Friday, August 09, 2013

दिन डूबा

-रामदरस मिश्र

दिन डूबा
अब घर जाएँगे

कैसा आया समय कि साँझे
होने लगे बंद दरवाजे
देर हुई तो घर वाले भी
हमें देखकर डर जाएँगे

आँखें आँखों से छिपती हैं
नजरों में छुरियाँ दिपती हैं
हँसी देखकर हँसी सहमती
क्या सब गीत बिखर जाएँगे

गली-गली औ॔' कूचे-कूचे
भटक रहा पर राह न पूछे
काँप गया वह, किसने पूछा
"सुनिए आप किधर जाएँगे"

-रामदरस मिश्र

5 comments:

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

वाह! बहुत ख़ूब!

Vandana Tiwari said...

आदरणीय आपकी यह प्रस्तुति 'निर्झर टाइम्स' पर लिंक की गई है।
http://nirjhar.times.blogspot.in पर आपका स्वागत् है,कृपया अवलोकन करें।
सादर

कल्पना रामानी said...

बहुत सुंदर

कल्पना रामानी said...

बहुत सुंदर

कल्पना रामानी said...

बहुत सुंदर