Thursday, April 25, 2013

खुल गयी नाव


-अज्ञेय
खुल गयी नाव
घिर आयी संझा, सूरज
डूबा सागर तीरे ।

धुँधले पड़ते-से जल-पंछी
भर धीरज से
मूक लगे मँडराने
सूना तारा उगा
चमक कर
साथी लगा बुलाने ।

तब फिर सिहरी हवा
लहरियाँ काँपीं,
तब फिर मूर्छित
व्यथा विदा की
जागी धीरे-धीरे ।

-अज्ञेय

[ "पाँच जोड़ बाँसुरी" - सम्पादक- चन्द्रदेव सिंह, पृष्ठ-44

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