Thursday, November 01, 2012

हेमन्ती धूप


-डा० महेंद्र भटनागर

कितनी सुखद है
धूप हेमंती

सुबह से शाम तक
इसमें नहाकर भी
हमारा जी नहीं भरता
विलग हो
दूर जाने को
तनिक भी मन नहीं करता
अरे ! कितनी मधुर है
धूप हेमंती

प्रिया सम
गोद में इसकी
चलो
सो जायँ
दिन भर के लिए
खो जायँ
कितनी काम्य
कितनी मोहिनी है
धूप हेमंती

No comments: