Monday, June 25, 2012

अपने पंख पसारो


-विद्यानन्दन राजीव


सांसें टूट न 
जायें सुगना, अपने पंख पसारो

बिना लड़े किसने पाया है
मितवा दाना - पानी
फिर भी तुम्हें अकर्मक देखा
होती है हैरानी
धरती पर जो जन्मा उसको
हर पल लड़ना होगा
शिखर कई होंगे राहों में
जिन पर चढ़ना होगा

समर जीतना
ध्येय तुम्हारा, बिना लड़े मत हारो


जाती रहे उमंग, अँधेरा
होता और घना है
एक नया सूरज लाना
हर पंछी का सपना है
घोर निराशा के मेघों को
दूर भगाना होगा
अन्तर मन में नव-प्रकाश का
दाव जलाना होगा

गूँज रहे स्वर
वन-उपवन में, चारो ओर निहारो


- विद्यानन्दन राजीव
[ कठहरा, अलीगढ़]

( नवगीत के नये प्रतिमान, सम्पादक- राधेश्याम बंधु से साभार )

2 comments:

रविकर फैजाबादी said...

सतत आभार है ||

vandana said...

prerak rachna