Thursday, March 12, 2015

चंदा चाँदी का

-पंकज परिमल

माँ बच्चे के गले बाँधती
चंदा चाँदी का
चंद्रदोष से बचे पुत्र
निर्मल-शीतल मन हो
सच्चे मोती की आभा से
दिपदिप ये तन हो
हँसुली-धगुली बंधे हुए ये
बालक मटक रहे
इनमें कोई रानी का है
कोई बाँदी का

श्वास-रोग ना हो
गुस्से से छाती ना फूले
लाल हमारा बचे नज़र से
खूब फले-फूले
बालक का विद्रोह देख के
घबराती माता
बच्चे को दे रही अहिंसा-
मंतर गाँधी का

ये ही माँ का पीहर वाला
मीत पुराना है
इसीलिए परिचय बतलाती-
चंदा मामा है
इतना बड़ा कहाँ से लाए
सच्ची-मुच्ची का
माँ बच्चे को बहलाती दे
चंदा चाँदी का

-पंकज परिमल

2 comments:

Vandana Ramasingh said...

वाह ...बहुत खूबसूरत

संजीव वर्मा 'सलिल' said...

लोकजीवन के चित्र उपस्थित कर पंकज जी ने मन को बाँध लिया है. माँ की ममता तर्क या सत्य नहीं कल्याण मात्र देखती है. गीत/नवगीत जब तर्क मात्र होता है तो नीरस हो जाता है, पंकज जी ने हबाव को प्रतिष्ठित कर जीवंतता साधी है.