Saturday, December 23, 2017

कबन्धों की बात

इस शहर में
आदमी के नाम पर अक्सर
बात होती है कबन्धों की

पूर्णता सपना हुई
सच है अधूरापन
है सभी के हाथ में
टूटा हुआ दर्पन
दिन दहाड़े
काँच घर पर फेंकती पत्थर
जा रही है भीड़ अंधों की

आग से फिर खेलते हैं
खेल मृग छौने
पर्वतों को जेब में रख
घूमते बौने
बर्फ था जो
खौलता है खून का सागर
घुट रही है दम सुगंधों की

शोर में अब कौन किसकी
यहाँ सुनता है
एक बिरवा मरुस्थल में
शीश धुनता है
आँधियों में
उड़ रही है रेशमी चादर
अरथियों से झुके कन्धों की।

-देवेन्द्र शर्मा इन्द्र
(आजकल, अगस्त-1993)