Friday, July 29, 2016

मुस्कान लीले नाग

उठ रहे दंगे-धुएँ हैं
नून-रोटी साग पर
हो गया
चलना जरुरी
आग फैली आग पर

पीर की अनुभूतियाँ भी
शब्द पाकर बोलती हैं
खीर टेढ़ी हो
भले, पर तह
परत को खोलती हैं
तिलमिलाये भाव लेकर
रागिनी है राग पर

रोटियाँ, घर, द्वार, कपड़े
दाँव में खुद को लगाकर
फिर मुसीबत
झेलने को
पग धरे आगे बढाकर
मंत्र जागे पढ़ रहा
मुस्कान लीले नाग पर


-रामकिशोर दाहिया