Wednesday, May 27, 2015

चाँद-किरन

 रूठो मत प्रान ! पास में रहकर
झरती हैं चाँद-किरन झर झर झर

सेंदुर की नदी, झील ईंगुर की
माथे तुम्‍हारे तुम सागर की
चूड़ी-सी चढ़कर कलाई पर
टूटो मत प्रान ! पास में रहकर
           
आँखों की शाख, देह का तना
टप-टप-टप महुवे का टपकना
मेरे हाथों हल्‍दी-सी लगकर
छूटो मत प्रान ! पास में रहकर
                 
एक घूँट जल हो तो पीये
कब तक कोई छल में जीये
टूटे समन्दर, टूटे निर्झर
दो मत तुम प्रान ! पास में रहकर
         
-देवेन्द्र कुमार बंगाली