया

हद में ही पाँवों को मोड़ना

-अनिरुद्ध नीरव
हांफ-हांफ जाता हूँ
चार पंक्ति जोड़कर
जैसे चट्टान कोई तोड़कर

अपनी झीनी बीनी ओढ़ना
हद में ही पाँवों को मोड़ना
संख्यायें ऋण चिह्नों पर खड़ीं
सबको संचित धन-जोड़ना
स्वेद-स्वेद होता हूँ
स्वप्न को निचोड़ कर
जैसे चट्टान कोई तोड़कर

ध्वंसों की नदियों में वेग है
वेगों में पागल उद्वेग है
पागल उद्वेगों की हर लहर
कोई बरछी कोई तेग है
युद्ध-युद्ध होता हूँ
एक धार मोड़कर
जैसे चट्टान कोई तोड़कर

हर अंतर्वस्तु तार-तार क्यों
मिलकर मुर्दों का बाजार क्यों
गढ़ते है जो शब्दों की चिता
मरघट को कहते गुलजार क्यों
काँप-काँप जाता हूँ
एक शव झिंझोड़कर
जैसे चट्टान कोई तोड़कर
         
 -अनिरुद्ध नीरव
[पुनर्नवा विशेषांक 2016 से]