Sunday, February 28, 2016

हद में ही पाँवों को मोड़ना

-अनिरुद्ध नीरव
हांफ-हांफ जाता हूँ
चार पंक्ति जोड़कर
जैसे चट्टान कोई तोड़कर

अपनी झीनी बीनी ओढ़ना
हद में ही पाँवों को मोड़ना
संख्यायें ऋण चिह्नों पर खड़ीं
सबको संचित धन-जोड़ना
स्वेद-स्वेद होता हूँ
स्वप्न को निचोड़ कर
जैसे चट्टान कोई तोड़कर

ध्वंसों की नदियों में वेग है
वेगों में पागल उद्वेग है
पागल उद्वेगों की हर लहर
कोई बरछी कोई तेग है
युद्ध-युद्ध होता हूँ
एक धार मोड़कर
जैसे चट्टान कोई तोड़कर

हर अंतर्वस्तु तार-तार क्यों
मिलकर मुर्दों का बाजार क्यों
गढ़ते है जो शब्दों की चिता
मरघट को कहते गुलजार क्यों
काँप-काँप जाता हूँ
एक शव झिंझोड़कर
जैसे चट्टान कोई तोड़कर
         
 -अनिरुद्ध नीरव
[पुनर्नवा विशेषांक 2016 से]

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