Friday, September 25, 2015

फूल केवड़े का

-राजेन्द्र प्रसाद सिंह

एक अदद फूल केवड़े का
कहाँ तक बचाकर मैं लाया, ले आया

बागीचे में अपने हाथों बचपन के
काँटों से ढँका फूल तोड़ लिया नम के
दरवाजे सजा दिया, थी निगाह सहमी
खुशबू से मँह मँह करती गहमागहमी
पर्व सभी पुलके, त्योहार हुए ताजे
हवा में उगे पंजे लिए सौ तकाजे
आँधी,.... भूकंप,... अगलगी में
घर छूटा, दर छूटा, छूटा बगीचा
बिस्तर नें कभी, कभी मंदिर ने खींचा
निर्वासित फूल केवड़े का
बचाकर यहाँ तक मैं लाया, ले आया

नाते-रिश्ते के दोमुँहे दोरुखे से
हाथों-हाथों गुज़रा फूल झरोखे से
अंजुरी में बँधा उधर, अंतर तक दमका
माथे से लगा इधर, शोणित में गमका
हर तनाव झेल गया युवा-हथेली पर
पखुरियाँ नोचने बढ़े सारे वनचर
..साजिश,... कानून,...दुश्मनी से
ताश के महल टूटे, धीरज-फल टूटे
आसरे-भरोसे के सारे पुल टूटे
यों आहत फूल केवड़े का
यहाँ तक बचाकर मैं लाया, ले आया

निजी स्वप्न ढूँढ़ता परायी आँखों में
गंध-गुण सिरजता तितली की पाँखों में
गदराया जो पराग कोश से समय के
लाँघ गया लावे की नदी साथ लय के
मौसम ने जंगल फौलाद के उगाये
छुआ, तो सलाखों में बौर निकल आये
मरुथल से,.. कई पठारों से
गुज़रा जो, सूख गिरे दल सभी कटीले
बरसे, आखिर बरसे मेघ भी रसीले
दूरागत फूल केवड़े का
वहाँ से तुम्हीं तक मैं लाया, ले आया


-राजेन्द्र प्रसाद सिंह

1 comment:

shyam gupta said...

नवगीत क्या ...गीत ही है ....लयात्मकता व प्रवाह की कमी अखरती है ..