Saturday, October 05, 2013

गीत न हम गाते तो

गीत न हम गाते तो
घुट-घुट के मर जाते

सुई पटक सन्नाटा
सांस थमी-ठहरी सी
चेतना अचेतन सी
या गूंगी बहरी सी
अनदेखे तूफां की
त्योरी से डर जाते

खो जाती तन-मन की
छुई-मुई सी सिहरन
सो जाती रो-रो कर
प्राणों की हर पुलकन
पथरीले सम्वेदन
किस द्वारे पर जाते

रोम-रोम पीड़ा का
कुम्भ कलश हो जाता
अंतस का आलोडन
भला किधर को जाता
ना बहते नैनों से
तो कितने भर जाते

-डा० सरिता शर्मा
[फेसबुक से साभार]

3 comments:

कल्पना रामानी said...

मन की अथाह पीड़ा को दर्शाता बहुत सुंदर नवगीत, सचमुच गीत न होते तो हम जैसे खो जाते...
सुंदर नवगीत के लिए सरिता जी को हार्दिक बधाई

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

वाह क्या बात!

sushma 'आहुति' said...

बेहतरीन अंदाज़..... सुन्दर
अभिव्यक्ति....