Wednesday, October 02, 2013

अब्बा बदले नहीं

अब्बा बदले नहीं
न बदली है उनकी चौपाल

अब्बा की आवाज गूँजती
घर-आँगन थर्राते हैं
मारे भय के चुनियाँ मुनियाँ
दाँतों, ऊँगली चबाते है
ऐनक चढ़ा आँख पर
पढ़ लेते है मन का हाल

पूँजी नियम-कायदों की हाँ
नित प्रातः ही मिल जाती है
टूट गया यदि नियम, क्रोध से
दीवारें हिल जाती हैं
अम्मा ने आँसू पोंछे गर
मचता तुरत बबाल

पूरे वक्त रसोईघर में
अम्मा खटती रहती है
अब्बा के संभाषण अपने
कानों सुनती रहती है
हँसना भूल गयी है
खुद से करती यही सवाल

-शशि पुरवार