Thursday, August 20, 2015

नदी का बहना मुझमें हो

-शिवबहादुर सिंह भदौरिया
मेरी कोशिश है
कि नदी का बहना मुझमें हो

तट से सटे कछार घने हों
जगह-जगह पर घाट बने हों
टीलों पर मन्दिर हों जिनमें
स्वर के विविध वितान तने हों
मीड़-मूर्च्छनाओं का
उठना-गिरना मुझ में हो

जो भी प्यास पकड़ ले कगरी
भर ले जाये ख़ाली गगरी
छूकर तीर उदास न लौटें
हिरन कि गाय कि बाघ कि बकरी
मच्छ, मगर, घड़ियाल
सभी का रहना मुझमें हो

मैं न रुकूँ संग्रह के घर में
धार रहे मेरे तेवर में
मेरा बदन काटकर नहरें
ले जायें पानी ऊपर में
जहाँ कहीं हो
बंजरपन का मरना मुझ में हो

-शिवबहादुर सिंह भदौरिया

1 comment:

Malti Mishra said...

तट से सने कछार घने हों
जगह-जगह पर घाट बने हों
अति सुंदर