Sunday, October 05, 2014

एक पेड़ चाँदनी

-देवेन्द्र कुमार बंगाली  

एक पेड़ चाँदनी
लगाया है आँगने
फूले तो
आ जाना
एक फूल माँगने

ढिबरी की लौ
जैसे लीक चली
आ रही
बादल का रोना है
बिजली शरमा रही
मेरा घर छाया है
तेरे सुहाग ने

तन कातिक
मन अगहन
बार-बार हो रहा
मुझमें तेरा कुंआर
जैसे कुछ बो रहा
रहने दो
यह हिसाब
कर लेना बाद में

नदी, झील, सागर के
रिश्‍ते मत जोड़ना
लहरों को आता है
यहाँ-वहाँ छोड़ना
मुझको
पहुँचाया है
तुम तक अनुराग ने

-देवेन्द्र कुमार बंगाली 



1 comment:

गीता पंडित said...

वाह....वाह... बहुत सुंदर नवगीत है बधाई नवगीतकार बंगाली जी को और व्योम सर आपका आभार