Friday, August 30, 2013

सिसक रही हिरनी

-डा0 जगदीश व्योम

राजा मूँछ मरोड़ रहा है
सिसक रही हिरनी

बड़े-बड़े सींगों वाला मृग
राजा ने मारा
किसकी यहाँ मजाल
कहे राजा को हत्यारा
मुर्दानी छायी जंगल में
सब चुपचाप खड़े
सोच रहे सब यही कि
आखिर आगे कौन बड़े
घूम रहा आक्रोश वृत्त में
ज्यों घूमे घिरनी

एक कहीं से स्वर उभरा
मुँह सबने उचकाये
दबे पड़े साहस के सहसा
पंख उभर आये
मन ही मन संकल्प हो गए
आगे बढ़ने के
जंगल के अत्याचारी से
जमकर लड़ने के
पल में बदली हवा
मुट्ठियाँ सबकी दिखीं तनी

रानी तू कह दे राजा से
परजा जान गई
अब अपनी अकूत ताकत 
परजा पहचान गई
मचल गई जिस दिन परजा
सिंहासन डोलेगा
शोषक की औकात कहाँ
कुछ आकर बोलेगा
उठो उठो सब उठो
उठेगी पूरी विकट वनी

-डा0 जगदीश व्योम


10 comments:

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

क्या बात वाह!

ARUN SATHI said...

मार्मिक पर यथार्थ

vandana said...

बहुत सुन्दर गीत

Brijesh Neeraj said...

वाह! बहुत ही सुन्दर!

Brijesh Neeraj said...

आपकी यह सुन्दर रचना दिनांक 18.09.2013 को http://nirjhar-times.blogspot.in/ पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें और अपने सुझाव दें।

Brijesh Neeraj said...

आपकी यह सुन्दर रचना दिनांक 20.09.2013 को http://blogprasaran.blogspot.in/ पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें और अपने सुझाव दें।

कल्पना रामानी said...

अनूठे बिंबों से सुसज्जित शानदार नवगीत

कल्पना रामानी said...

अनूठे बिंबों से सुसज्जित शानदार नवगीत

Anonymous said...

अनूठे बिंबों से सुसज्जित शानदार नवगीत

Soham said...

heart touching...