Sunday, May 06, 2012

हरसिंगार झरे

-डा० जगदीश व्योम
सारी रात
महक बिखराकर
हरसिंगार झरे ।

सहमी दूब
बाँस गुमसुम है
कोंपल डरी-डरी
बूढ़े बरगद की
आँखों में
खामोशी पसरी
बैठा दिए गए
जाने क्यों
गंधों पर पहरे ।

वीरानापन
और बढ़ गया
जंगल देह हुई
हरिणी की
चंचल-चितवन में
भय की छुईमुई
टोने की ज़द से
अब आखिर
बाहर कौन करे ।

सघन गंध
फैलाने वाला
व्याकुल है महुआ
त्रिपिटक बाँच रहा
सदियों से
पीपल मौन हुआ
चीवर पाने की
आशा में
कितने युग ठहरे ।

-डा० जगदीश व्योम

3 comments:

अरूण साथी said...

साधु-साधु

expression said...

सुंदर............
अति सुंदर..................


सादर.

sushma 'आहुति' said...

बहुत सुंदर मन के भाव ...
प्रभावित करती रचना .