August 3, 2023

पारिजात के फूल

सारी रात झरे आँगन में
पारिजात के फूल

महके प्राण-प्रणव, जागे हैं
अनगिन सुप्त शिवाले
कई अबूझी रही सुरंगें
फैले भोर उजाले
दीप-दान करती सुहागिनें
द्वार नदी के कूल

वन-प्रांतर में मृग-शावक-दल
भरने लगे कुलाँचें
बिना मेघ, नभ के जादू से
मन-मयूर भी नाचे
झूम-झूम कर पेड़ों ने, है
झाडी़ लिपटी धूल

ले सुदूर से आये पाखी
मनभावन संदेशे
देह-देह झंकृत वीणा-सी
पुलकन रेशे-रेशे
दूब गलीचे बिछे, हटे हैं
यात्रा-पथ के शूल

-शशिकांत गीते

7 comments:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार(२५-०७ -२०२२ ) को 'झूठी है पर सच दिखती है काया'(चर्चा-अंक ४५०१) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  2. परिजात के फूल ,सुंदर फूल सुंदर रचना

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  3. सुंदर गेय रचना, कोमल सुंदर भाव।👌

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  4. कोमल भावों वाला सुंदर नवगीत।

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  5. गीते जी के अनूठे गीत अत्यंत मीठे hai

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  6. Anonymous10:47 AM

    बहुत सुंदर रचना । हार्दिक बधाई । रेणु चन्द्रा

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