Tuesday, February 02, 2016

भेड़ों के गले जड़ गए

भेड़ों के गले जड़ गए
मोती की चाहत में
कसमसा रहे
साथी है, कि बैठा घात में
काटेगा डैने वह रात में

उल्लू-सी निशा दृष्टि
बगुले-सा ढोंग धरे;
मौका मिल पाया क्या
हितुआई भी बिसरे;
घुसते ही जाते हैं
पुरखों के गाँव
नरकीली-शहरीली पाँत में

सीप-स्वाति बूँद बने
सागर के मध्य पड़ गए
हाथ आ गड़रियों के
भेड़ों के गले जड़ गए;
काला बाजारू 'औ
माहिर ठगिया
भरे हुए जौहरिया जात में

-राजा अवस्थी

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