Sunday, December 20, 2015

साँझ हुई

-रामनरेश पाठक

साँझ हुई, साँझ

हँसिए के ताल थमे
चूड़ी के गीत रुके
सधवा खलिहानों में
सूपों की बंद हुई नाच हुई
साँझ हुई, साँझ

मेड़ों की दूबों पर
मिलने का मोह लगा
मुठिया की बालों पर
खोया-सा छोह पगा
थके-थके लोचन में
खुशियों के बोल नई आँक गई
साँझ हुई, साँझ

कद्दू की लतरों को
धुँएँ ने धूम लिया
अरहर के फूलों को
किरणों ने चूम लिया
पनघट पर गोरी की
बाज नई झाँझ गई
साँझ हुई, साँझ

-रामनरेश पाठक

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