Saturday, December 08, 2012

भील भिलारे से


 -महेश अनघ
 कुछ न मिला जब
धनुर्धरों से, वंशीवारे से
हार हूर कर माँग रहे हैं
भील भिलारे से

ला चकमक तो दे
चिंतन में आग लगाना है
थोड़ी सी किलकारी दे
बच्चे बहलाना है
कैसे डरे-डरे बैठे हैं
अक्षर कारे से

हम पोषाकें पहन
पिघलते रहते रखे रखे
तूने तन मन कैसे साधा
नंगमनंग सखे
हम को भी चंगा कर
गंडा बूटी झारे से

हम कवि हैं
चकोरमुख से अंगार छीनते हैं
बैठे ठाले शब्दकोश के
जुएँ बीनते हैं
मिले तिलक छापे
गुरुओं के पाँव पखारे से

एक बद्दुआ सी है मन में
कह दे तो बक दूँ
एक सेर महुआ के बदले
गोरी पुस्तक दूँ
हमें मिला सो तू भी पा ले
ज्ञान उजारे से

-महेश अनघ